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आखिर आज भी कांटों पर क्यों लोटते हैं पांडवों के वंशज

देश में आज भी एक ऐसी जगह है जहां के लोग खुद को पांडवों का वंशज मानते हैं और कांटों पर लोटकर एक अनोखी परंपरा मनाते हैं. आइये जानते हैं कि इस परंपरा के पीछे की कहानी क्या है.

आखिर आज भी कांटों पर क्यों लोटते हैं पांडवों के वंशज

अगर उंगली में एक काँटा भी गड़ जाये तो हम कराह उठते है लेकिन आज हम आपको ऐसे लोगों से रुबरु कराएँगे जो कांटो से इस तरह खेलते हैं मानों गुलदस्तो से खेल रहे हों. ये लोग कांटो को सिर्फ अपने हाथो से पकड़ते ही नहीं कांटो पर लोटते हैं और उन पर सोते हैं. हम बात बैतूल के रज्जढ़ समुदाय की कर रहे है जो अपने आप को पांडवो के वंशज मानते है. पांडवो के ये वंशज हर साल अगहन मास में जश्न मानते है, दुःख जताते है और कांटो पर लोटते है.

आखिर क्या कारण है काँटो पर लोटने की इस अनोखी परंपरा का

बैतूल के कई गाँव में रहने वाले रज्जढ बरसों से कांटो पर लोटने की परंपरा को निभा रहे है. वे मानते हैं कि पांडवों के वनगमन के दौरान एक बार सारे पांडव भीषण प्यास से परेशान हो गए. प्यास से गले उनके सूखने लगे लेकिन एक कतरा पानी भी उस जंगल में नहीं था. पानी की तलाश में भटकते पांडव चेतनाहीन हो रहे थे कि ऐसे में उनकी मुलाकात एक नाहल (नाहल-- एक समुदाय जो जंगलों में भिलवा इकठ्ठा करने का काम करता है .भिलवे से तेल निकालता है ) से हो गयी. प्यास से परेशान पांडवो ने गला तर करने नाहल से पानी की मांग की तो नाहल ने उनके सामने ऐसी शर्त रख दी जो महाबलियो के सामने अच्छे अच्छे नहीं कर सकते थे | नाहल ने पानी के बदले पांडवो की बहन जिसे रज्जढ भोंदई बाई के नाम से पुकारते थे का हाथ मांग  लिया. रज्जढ़ों की मानें तो पानी के लिए पांडवो ने अपनी बहन भोंदई को नाहल के साथ ब्याह दिया. तब जाकर उन्हें  जंगल में गला तर करने के लिए पानी मिल सका. परम्परा के जानकार दयाल हारोडे के मुताबिक इसीलिये ये खुद को पांडवों के वंशज मानते है. 

अगहन मास में रज्जढ सुख- दुख के बीच जीते हैं

मान्यता है कि अगहन मास में पूरे पांच दिन रज्जढ़ इसी वाकये को याद कर गम और खुशी में डूबे होते है. वे खुद को पांडवो का वंशज मानकर खुश होते है तो इस गम में दुखी होते है कि उन्हें अपनी बहन को नाहल के साथ विदा करना पड़ेगा. 

इस तरह काँटों पर लोटते हैं

 गाँव में शाम के वक्त इकट्ठे होकर ये लोग बेरी की कंटीली झाड़ियां एकत्रित करते हैं फिर उन्हें एक मंदिर के सामने सिर पर लाद कर लाया जाता है. यहाँ झाड़ियों को बिस्तर की तरह बिछाया जाता है और फिर उस पर हल्दी के घोल का पानी सींच दिया जाता है . इसके बाद खुद को पांडव समझने वाले रज्जढ नंगे बदन एक एक कर काँटों में लोटने लगते है. काँटों की चुभन पर इन्हें न दर्द होती है और न कोई कराह होती है. काँटों में किसी नर्म बिस्तर की तरह ये लोग गोल- गोल घूमते हैं. यही वजह है कि इस परंपरा को देखने वाले भी हैरान हो जाते है. काँटों में लेटने के बाद ये लोग एक महिला को भोंदई बाई बनाकर उसे विदा करने की रस्म पूरी करते है. इस दौरान बाकायदा दुःख जताने के लिए कांटो पर लोटना तो होता ही है महिलाओ का खास रुदन भी होता है. 

सब मनोकामनाओं की पूर्ति के लिये मनाते हैं ये परंपरा

यहाँ के लोगों की अपनी मनोकामनाएं भी होती हैं. कोई संतान सुख चाहता है तो कोई धन धान्य और प्रेत बाधा से मुक्ति के लिए यहाँ पहुचता है. लोग इसे अंधविश्वास तो मानते है लेकिन इसे समाज की परंपरा बताकर आस्था का सम्मान भी करते है. आधुनिक युग में इन परम्पराओं को मिथक के अलावा कुछ नहीं माना जाता. डाक्टर काँटों पर लेटने की इस परंपरा को जानलेवा और घातक बताते हैं. फिर भी परंपरा के नाम पर खुद को लहू लुहान करना इनका शौक और इनकी ख़ुशी बन गई है.