पैरेंट्स बच्चों की जरूरत और इच्छाओं के बीच फर्क क्यों नहीं करना चाहते?

हमारे आसपास अनेक ऐसी कहानियां बिखरी पड़ी हैं. आप आसानी से उनसे बावास्ता हो सकते हैं. हम कई बार अफसोस भी जताते हैं लेकिन दूसरों के मामले में खुद वही गलती करने में किसी से पीछे नहीं रहना चाहते. कई बार मोहल्लों में अपने ही बच्चों को बिगाड़ने की प्रतियोगिता होते हुए मैंने देखा है.

पैरेंट्स बच्चों की जरूरत और इच्छाओं के बीच फर्क क्यों नहीं करना चाहते?

पीड़ा भी खुशी देती है, ऐसा आपने शायद सुना न हो. पीड़ा तो पीड़ा ही है. उससे भला खुशी कैसे मिल सकती है? पर यह सच है और आज का केंद्र यही मुद्दा है. जैसे-जैसे आप पढ़ते जाएंगे, आपको महसूस भी होता जाएगा कि पीड़ा में भी खुशी होती है.

जी हां, पीड़ा यानी बीमारी. इस नई-नवेली बीमारी से पीड़ित ज्यादातर नवधनाड्य पैरेंट्स हैं लेकिन खुश भी हैं. यह अकेला रोग है, जो लोगों को खुशियां दे रहा है. रोग की जड़ें गहरी हैं लेकिन कोई स्वीकार करने को तैयार नहीं है. उल्टा अगर कोई अड़ोसी-पड़ोसी, रिश्तेदार ध्यान दिलाए तो उसे पागल करार देने में ऐसे रोगी पीछे नहीं हैं.

उन्हें रोग के गंभीर होने का पता तब चलता है, जब भैंस पानी में जा चुकी होती है. यह बीमारी है, बच्चों के लालन-पालन में हो रही चूक की. पैसों के दिखावे के चक्कर में अनजाने में ऐसी गलतियां खूब हो रही हैं, जिसका दुष्प्रभाव उनके जीवन पर गहरे तक पड़ रहा है लेकिन जब तक वे जागते हैं, देर चुकी होती है.

हमारे आसपास अनेक ऐसी कहानियां बिखरी पड़ी हैं. आप आसानी से उनसे बावास्ता हो सकते हैं. हम कई बार अफसोस भी जताते हैं लेकिन दूसरों के मामले में खुद वही गलती करने में किसी से पीछे नहीं रहना चाहते. कई बार मोहल्लों में अपने ही बच्चों को बिगाड़ने की प्रतियोगिता होते हुए मैंने देखा है.

जरूरत और इच्छाओं के बीच फर्क
मैं बात कर रहा हूं, ऐसे पैरेंट्स की जो बच्चों की जरूरत और इच्छाओं के बीच फर्क नहीं करना चाहते क्योंकि उनकी जेब में अकूत पैसा है.

जरूरत हर हाल में पूरी होनी चाहिए लेकिन क्या इच्छा पूरी होना भी उतना ही जरूरी है? मेरा जवाब है-नहीं. इच्छा का पूरा होना कतई जरूरी नहीं है. चाहे आपके पास कितना भी पैसा हो. जब हम इच्छा पूरी करने चलते हैं तो जीवन में बहुत कुछ ऐसा होता है, जो नहीं होना चाहिए.

क्योंकि इच्छाएं असीम हैं. उनका कोई अंत नहीं है, जबकि जरूरतें सीमित हैं. स्कूल, कपड़े, जूते-मोजे, भोजन, यदा-कदा मनोरंजन आदि जरूरत की श्रेणी में आते हैं. इसके अलावा जितनी चीजें हैं, वह सब इच्छाएं हैं.

जब हम अपने छोटे बच्चे को अलग कमरा, अलग कंप्यूटर / लैपटॉप, इंटरनेट की 24 घंटे आजादी, महंगे स्मार्टफोन देते हैं, यह मानते हुए कि आखिर हम कमा क्यों रहे हैं, इन्हीं बच्चों के लिए तो, तब आप गलती कर रहे होते हैं.

रुपया आप कमा रहे हैं, परिवार की भलाई के लिए. बच्चों की जरूरतों के लिए.

सख्त बनाने की जरूरत है, सुविधाभोगी नहीं
मैं उपरोक्त किसी भी चीज का विरोधी नहीं हूं. बच्चे को दीजिए वह सब, लेकिन जरूरत पड़ने पर. जब आप यही सुविधाएं उसके लिए अलग से जुटाते हैं तो गलती करते हैं और यह सब कुछ नवधनाड्य कुछ ज्यादा कर रहे हैं. इसे रोके जाने की जरूरत है. अगर आप ऐसा करते हैं तो आप भविष्य में पश्चाताप करने का मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं.

ध्यान रहे, बच्चे भी आपके हैं और पैसा भी. समय की मांग है कि इस मसले पर सावधानी बरती जाए. फोन चाहिए, अपना फोन दीजिए. कई फायदे होंगे. एक-आपको पता होगा, बच्चे ने किस नंबर पर बात की. आप चाहेंगे तो यह भी आसानी से जान पाएंगे कि क्या बातचीत की.

ऐसा करेंगे तो तय मान लीजिए कि वह आपसे फोन मांगेगा तभी जब बहुत जरूरत होगी, अन्यथा वह बचेगा. मैं बच्चे की मुखबिरी की राय नहीं दे रहा हूं. लेकिन नजर तो रखना पड़ेगा. आखिर बच्चा आप ही का है. उसे सख्त बनाने की जरूरत है, सुविधाभोगी नहीं. दुश्वारियों के बीच लालन-पालन की जरूरत है, राजा की तरह नहीं.

बच्चों को कराएं इस बात का एहसास
आपके पास कितना भी पैसा हो, लेकिन बच्चों को इस बात का एहसास नहीं होना चाहिए कि उनके पैरेंट्स के पास बहुत पैसा है. उन्हें इस बात का एहसास जरूर होना चाहिए कि पैरेंट्स हमारी जरूरतों को पूरा करने के लिए बहुत पसीना बहाते हैं. हर छोटी-छोटी जरूरत पूरी करते समय इस बात का एहसास कराया जाना बहुत जरूरी है.

अगर आप कुछ ज्यादा देना चाहते हैं तो समय दीजिए. अपने साथ लेकर बाजार जाइए. बातें करिए. उन्हें समझिए. दोस्तों के बारे में जानिए. उनके घर लेकर जाइए. इससे आप अपने बच्चे को ज्यादा जान पाएंगे. जो आपके लिए हर हाल में मददगार होगा. छोटी उम्र से ऐसा करने पर बड़ा होने पर भी बच्चे को कुछ भी असामान्य नहीं लगेगा. वह आपसे सब कुछ शेयर करेगा.

छोटी से छोटी बात जब आपकी जानकारी में होगी, तो बच्चे को आप बड़ी से बड़ी समस्या से आसानी से बचा पाएंगे और यह काम कोई भी अमीर-गरीब पैरेंट्स कर सकते हैं. आमीन! 

(लेखक सीनियर जर्नलिस्ट, काउंसलर और लाइफ कोच हैं.)
(इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं.)