कर्म ही नहीं शांति और धैर्य की भी संदेश वाहक है कृष्ण की गीता

करीब पांच हजार साल पहले कुरुक्षेत्र की भूमि पर दिया गया गीता का ज्ञान आज भी उतना ही समकालीन और मौजूं है, जितना कि वह अर्जुन को सुनाते समय था. गीता का उपदेश मोह में पड़े अर्जुन को कर्म के लिए प्रेरित करने वाला केवल एक प्रसंग नहीं है, बल्कि यह महाभारत की घटित घटनाओं और उनमें निहित कारणों का संक्षेपीकरण भी है. इस आधार पर देखें तो महर्षि वेदव्यास का लिखित यह काव्यग्रंथ खुद में गीता की ही विस्तार कथा है, जिसमें सत्य, धैर्य, शील और मानव जीवन की आधारभूत भावनाएं शामिल हैं. गीता जयंती के मौके पर इसी पावन गीता की बात

कर्म ही नहीं शांति और धैर्य की भी संदेश वाहक है कृष्ण की गीता
नई दिल्लीः कर्मयोग का ज्ञान सिखाने वाली गीता और इस ज्ञान का मंत्र देने वाले श्रीकृष्ण एक मात्र योगेश्वर हैं. महाभारत का भयंकर युद्ध भले ही कौरव-पांडवों के बीच लड़ा गया हो, लेकिन वास्तव में इस युद्ध के नायक वासुदेव कृष्ण ही हैं. वैसे भी यह युद्ध व्यक्ति विशेष के विरोध में नहीं था, बल्कि यह युद्ध धूर्तता और कुटिलता के विरोध में होने वाला महासंग्राम था. कौरव पक्ष से यह दोनों हथियार दुर्योधन का मामा और गांधारराज शकुनि चला रहा था. कृष्ण उचित जवाब देने की प्रतीक्षा में केवल उसे मौका दे रहे थे. समय आने पर उन्होंने गीता ज्ञान का मंत्र फूंका और कुटिलता के सारे बादल छंट गए. वासुदेव की गीता का मंत्र केवल कर्मयोग का सिद्धांत ही नहीं रखता है, बल्कि धैर्य और शांति के भी उदाहरण देता है. महाभारत के प्रकरणों में ऐसे कई प्रसंग आते हैं.
 
दुर्योधन की हार के बाद भी बाकी था युद्ध
महाभारत के युद्ध का यह 18वां दिन था. दुर्योधन की जांघें टूटने के साथ भीम की प्रतिज्ञा पूरी हो चुकी थी और कौरव सेना की सारी शक्तियां भी छिन्न-भिन्न हो चली थीं. 18 दिन लंबे इस प्रयाण के बाद पांडव थक कर चूर हो चुके थे और अब जबकि दुर्योधन उठने लायक नहीं बचा था तो इसे ही अपनी जीत मानकर दबे पांव शिविर की ओर बढ़ रहे थे. थोड़ी ही दूरी पर कौरव सेना का शिविर दिखने लगा जहां अब बचे हुए पांडव सैनिक पड़ाव डाले हुए थे. पांडवों के पहुंचने पर सात्यकि ने उन्हें प्रणाम किया, जीत की बधाई दी और उनके थके हुए शरीर देखकर यहीं विश्राम के लिए कहा.
 
अर्जुन ने कृष्ण की ओर देखा तो लगा कि वे कुछ कहना चाहते हैं, लेकिन तबतक महाबली एक कक्ष के द्वार तक पहुंच गए थे. ऐसे में सभी ने भीतर चलना ही श्रेष्ठ समझा. 
 
पांडव प्रसन्न थे, लेकिन क्यों मौन थे वासुदेव कृष्ण
रात्रिभोज के समय भी कृष्ण को मौन देखकर युधिष्ठिर ने अर्जुन की ओर इशारा किया और उनके मन की थाह लेने की कोशिश की. पार्थ संध्या समय से ही इस मौन सागर की भीतरी हलचल को देख रहे थे, लेकिन तब उन्होंने बड़े भैया बलभद्र के क्रोध को इसका कारण समझा था लेकिन विजय की इस बेला में अपने सखा का इस तरह मौन हो जाना उन्हें अखर रहा था. अर्जुन ने कहा- मधुसूदन, अब तक आपने बड़े भैया को विजयश्री की शुभकामनाएं नहीं दीं, क्या अभी कुछ शेष है. माधव बोले, हां अर्जुन अभी 18वें दिन के कुछ पहर शेष हैं.
 
इस पर भीम तुरंत बोल पड़े, लेकिन शत्रुओं का मुखिया तो वहां तालाब के किनारे औंधे मुंह पड़ा है. इस वाक्यांश में महाबली में अभी-अभी उपजा दर्प भी शामिल था. कृष्ण बोले, हे गदाधारी, जब तक आश्वस्त न हो जाओ विजय की घोषणा न करो. स्मरण रहे, अभी तक आप महाराज धृतराष्ट्र से नहीं मिले हैं और उन्होंने अब तक सिंहासन रिक्त नहीं किया है. अर्जुन ने पूछा, तो क्या हमें अभी रात के इस पहर में ही हस्तिनापुर चलना होगा? 
 
अश्वत्थामा ने किया पांडव वंश का नाश
कृष्ण मुस्कुराए और बोले, नहीं पार्थ, अभी के लिए केवल तुम सभी को अपने शिविर में चलना चाहिए. इस पर सात्यकि ने कहा, लेकिन वासुदेव, युद्ध में पड़ाव पर विजय का भी महत्व है. यह पांडवों का अंतिम पड़ाव है. यदि बिना किसी निर्णय के पांडव यहां से लौटते हैं तो यह भी उनके कदम पीछे लेने जैसा होगा. सात्यकि की बात शास्त्र सम्मत थी जिसपर सभी ने समवेत स्वर में सहमति जताई. कृष्ण की बात आई गई हो गई और इसके बाद सभी सोने चले गए.
 
रात्रि के प्रथम पहर के बीतते ही द्रौपदी-सुभद्रा के क्रंदन से सारा कुरुक्षेत्र थर्रा उठा. शोर सुनकर सभी भागे-भागे पांडव शिविर में पहुंचे तो वहां पैरों तले जमीन खिसक गई थी. भूमि पर पांचों पांडव पुत्रों और पांडव सेनापति दृष्टद्युम्न के सिर कटे शव पड़े थे. अब सभी कृष्ण को देख रहे थे और वे जड़वत खड़े थे, मानों कह रहे हों कि मैंने कहा था कि आज की रात अपने शिविर में चलो. पांडव दुर्योधन की जंघा टूटने को ही अपनी विजय मान बैठे थे और बिना घोषणा के ही आश्वस्त हो रहे थे.
 
कृष्ण ने दिया धैर्य का संदेश
अश्वत्थामा के इस दुष्कृत्य के बाद वासुदेव कृष्ण ने अर्जुन समेत पांडवों को संभाला और उन्हें सांत्वना दी. यु्धिष्ठिर को समझाते हुए कहा कि विलाप न करिए, बड़े भैया. आइए चलें, अश्वत्थामा को उसके कृत्य का दंड तो देना ही होगा. इसी के साथ उन्होंने कहा कि हर किसी को किसी कार्य या उद्देश्य की अंतिम स्थिति तक धैर्य बनाए रखना चाहिए. यही वह भावना है जो आपके विजित होने का अंतिम प्रमाण देती है. विजय की घोषणा से पहले ही जो भी सिर्फ अपने उत्कृष्ट प्रदर्शन को ही विजय मान लेता है कई बार उसे निराशा ही मिलती है.