तो क्या सोनिया गांधी और कांग्रेस का कर्ज ऐसे उतारेंगे उद्धव ठाकरे?

महाराष्ट्र की सियासत में बीते 4 दिनों की उठापटक ने ऐसा चक्कर चलाया, कि हर कोई चकरा गया. लेकिन शिवसेना ने अब भाजपा से पूरी तरह से दुश्मनी मोल ले ली है. तो क्या अब उद्धव ठाकरे राहुल गांधी को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बिठाने के लिए जद्दोजहद करेंगे?

तो क्या सोनिया गांधी और कांग्रेस का कर्ज ऐसे उतारेंगे उद्धव ठाकरे?

नई दिल्ली: महाराष्ट्र में क्या से क्या हो गया? बड़ी माथापच्ची के बाद महाराष्ट्र की सत्ता से भाजपा ने दूरी बना ली है. एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार के सियासी दांव-पेंच की चक्करघिन्नी में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह की चाणक्य नीति बुरी तरह से चरमरा गई और महाराष्ट्र के सियासी क्षितिज में शिवसेना का सूरज उगने वाला है.

महाराष्ट्र के उद्धव बनाएंगे राहुल को पीएम?

भाजपा से ढाई साल के लिए सीएम की कुर्सी पर बात नहीं बनी तो उद्धव ने अपनी हिंदूवादी विचारधारा को स्टोर रूम में बंद कर दिया. शिवेसना, एनसीपी और कांग्रेस के साथ गले मिलने लगी. और पहली बार मातोश्री से किसी के मुख्यमंत्री बनने का मुहूर्त बन गया. महाराष्ट्र की सबसे बड़ी पार्टी भाजपा को सत्ता से दूर भेजने के बाद अब शिवसेना को ऐसा लगने लगा है कि दिल्ली भी दूर नहीं है. लेकिन सवाल तो यही है, कि शिवसेना के सबसे बड़े नेता उद्धव को सीएम की कुर्सी मिलने वाली है. लेकिन केंद्र में प्रधानमंत्री की कुर्सी के खातिर उद्धव किसे अपना खुला समर्थन देंगे? क्या शिवसेना राहुल गांधी को बतौर पीएम उम्मीदवार आगे बढ़ाएगी?

शिवसेना का हवाई जहाज मुंबई के मंत्रालय पर उतर चुका है लेकिन अब उसकी नजर सीधे दिल्ली की गद्दी पर है. ऐसे में सवाल यही है कि क्या शिवसेना अध्यक्ष उद्धव ठाकरे अब राहुल गांधी को पीएम बनाने की कवायद करेंगे. उद्धव के चहेते सलाहकार संजय राउत के शब्दों पर गौर करें तो इशारा कुछ ऐसा ही नजर आता है.

संजय राउत ने कहा है कि 'हमारे सूर्य यान की सुरक्षित लैंडिंग मंत्रालय की छठी मंजिल पर हो गई है. और अगर ये सूर्य यान आने वाले समय में दिल्ली में भी उतरे तो आपको आश्चर्य नहीं होगा.'

कितना जमीनी है ये दावा?

भारतीय जनता पार्टी के पास यूं तो अकेल दम पर बहुमत है और दिल्ली में कोई भी पार्टी उसकी सत्ता का बाल भी बांका नहीं कर सकती. लेकिन महाराष्ट्र में भाजपा के सपनों को चकनाचूर करने के बाद, शिवसेना का आत्मविश्वास सातवें आसमान पर है. शिवसेना इस कदर कुलाचें मार रही है कि वो अपने सियासी जहाज को दिल्ली के साउथ ब्लॉक में उतारने का ख्वाब देखने लगी है.

राहुल गांधी ही क्यों हैं मुख्य विकल्प?

भविष्य में राष्ट्रीय स्तर पर एक नए सियासी गठबंधन का संकेत शिवसेना ने दे दिया है. जिन उद्धव ठाकरे को कांग्रेस ने मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाया है, उनसे बदले में सोनिया गांधी प्रधानमंत्री पद के लिए अपने बेटे की तरफदारी करने का भरोसा तो मांग ही सकती हैं. और ये कहना गलत नहीं होगा कि शिवसेना के पास इसके अलावा कोई दूसरा चारा नहीं होगा.

इस देश में छोटी-छोटी पार्टियों के नेता को प्रधानमंत्री बनते देखा गया है तो फिर शिवसेना को भी गुमान है कि दिल्ली में उसका भी प्रधानमंत्री हो सकता है. लेकिन महाराष्ट्र में उद्धव को गद्दी पर बिठाने के बाद सोनिया गांधी अपना हिसाब जरूर करेंगी.

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सियासत में परिस्थितियां किसी को भी प्रधानमंत्री बना देती हैं तो ऐसे में शिवसेना के मन में भी ये दबी हुई इच्छा हिलोरें मार रही हैं कि स्वतंत्रता दिवस के मौके पर लाल किले पर उनका अपना कोई झंडा क्यों न फहराए? लेकिन उसका ये सपना कितना धरातल पर उतरता है, ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा.

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