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सालाना 10 लाख करोड़ डॉलर का काम करती हैं महिलाएं, लेकिन अफसोस इसका कोई रिकॉर्ड नहीं!

oxfam report:घरेलू कामों में शहरी महिलाएं प्रतिदिन 312 मिनट और ग्रामीण महिलाएं औसतन 291 मिनट लगाती हैं.  

सालाना 10 लाख करोड़ डॉलर का काम करती हैं महिलाएं, लेकिन अफसोस इसका कोई रिकॉर्ड नहीं!
फाइल फोटो

नई दिल्लीः समाज में महिला और पुरुषों को बराबरी का हक मिला है, लेकिन इसकी जमीनी सच्चाई क्या है ये सब जानते हैं. इंटरनेशनल ग्रुप ऑक्सफेम ने दावोस में होने वाले वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम से ठीक पहले एक रिपोर्ट जारी की है, जो ये बताती है कि महिला और पुरुषों में कितनी गैरबराबरी है. दुनिया भर में घर और बच्चों की देखभाल करते हुए महिलाएं सालभर में कुल 10 लाख करोड़ डॉलर के बराबर ऐसा काम करती हैं जिसका न तो उन्हें कोई भुगतान किया जाता है, और न ही इसका कोई रिकॉर्ड है. महिलाओं के काम की ये वैल्यू, दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी एप्पल के सालाना कारोबार का 43 गुना है. 
 

भारत की क्या स्थिति?

रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में महिलाएं घर और बच्चों की देखभाल जैसे बिना वेतन वाले जो काम करती है, उसका मूल्य देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 3.1 प्रतिशत के बराबर है. इस तरह के कामों में शहरी महिलाएं प्रतिदिन 312 मिनट और ग्रामीण महिलाएं 291 मिनट लगाती हैं. इसकी तुलना में शहरी क्षेत्र के पुरुष बिना भुगतान वाले कामों में सिर्फ 29 मिनट ही लगाते हैं जबकि ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले पुरुष 32 मिनट खर्च करते हैं. ऑक्सफेम की रिपोर्ट कहती है कि भारत सहित अन्य देशों में आर्थिक असमानता से सबसे ज्यादा महिलाएं और लड़कियां प्रभावित हो रही हैं. यहां पुरुषों की तुलना में महिलाओं को वेतन वाले काम मिलने के आसार कम होते हैं. यहां तक की भारत के 119 अरबपतियों की सूची में सिर्फ 9 महिलाएं हैं. 

महिलाओं के साथ असमानता

रिपोर्ट में कहा गया है कि पुरुषों की तुलना में महिलाओं को काम के बदले कम वेतन मिलता है. महिलाओं और पुरुषों के वेतन में काफी अंतर है. इसलिए महिलाओं की कमाई पर निर्भर रहने वाले परिवार गरीब रह जाते हैं. देश में स्त्री-पुरुष के वेतन का अंतर 34 प्रतिशत है. यह भी सामने आया है कि जाति, वर्ग, धर्म, आयु और स्त्री-पुरुष भेदभाव जैसे कारणों का भी महिलाओं के प्रति असमानता पर प्रभाव पड़ता है. ऑक्सफैम ने ग्लोबल स्त्री-पुरुष असमानता सूचकांक 2018 में भारत की खराब रैंकिंग (108वें पायदान) का जिक्र करते हुए कहा कि इसमें 2006 के मुकाबले सिर्फ 10 स्थान की कमी आई है. भारत वैश्विक औसत से काफी पीछे है. यही नहीं, इस मामले में वह चीन और बांग्लादेश जैसे अपने पड़ोसी देश से भी पीछे है.

(इनपुटः भाषा)