धन्यता के गीत गाती आवाज़ें

सौन्दर्य के सितार पर सद्भाव का संगीत हैं. विकृति के बाज़ार में संस्कृति का शंखनाद हैं. संत प्यार की पेढ़ी पर परमात्मा की प्रार्थना है. वे सदाचरण के आशीष हैं. जागरण के ताबीज हैं. 

धन्यता के गीत गाती आवाज़ें

‘करूणेश्वरी मंडम’ के पावन परिसर में वह भक्ति रस में आकंठ भिगोती सांझ के सुरभीने क्षण निश्चय ही दिव्य आनंद की अलौकिक यात्रा का रूहानी अहसास बनकर प्रकट हुए. ब्रह्मलीन गुरूमाता श्रीमती दुर्गा शाण्डिल्य के प्रथम पुण्य स्मरण का यह सांगीतिक उपक्रम श्रद्धा स्वरों के निवेदन की अभिव्यक्ति बना. मालवा के गुणी युवा गायक राजीव शर्मा ने अपनी संगीत मंडली के साथ मिलकर संत कवियों के भक्ति गाए. सरल, सहज धुनों में जीवन के आध्यात्मिक सत्य की भावभरी अनूगूंजों ने निश्चय ही अन्तर्लय को जगा दिया. देवभूमि पर अभ्यर्थना का यह निश्चय ही अलौकिक अनुभव था.

इस सभा में शामिल होकर एक बार फिर यह भरोसा पक्का हुआ कि भक्ति, मन के गोमुख से फूटी गंगा है जिसके एक सिरे पर श्रद्धा है तो दूसरे छोर पर आनंद है. साधक और विराट के बीच एक अद्भुत रसायन है. महत्वपूर्ण पहलू भक्ति की इस यात्रा में संतों के साहित्य का जुड़ता है, जिसके बिना जीवन के आदर्श मूल्यों के सहज पाठ शायद संभव नहीं होते. लेकिन संत साहित्य को केवल किताबी लेखा-जोखा मानकर उसकी महान प्रेरणाओं से वंचित रही हमारी बिरादरी को यह जानना भी ज़रूरी है कि स्वर संगीत की सोहबत में संतों की वाणी युगों के फासले तय करती आज भी कंठ और स्मृति में कायम है. यह भी कि हमारे लोक जीवन की आत्मा यहीं अपना चैन तलाशती है. संत आध्यात्मिक आकाश में इंसानियत के इन्द्रधुनष हैं. 

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सौन्दर्य के सितार पर सद्भाव का संगीत हैं. विकृति के बाज़ार में संस्कृति का शंखनाद हैं. संत प्यार की पेढ़ी पर परमात्मा की प्रार्थना है. वे सदाचरण के आशीष हैं. जागरण के ताबीज हैं. अविश्वास और अनास्थ के अंधेरों में उम्मीद का उजियारा हैं. अर्थहीन आवाज़ों के बीहड़ में जीवन के मंत्र गाती वाणी हैं. शब्द, रंग, लय, गति और स्वर को साधती ऐसी ही अमृत वाणी का आचमन करते हुए हमारी मनुष्यता ने जीवन के शाश्वत सवालों के समाधान तलाशे हैं.

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कबीर, तुलसी, सूर, नानक, दादू, रैदास, मीरा, ब्रह्मानंद त्यागराज, तुकाराम आदि की रचनाएँ दीप शिखाओं की तरह आलोकित हैं. ये कहते हैं कि जीवन उत्सव हैं. आनंद है. ऊर्जा का स्रोत है. लेकिन यह उत्सव में तब बदलता है जब आपका अन्तः करण आनंद में हो. चिर आनंद और ऊर्जा का स्रोत कहाँ है? अपने अंतर में उतर कर देखें तो बाहर और भीतर का अन्तर मिट जाता है. सारा विश्व एक हो जाता है. तब सम्पूर्ण विश्व आराध्य हो जाता है, अस्तित्व विश्व शक्ति का पर्याय बन जाता है. समुद्र और बूंद का फर्क मिट जाता है. तब कैसा भेदभाव, कैसी ऊँच नीच!! आशय यही कि जीवन उत्सव है और भक्ति के रंगों में उसकी अभिव्यक्ति संभव है.

भक्ति के विविध रंग हैं. ऋग्वेद से प्रारंभ होकर यह यात्रा कई पड़ावों का स्पर्श करती है. भारत के सुदूर कोनों को जोड़ती यह यात्रा अपने पाथेय में यह महसूस करती है कि चूंकि परमपिता हम सब में विद्यमान है इसलिए दुनिया के सवाल हमें व्यर्थ संघर्ष में डालते है. यह दुनिया विरक्ति का संदेश नहीं देती क्योंकि उसका सृजन है तो अग्राह्य भला कैसे होगा? पर मनुष्य के बनाए छद्म और उनमें उलझन व्यर्थ है. मनुष्य और मनुष्य के बीच का भेदभाव व्यर्थ है. संत उस शीतल दरिया की तरह होते हैं, जो सभी को अपनी तरह की चेतना में जोड़ लेता है उसकी न कोई जाति होती है, न कोई धर्म. वह तो भक्ति का साधक होता है. 

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भक्ति भारत की आदिम धरोहर है. वह जीवन की धन्यता के गीत गाती है. चारों दिशाओं में फैला है इसका उजियारा. दक्षिण में त्यागराज से लेकर महाराष्ट्र के तुकाराम, उत्तर के कबीर-तुलसी से लेकर राजस्थान के रैदास-मीरा और पंजाब के नानक से लेकर आसाम के शंकर देव तक सैकड़ों संत विभूतियां रहीं जनके संदेशों को आज तक परंपरा के संगीत ने हम तक पहुंचाया है. चलते-फिरते फकीरों और जनपद के गायकों से लेकर भारत की रत्न विभूतियों सुब्बलक्ष्मी, भीमसेन जोशी, जसराज, कुमार गंधर्व, किशोरी आमोणकर, राजन-साजन मिश्र, पुरूषोत्तम दास जलोटा, हरिओम शरण, जगजीत सिंह, शुभा मुद्गल, अनूप जलोटा और शर्मा बंधुओं तक यह परंपरा अपनी व्यापकता में सबको समोती सुकून का पैगाम देती रही है. जब तक जीवन है, मनुष्य है यह सुरीली पुकार अस्तित्व में बनी रहेगी.

(लेखक वरिष्ठ कला संपादक और मीडियाकर्मी हैं)

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)