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धमकी देकर नन्हे ताइवान पर कब्जा करने की फिराक में है चीन

कोरोना संकट से जूझती दुनिया में चीन की चालबाजियां लगातार जारी हैं. चीन ने अपने पड़ोसी देश ताइवान पर कब्जा करने की साजिश तैयार रच रहा है. वह इस नन्हें से देश पर सैन्य और कूटनीतिक दोनों दबाव डाल रहा है.  

धमकी देकर नन्हे ताइवान पर कब्जा करने की फिराक में है चीन

नई दिल्ली: दुनिया जब कोरोना वायरस से जूझ रही है. उस वक्त चीन अपने छोटे पड़ोसियों को दबाव में ले रहा है. उसने ताइवान को विश्व स्वास्थ्य संगठन से बाहर निकलवा दिया है. यही नहीं चीन की नौसेना साउथ चाइना सी के करीब बोहाई सागर में युद्ध का महा अभ्यास कर रही है.


युद्ध अभ्यास के जरिए ताइवान को धमकाने की साजिश 
चीन का ये अभ्यास जो एक या दो दिन नहीं बल्कि 70 दिन तक चलने वाला है. इस युद्धाभ्यास के लिए चीन ने बोहाई सागर के 2 हजार किलोमीटर के हिस्से को बंद कर दिया है. दरअसल चीन इस युद्धाभ्यास के जरिए ताइवान को दिखाना चाहता है कि वो कितना ताकतवर है. ड्रैगन की कोशिश है कि ताइवान पर दबाव बनाया जा सके और इस दबाव के जरिए ताइवान को घुटने टेकने पर मजबूर किया जा सके.
इसलिए चीन ने किया बोहाई सागर का चुनाव
बोहाई सागर को ही युद्धाभ्यास के लिए चुनने के पीछे भी चीन की घिनौनी मंशा है. क्योंकि बोहाई सागर और ताइवान की खाड़ी की बनावट करीब करीब एक जैसी है. दोनों जगह हालात भी लगभग एक जैसे ही हैं और चीन युद्धाभ्यास के जरिए ये दिखाना चाहता है कि वो ताइवान के कब्जे वाले दोंगशा द्वीप पर कब्जा कर सकता है. दोंगशा द्वीप पर ताइवान ने वन्य जीवों के लिए एक नेशनल पार्क बनाया हुआ है.


पूरी ताकत का प्रदर्शन कर रहा है चीन
इस युद्धाभ्यास में चीन ने अपने सबसे बड़े जंगी बेड़े को उतारा है.साथ ही तट पर कब्जा करने का भी अभ्यास किया जा रहा है. तट पर सेना को सुरक्षित उतारने के लिए अभ्यास में हेलिकॉप्टर और लड़ाकू विमानों को भी युद्ध अभ्यास में शामिल किया है. विमानों के जरिए दुश्मन की चौकियों पर हमले का अभ्यास किया जा रहा है. साथ ही तट पर अपनी चौकियां बनाने के साथ ही एंटी एयरक्राफ्ट मिसाइलों से भी अभ्यास कर रहा है.
हालांकि अभी इस युद्धाभ्यास का पहला ही चरण शुरु किया गया है. आने वाले वक्त में चीन की तरफ से इस युद्धाभ्यास में एयक्राफ्ट कैरियर भी शामिल करने वाला है. चीन इस युद्धाभ्यास में अपने सबसे बड़े कैरियर पोत लियानिंग को भी शामिल करेगा.
छोटे पड़ोसी देशों के साथ अमेरिका को भी धमका रहा है चीन 
लेकिन इस युद्धाभ्यास का एक ही हिस्सा है जो ताइवान पर दबाव बनाना है. युद्धाभ्यास के जरिए चीन की कोशिश साउथ चाइना सी में अपनी ताकत का प्रदर्शन कर दूसरे देशों पर दबाव बनाना भी है. अमेरिका ने कुछ दिन पहले ही अपने जंगी बेड़े को साउथ चाइना सी की तरफ रवाना किया है. ऐसे में चीन अमेरिका को भी ये दिखाना चाहता है कि वो कितना ताकतवर है. वैसे भी चीन अमेरिका पर आरोप लगा चुका है कि अमेरिकी चुनावों में बढ़त लेने के लिए साउथ चाइना सी में अमेरिका स्थितियां तनावपूर्ण बना रहा है.
ये भी है चीन की मंशा
जानकारों का मानना है कि इस युद्धाभ्यास के जरिए चीन ये भी चेक कर लेना चाहता है कि उस पर यदि हमला हुआ तो वो बीजिंग की सुरक्षा कितने कारगर तरीके से कर पाएगा. इसी के लिए मिसाइलों और लड़ाकू विमानों को भी युद्धाभ्यास में शामिल किया गया है. ट्रम्प ने साउथ चाइना सी की तरफ 3 युद्धपोत रवाना किए हैं. साथ ही प्रशांत महासागर में उसने अपने एयरक्राफ्ट कैरियर भी भेज दिए हैं. अमेरिका का आरोप है कि चीन साउथ चाइना सी पर कब्जा कर वहां से अवैध तरीके से कच्चा तेल और दूसरे खनिज निकालना चाहता है. उधर अमेरिका के जंगी बेड़ों के साउथ चाइना सी की तरफ आने के बाद चीन ने चेतावनी दी है कि वो हर कीमत पर युद्ध के लिए तैयार हैं.
जवाब देने के लिए तैयार है ताइवान
उधर ताइवान ने भी दोंगशा द्वीप पर युद्धाभ्यास की घोषणा कर दी है. ताइवान जून के अंत में दोंगशा द्वीप पर युद्धाभ्यास करेगा और अपनी फायर पोजिशन को चेक करेगा. फिलहाल चीन की हरकतों पर नजर रखने के लिए ताइवान ने दोंगशा द्वीप पर कोस्टगार्ड की 2 स्क्वाड्रन तैनात की हैं. साथ ही 40 एमएम, 81 एमएम और 120 एमएम मोर्टार भी दोंगशा द्वीप पर तैनात कर दिए हैं.
ताइवान पर कब्जे की चीन की इन्ही हरकतों का जवाब ताइवान की राष्ट्रपति साई इंग वेन ने दिया है और अमेरिका से मदद मिलती देख वेन का हौसला भी काफी बढ़ा हुआ है.
उन्होंने बयान जारी करके कहा है कि लोकतांत्रिक ताइवान चीन के नियम कायदे कभी कुबूल नहीं करेगा. चीन को इस हकीकत के साथ शांति से जीने का तरीका खुद खोजना होगा.साई इंग वेन ने साफ किया कि ताइवान कभी भी चीन के वन नेशन टू पॉलिसी सिद्धांत के साथ नहीं जुड़ेगा.


ताइवान पर कूटनीतिक दबाव भी बना रहा है चीन
पिछले दिनों 2 दिन तक चलने वाले विश्व स्वास्थ्य सम्मेलन में ताइवान को न्यौता नहीं दिया गया था. इस सम्मेलन में दुनिया के 120 से भी ज्यादा देश जुड़े थे. उस समय भी अमेरिका ने ताइवान का समर्थन किया था और कहा था कि ताइवान को न बुलाना विश्व स्वास्थ्य संगठन की राजनीतिक मंशाओं को दिखाता है..
ये पूरी खबर आप यहां पढ़ सकते हैं--चीन की शर्त नहीं मानी तो ताइवान को कर दिया WHO से बाहर