मलमास विशेषः दर्शन करते ही मन-मंदिर में प्रकाश भर देते हैं चंबा के लक्ष्मीनारायण

वैष्णव मत के इस मंदिर को दसवीं सदी में राजा साहिल वर्मन ने बनवाया था. स्थानीय मौसम को देखते हुए मंदिर में लकड़ी के तोरण द्वार और शिखर बनवाए गए थे. श्रीविष्णु का वाहन गरुड़ धातु की बनी प्रतिमा रूप में मुख्य द्वार पर सुशोभित है.  

मलमास विशेषः दर्शन करते ही मन-मंदिर में प्रकाश भर देते हैं चंबा के लक्ष्मीनारायण

नई दिल्लीः अधिकमास के पावन महीने में श्रीहरि के पवित्र मंदिरों के दर्शन करा रहा जी हिंदुस्तान आज पहंचा है. हिमाचल प्रदेश की रमणीक वादियों में. यहां प्रसिद्ध पर्यटन स्थल चंबा भी धार्मिक महत्व की नगरी है. यहां स्थित लक्ष्मीनारायण मंदिर प्राचीनता की धरोहर है साथ ही यहां की जाने वाली पूजा मनोकामनाएं पूर्ण करने वाली है. 

राजा साहिल वर्मन ने कराया निर्माण
लक्ष्मीनारायण मंदिर, वास्तव में एक मंदिर नहीं बल्कि कई मंदिरों का समूह है. इसमें मुख्य मंदिर जगत्पालक भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी को ही समर्पित है इसके अलावा अन्य अधिष्ठाता देव भी विराजित हैं.

वैष्णव मत के इस मंदिर को दसवीं सदी में राजा साहिल वर्मन ने बनवाया था. स्थानीय मौसम को देखते हुए मंदिर में लकड़ी के तोरण द्वार और शिखर बनवाए गए थे. श्रीविष्णु का वाहन गरुड़ धातु की बनी प्रतिमा रूप में मुख्य द्वार पर सुशोभित है.  

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शिखर शैली में निर्मित है मंदिर
यह मंदिर चंबा के 9 प्रमुख मंदिरों में सबसे विशाल और प्राचीन है. कहा जाता है कि सबसे पहले यह मन्दिर चम्बा के चौगान में स्थित था परन्तु बाद में इस मन्दिर को राजमहल (वर्तमान में राजकीय महाविद्यालय है) के साथ स्थापित कर दिया गया.

यह मंदिर शिखर शैली में निर्मित है. मंदिर में एक विमान और गर्भगृह है. मंदिर का ढांचा मंडप के समान है, जिसकी छतरियां और पत्थर की छत इसे बर्फबारी से बचाती है. 

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राजा चतर सिंह ने चढ़ाया छत्र
1678 में राजा चतर सिंह ने मुख्य मंदिर में सोने के आवरण चढ़वाया था. भगवान विष्णु पर केंद्रित यह मंदिर पांरपरिक वास्तुकारी और मूर्तिकला का उत्कृष्‍ट उदाहरण है. इस मंदिर परिसर में राधा कृष्ण, शिव व गौरी आदि देवी-देवताओं के मंदिर भी शामिल हैं.

इस मन्दिर समूह में महाकाली, हनुमान, नंदीगण के मंदिरों के अलावा विष्णु एवं शिव के तीन-तीन अन्य मंदिर भी हैं, जो उनके अवतारों की गाथा कहते हैं. इसलिए इसे लक्ष्मीनारायण मंदिर समूह कहते हैं. 


मंदिर में स्थित लक्ष्मी नारायण की बैकुंठ मूर्ति कश्मीरी और गुप्तकालीन निर्माण कला का अनूठा संगम है. इस मूर्ति के चार मुख और चार हाथ हैं. मूर्ति के पीछे दशावतार कथा लीला चित्रित की गई है. मुख्य प्रतिमा दुर्लभ पत्थर की है, जिसकी आंखें अनायास ही दर्शन करने वालों को मोह लेती हैं. 

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