जम्‍मू-कश्‍मीर: ग़ाज़ी ही नहीं जैश के 30 आतंकियों ने 8 महीनों में की है घाटी में घुसपैठ

पिछली मई से अब तक जैश के कम से 30 आतंकवादी सरहद फांदकर कश्मीर में दाखिल हुए हैं. दिसंबर से अभी तक जैश के 11 आतंकवादियों के कश्मीर में घुसने की ख़बर खुफिया एजेंसियों ने दी है.

जम्‍मू-कश्‍मीर: ग़ाज़ी ही नहीं जैश के 30 आतंकियों ने 8 महीनों में की है घाटी में घुसपैठ
पिछले एक दशक में घाटी में भारतीय सुरक्षा बलों ने आतंक‍ियों की कमर तोड़ दी थी. फोटो : रॉयटर्स

नई दिल्‍ली: जम्‍मू-कश्‍मीर के पुलवामा में हुए हमले के बाद जैश-ए-मोहम्मद ने इस हमले की ज़िम्मेदारी ली है. जैश का पिछले दशक में सफ़ाया कर दिया गया था, लेकिन पिछले दो साल में केवल दक्षिण कश्मीर में ही जैश के कम से कम 40 आतंकवादी सक्रिय हैं. पिछली मई से अब तक जैश के कम से 30 आतंकवादी सरहद फांदकर कश्मीर में दाखिल हुए हैं. दिसंबर से अभी तक जैश के 11 आतंकवादियों के कश्मीर में घुसने की ख़बर खुफिया एजेंसियों ने दी है.

ग़ाज़ी बाबा, सहराई बाबा और ज़हूर जैसे जैश के कमांडरों के पिछले दशक में एक के बाद एक मारे जाने के बाद कश्मीर से करीब करीब जैश का सफाया हो गया था. हिज़बुल मुज़ाहिदीन के आतंकी सरगनाओं के सफ़ाए के बाद पाकिस्तान आतंक फैलाने के लिए जैश को ज्यादा ताक़तवर बना रहा है. हिज़्बुल के आतंकियों के मुक़ाबले जैश के आतंकवादी ज्यादा ट्रेंड और मोटीवेटेड होते हैं. जैश में ज्यादा आतंकी पाकिस्तान के पंजाब इलाक़े से भर्ती होते हैं और फ़िर उनको आईएसआई की देखरेख में पाकिस्तानी सेना ट्रेंड करती है.

पिछले कुछ महीने में इन आतंकवादियों ने जम्मू के नीचे के इलाक़े की सरहद से घुसपैठ जारी रखी. यहां सरहद पर सरकंडे उन्हें छिपने में मदद करते हैं और बेन नदी के साथ-साथ वो जम्मू की तरफ़ बढ़ते हैं. एक बार राजमार्ग पर पहुंचने के बाद आतंकी किसी ट्रक के ज़रिए आसानी से सफ़र कर लेते हैं. बनिहाल पास पारकर काज़ीगुंड पहुंचकर स्थानीय मददगार के ज़रिए वो आसानी से दक्षिण कश्मीर की आबादी में मिल जाते हैं. सुरक्षा एजेंसियों को घुसपैठियों के जम्मू के होटलों में रुकने और फिर कश्मीर जाने की भी जानकारी मिली थी.

आतंकवादी घुसपैठ के लिए उन रातों का इस्तेमाल करते हैं जब आसमान में चांद छोटा होता है. इस दौरान घना अंधेरा उनकी मदद करता है. 5 फ़रवरी की रात को सरहद पर आतंकवादियों के एक गिरोह पर सुरक्षा बलों ने गोली भी चलाई थी. बाद में उस इलाक़े में तलाशी के दौरान खून के निशान मिले थे, लेकिन आतंकवादियों को नहीं पकड़ा जा सका.

अधिकारियों का कहना है कि दक्षिण कश्मीर में जैश के मददगारों यानि ओवर ग्राउंड वर्कर्स जिन्हें ओजीडव्ल्यू कहते हैं का नेटवर्क खासा मज़बूत हो गया है. पुलवामा अटैक में स्थानीय आत्मघाती हमलावर को रिक्रूट कर पाना इस नेटवर्क का सबूत है.