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निजता का अधिकार बनाम साइबर सुरक्षा की जंग

अब सोशल मीडिया यूजर्स की निजता, इंटरमीडिटीयरिज की उपभोक्ताओं के प्रति दायित्व और व्यापार नीति तथा सरकारी दिशानिर्देशों का त्रिकोणीय चक्रव्यू सा हो गया है.

निजता का अधिकार बनाम साइबर सुरक्षा की जंग

सरकार ने 24 दिसंबर को सोशल मीडिया क्षेत्र की दिग्गज कंपनियों यथा फेसबुक, ट्विटर, गूगल, व्हाट्सएप, अमेज़न इत्यादि से मुलाक़ात की. सरकार का कहना है कि वह देश में सोशल मीडिया के जरिये बढ़ रही भीड़ हिंसा और फेक़ न्यूज के चलन से बहुत अधिक चिंतित है. सरकार इसे साइबर और राष्ट्रीय सुरक्षा से भी जोड़कर देख रही है. सरकार चाहती है कि सोशल मीडिया कंपनियां और उनकी इंडिमिडिएटीरिज सरकार के साथ फेकन्यूज़, अपमानजनक, घृणास्पद, आक्रामक संदेशों समेत देश की सुरक्षा और आंतरिक साजिश के मुद्दों पर सहयोग करें. इसके लिए सरकार ने सूचना तकनीकी अधिनियम की धारा 79 की इंटरमीडिटीयरिज गाइडलाइंस का विस्तार करते हुए एक मसौदा जनता के विचार के लिए ऑनलाइन किया है.

मसौदे में इंटरमीडिटीयरिज को फेक न्यूज़, अपमानजनक, घृणास्पद, आक्रामक या राष्ट्रीय हित के खिलाफ जुड़े किसी संदेश की शिकायत किसी सरकारी एजेसी से मिलने के 72 घंटे के अंदर न केवल उसके प्रसार को रोकना पड़ेगा बल्कि उसे निषिद्ध भी करना पड़ेगा. इसका अनुपालन न करने पर सूचना तकनीकी अधिनियम की धारा 69 (1) के तहत 7 साल की सजा हो सकती है. इससे पहले धारा 79 के तहत इंटरमीडिटीयरिज के ऊपर कड़े कानूनी प्रावधान नहीं थे. इंटरमीडिटीयरिज को तीसरा पक्ष मानते हुए, उसे किसी भी तरह की कानूनी कारवाई की छूट थी, जब तक कि इस तरह की सूचनाओं को जनरेट करने, प्रसारित करने या कानून का उलंघन करने का प्राथमिक तौर पर सबूत नहीं होता था. मतलब है कि मामला अब सीधे-सीधे निगरानी एजेंसियों के हाथ में चला गया है.

यानि मामला अब सोशल मीडिया यूजर्स की निजता, इंटरमीडिटीयरिज की उपभोक्ताओं के प्रति दायित्व और व्यापार नीति तथा सरकारी दिशानिर्देशों का त्रिकोणीय चक्रव्यू सा हो गया है. मसौदे में यह भी कहा गया है कि इंटरमीडिटीयरिज को इंड तो इंड इन्स्क्रिपशन की निजता की सुरक्षा दीवार को तोड़ते हुए संदेश को जनरेट करने वाले की सूचना के बारे में जानकारी देनी होगी. साथ ही एक नियमित प्रणाली विकसित करनी होगी जो इस बात की निगरानी रखेगा कि कौन सी सूचना या संवाद कहाँ से शुरू हो रहा है. इंटरमीडिटीयरिज के लिए भारत में एक कार्यालय और प्रतिनिधि रखने का भी प्रावधान किया है. इसके साथ ही महीने में एक बार अपने उपयोगकर्ता को निजता नीति की जानकारी देनी होगी.

ऐसे में सूचना तकनीकी अधिनियम की धारा 79 में यह बदलाव और विस्तार सरकार की कुछ दिन पहले सूचना तकनीकी अधिनियम 2000 की धारा 69 (1) में बदलाव का ही अगला कदम कहा जा सकता है. सरकार ने धारा 69 (1) के तहत जारी आदेश में दिल्ली पुलिस आयुक्त समेत खुफिया ब्यूरो, राष्ट्रीय जांच एजेंसी, प्रवर्तन निदेशालय, केंद्रीय जांच ब्यूरो, नारकोटिक्स कंट्रोल बोर्ड, केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड, राजस्व खुफिया निदेशालय, कैबिनेट सचिव रॉ, सिग्नल इंटेलिजेंस निदेशालय जैसी दस राष्ट्रीय एजेंसियों को राष्ट्रीय और साइबर सुरक्षा तथा देशहित से जुड़े मामले में देश के किसी भी कम्यूटर की सूचना को रोकने, निरीक्षण करने और उसे हासिल करने का अधिकार दे दिया है. अगर कोई इस तरह का डाटा को देने से मना करता है और एजेंसियों या पुलिस के साथ सहयोग नहीं करता है तो उस पर 7 साल की सजा और जुर्माने का प्रावधान किया गया है.

इससे देश भर में बहस छिड़ गई है कि क्या सरकार देश के नागरिकों की निजता और उनकी निजी सूचनाओं तथा संदेशों पर निगरानी तंत्र स्थापित करने की दिशा में काम कर रही है. जिस तरह से सरकार ने सूचना तकनीकी अधिनियम की धारा 69 (1) और 79 के तहत आदेश जारी किए हैं, उससे इस बात की संभवना से इंकार भी नहीं जा सकता है, लेकिन सरकार बार-बार सफाई दे रही है कि वह कोई भी नया कानून नहीं ला रही और बस पुराने प्रावधानों को संचार के नए माध्यमों के अनुसार संसोधित कर रही है. ताकि इनके जरिये अंजाम दी जा रही गैरकानूनी गतिविधियों को रोका जा सके.

देश के विपक्षी दल समेत अभिव्यक्ति की आज़ादी के पैरोकार सरकार की इस दलील से इत्तेफाक नहीं दर्शा रहे हैं. उनका कहना है कि संसदीय चुनाव नजदीक हैं और सरकार अपने खिलाफ उठ रही जनता की आवाज से डर रही है, इसलिए वह उनकी आवाज़ दबाने के लिए उनके बीच में डर का माहौल पैदा करना चाहती है. यह कुछ हद तक सच भी हो सकता है, क्योंकि सोशल मीडिया एक संपादकविहीन एक ऐसा जनमाध्यम हो चुका है, जो अपनी विश्वनीयता की कुछ सीमाओं के बावजूद जनता की आवाज़ के मंच के रूप में उभर चुका है. इसलिए सरकारों की नज़र इस पर लंबे समय से लगी हुई है.

इससे पहले भी कांग्रेस सरकार ने 5 फरवरी 2009 को सूचना तकनीकी अधिनियम 2000 (संशोधित 2008) की धारा 66A के तहत यह प्रावधान किया था कि अगर कोई व्यक्ति संचार माध्यमों के जरिये किसी को अपमानजनक, घृणास्पद, आक्रामक या भ्रामक संदेश भेजता है तो उसे तीन वर्ष व जुर्माने की सजा दी जा सकती है, जिसे उच्चतम न्यायालय ने मार्च 2015 में असंवैधानिक घोषित कर दिया। कुछ महीने पहले ही सरकार ने सोशल मीडिया पर नज़र रखने के लिए देश के हर जिले में एक सोशल मीडिया हब बनाने का सर्कुलर जारी किया था, जिसे भारी विरोध और दबाव के चलते वापस लेना पड़ा था.

ऐसे में दिसंबर में कुछ दिनों के भीतर एक के बाद के लोगों के कम्यूटर की जांच और उनकी सोशल मीडिया की गतिविधि को नियंत्रित करने के आदेशों के चलते लोगों की निजता और अभिव्यक्ति का मुद्दा तो महत्वपूर्ण हो ही जाता है. यह तब और भी महत्वपूर्ण हो जाता है जब देश के उच्चतम न्यायालय ने निजता को नागरिकों का मौलिक अधिकार घोषित किया है. देश के नागरिकों के मौलिक अधिकार को कोई सरकार अपने किसी आदेश से नियंत्रित नहीं कर सकती है, इसके लिए निश्चित रूप से जनता को ही तय करना है, वह अपने कौन से अधिकार किस हद तक सरकार को सौपेंगी. इसलिए इस विषय का निर्णय खुले पटल पर संसद के संयुक्त अधिवेशन में होना चाहिए न कि किसी आदेश या अध्यादेश के जरिये. इसलिए सरकार द्वारा दस एजेंसियों को लोगों के कंप्यूटर की निगरानी रखने के आदेश पर फिर से विचार करने की ज़रूरत है. इसके साथ ही सरकार के इस कदम की सराहना करनी चाहिए कि उसने सूचना अधिनियम की धारा 79 में संसोधन से पहले लोकतान्त्रिक तरीका अपनाते हुए उस पर जनता की राय आमंत्रित की है.

(लेखक स्वतंत्र टिप्णीकार हैं)

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)