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#Throwback: 'बाबुल की दुआएं...' के लिए जीता था रफी ने नेशनल अवॉर्ड, गाना सुनकर नम हो जाएंगी आंखें

जहां चाह है वहीं पर तो राह है...रफी साहब पर ये लाइनें सटीक बैठती हैं. किसी प्रोफेशनल गुरु को चुनने की बजाय रफी साहब ने गांव के फकीर की नकल कर गाना सीखा था. महज 13 साल की उम्र में उन्होंने अपनी पहली परफॉर्मेंस दी.

#Throwback: 'बाबुल की दुआएं...' के लिए जीता था रफी ने नेशनल अवॉर्ड, गाना सुनकर नम हो जाएंगी आंखें
मोहम्मद रफी (फोटो साभार: फाइल फोटो)

नई दिल्ली: आवाज के जादूगर लिजेंडरी सिंगर मोहम्मद रफी के गाने सुनकर आज भी लोग भावुक हो जाते हैं. हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में अपने काम से नाम कमाने वाले मोहम्मद रफी आज ही के दिन इस दुनिया से रुखस्त हो गए थे. मोहम्मद रफी ने 13 साल की उम्र में अपना पहला पब्लिक परफॉर्मेंस दिया था. 1941 में रफी ने पंजाबी फिल्म के लिए गाना गाया और उसके बाद आकाशवाणी लाहौर के लिए गाने से करियर की शुरुआत की थी. अपने तीन दशक से ज्यादा के करियर में रफी ने कई सुपरहिट गाने गाए. 94 साल पहले 24 दिसंबर को मोहम्म्द रफी का जन्म पंजाब के कोटला सुल्‍तान सिंह में हुआ था. 

फकीर की नकल कर सीखा गाना
जहां चाह है वहीं पर तो राह है...रफी साहब पर ये लाइनें सटीक बैठती हैं. किसी प्रोफेशनल गुरु को चुनने की बजाय रफी साहब ने गांव के फकीर की नकल कर गाना सीखा था. महज 13 साल की उम्र में उन्होंने अपनी पहली परफॉर्मेंस दी. इसके बाद उन्होंने उस्ताद अब्दुल वहीद खां, पंडित जीवन लाल मट्टू और फिरोज निजामी से शास्त्रीय संगीत का ज्ञान लिया, इसके बाद उन्होंने केएल सहगल के लिए गाने गए, फिर पंजाबी, आकाशवाड़ी और कई ऐसे गाने और नगमें आए, जिसने उनकी आवाज को अमर कर दिया. 

death anniversary mohammed rafi

'बाबुल की दुआएं लेती जा' के लिए जीता नेशनल अवॉर्ड 
मोहम्मद रफी ने किशोर कुमार की फिल्मों के लिए भी गीत गाये हैं जिनमें फिल्म 'बड़े सरकार', 'रागिनी' और कई फिल्‍में शामिल थीं. रफी ने किशोर कुमार के लिए करीब 11 गाने गाए. फिल्म 'नील कमल' का गाना 'बाबुल की दुआएं लेती जा' को गाते वक्‍त बार-बार रफी की आंखों में आंसू आ जाते थे और उसके पीछे कारण था कि इस गाने को गाने के ठीक एक दिन पहले उनकी बेटी की सगाई हुई थी इसलिए वो काफी भावुक थे, फिर भी उन्होंने ये गीत गाया और इस गीत के लिए उन्‍हें 'नेशनल अवॉर्ड' मिला. मोहम्मद रफी का आखिरी गीत फिल्म 'आस पास' के लिए था, जो उन्होंने लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के लिए निधन से ठीक दो दिन पहले रिकॉर्ड किया था, गीत के बोल थे 'शाम फिर क्यों उदास है दोस्त'.

B'day : मोहम्मद रफी ने 13 साल की उम्र में गाया था पहला गाना, पतंग उड़ाने का था शौक

अंतिम यात्रा में शामिल हुए 10000 लोग
6 फिल्मफेयर और 1 नेशनल अवार्ड रफी के नाम हैं. उन्हें भारत सरकार कि तरफ से 'पद्म श्री' सम्मान से भी सम्मानित किया गया था. रफी साहब ने भारतीय भाषाओं जैसे असमी, कोंकणी, पंजाबी, उड़िया, मराठी, बंगाली, भोजपुरी के साथ-साथ उन्होंने पारसी, डच, स्पेनिश और इंग्लिश में भी गीत गाए थे. जिस दिन मोहम्मद रफी निधन हुआ उस दिन मुंबई में जोरों की बारिश हो रही थी और फिर भी उनकी अंतिम यात्रा में 10000 लोग शामिल हुए थे. उस दिन मशहूर एक्टर मनोज कुमार ने कहा, 'सुरों की मां सरस्वती भी अपने आंसू बहा रही हैं आज'.

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