हमारे लिए देश सर्वोपरि है...

कहते हैं राजनीति का आईना बड़ा धुंधला होता है. वैसे तो राजनीति हमेशा से ही समझ से परे की बात रही है, लेकिन आज तो राजनीति की परिभाषा ही बदल गई है.

हमारे लिए देश सर्वोपरि है...

कहते हैं राजनीति का आईना बड़ा धुंधला होता है. वैसे तो राजनीति हमेशा से ही समझ से परे की बात रही है, लेकिन आज तो राजनीति की परिभाषा ही बदल गई है. शब्दों की गरिमा शान होती है किन्तु आज शब्दों के बाण चलाना, छींटाकशी करना, एक-दूसरे को नीचा दिखाना, आरोप लगाना और भद्दा प्रदर्शन करना बड़ी आम बात हो गई है. बात किसी भी दल की हो, सब अपनी उपलब्धियां गिनाने में ही लगे रहते हैं.

दूसरे की क्या कमजोरी है, ये बताने में भी नहीं चूकते. कटाक्षों का, व्यंग्य भाषा का प्रयोग करने से भी बाज नहीं आते. जो जनता चुनकर भेजती है उस जनता का कहीं भी जिक्र नहीं होता. सभ्यता हमारे संस्कारों में होनी चाहिये और संस्कार हमारी धरोहर हैं पर आज ये विरासत राजनीति के क्षेत्र से विलुप्त होती जा रही है. सभ्य परिवारों में बचपन से ही अच्छे गुण डाले जाते हैं, किसी से लड़ना नहीं है, छोटों को प्यार करना है, बड़ों का सम्मान करना है. घर के बड़े खुद आदर्श होते थे, पर आज देश को चलाने वाले, सत्ता के शासक खुद ही शब्दों की गरिमा खो चुके हैं.

परिवारों में तो आज भी संस्‍कृति के दर्शन हो जाते हैं पर राजनीति के क्षेत्र जो लड़ाई-झगड़े, छींटाकशी, गाली-गलौच, हाथापाई आज सरेआम दिख रही है वह बड़े शर्म की बात है. देश को चलाने की, देश की सभ्यता संस्कृति की आज किसी को चिन्ता नहीं है. आज खुलेआम एक दूसरे पर कीचड़ उछाला जाता है. 

टीवी चैनलों पर लड़ाई ऐसे दिखाई जाती है जैसे वे चैनल न होकर युद्ध के अखाड़े हों, संसद जंग का मैदान लगती है और वहां चीख-चीखकर बोलने वाले अपनी निम्न सोचों का परिचय देते हैं. जनता के वोटों से जीतकर आने वाले जनता की ही बात करना भूल जाते हैं. भूल जाते हैं उन समस्याओं को ज्न्हिें पूरा करने का वादा करके वे सत्ता तक पहुंचे हैं. हर प्रबुद्ध वर्ग दूसरे को नीचा सिद्ध करने में जुट जाता है. मात्र अपनी सीट को बचाने की खातिर सभ्य दिखने वाला हर शख्स आज असभ्यता का प्रदर्शन कर रहा है. व्यक्तित्व बड़ा छोटा लगता है जब प्रतिष्ठित व्यक्ति भी वाद-विवाद के माध्यम से एक-दूसरे को गिराने की कोशिश करते हैं.

तुच्छ विचारों की संकीर्णताएं समाज में अच्छा संदेश नहीं दे रही हैं. वोट के आधार की राजनीति से मन भरता जा रहा है. विभिन्न अटकलें लगाकर, एकजुट होकर बस हासिल करने की चाह सब में है देश की अखण्डता, देश की एकता, देश की समस्याओं की ओर किसी का ध्यान नहीं है. स्वाभिमान सिमटता जा रहा है. अभिमान दृष्टिगोचर हो रहा है. संसद जो देश की गरिमा है, वहां भी तुच्छ राजनीति का प्रदर्शन देश के हित में नहीं है. अध्यापक कक्षा में यदि विषय से हटकर पढ़ाना शुरू कर दे तो यह न तो बच्चे के हित में है और न समाज के, ठीक इसी तरह आज देश को चलाने की, देश को विकसित करने की बातें कहीं नहीं होती सब एक-दूसरे की टांग खींचने में ही लगे रहते हैं. देश की चिंता कोई करना भी चाहे तो सब मिलकर उसे उखाड़ फेंकने को तैयार हो जाते हैं.

विभिन्‍न त्रासदियों को झेलते हुए, असंख्य बलिदानों के बाद हमें ये आजादी मिली है. भारत के गौरव की खातिर हमें आपसी झगड़े और एक-दूसरे को नीचा दिखाने की प्रवृति को छोड़कर देश को आगे ले जाने की बातें करनी होंगी. बातें करनी होंगी देश के गरीबों की, देश की खूबसूरती की, देश के सैनिकों की, जो हमारी खातिर अपना जीवन दांव पर लगा देते हैं.

बातें होनी चाहिये उन किसानों की जो शीत-घाम सहकर भी हमारे लिए अन्न उत्पन्न करते हैं. बातें हों देश के शिशुओं की, युवाओं की, वृद्धों की. जनता से चुनकर आए हो तो जनता की बात हो. बडा़ अफसोस होता है जब सम्मानित व्यक्तियों को लड़ते देखते हैं. अपने फैसले पर आक्रोश होता है, दुख होता है, चिन्ता होती है देश के भविष्य की. जनता का मत ही सर्वोपरि होना चाहिये. बाकी सब नकार देना चाहिये. देश की गरिमा का ख्याल रखते हुए शब्दों का प्रयोग करना चाहिये. विजित व्यक्तियों के व्याख्यान से समाज में अच्छा सन्देश जाना चाहिये.

इतना सुसभ्य होने का परिचय तो वे दे ही सकते हैं. भारत हमारा गौरव, हमारा सम्मान, हमारा अभिमान है इस पर शासन करने वालों के विचार परिपक्व,शु़द्ध व देश हित में होने चाहिए. सत्ता के लोलुप व्यक्तियों की पहचान समाप्त होनी चाहिये. देश को बचाना हमारी प्राथमिकता है. देश बाहरी और आंतरिक समस्याओं से जूझ रहा है और राजनीतिज्ञ आपस में ही लड़ रहे हैं. आपसी मतभेद भूलाकर इसकी उन्नति और गरिमा का सम्मान तो सभी कर ही सकते हैं.