आगर-मालवा में शो-पीस बने हैंडपंप और कुएं, एक ही गड्ढे का पानी पी रहे जानवर और ग्रामीण

सूखी पड़ी नदी और मुंह चिढ़ाते कुएं, प्यासे कंठों को और अधिक मजबूर कर जाते हैं. किसी समय में मालवा क्षेत्र में कल-कल नीर बहता हुआ दिखाई देता था, लेकिन निरंतर अनदेखी के चलते अब एक-एक बूंद के लिए क्षेत्रवासियों को तरसते हुए देखा जा रहा है. 

आगर-मालवा में शो-पीस बने हैंडपंप और कुएं, एक ही गड्ढे का पानी पी रहे जानवर और ग्रामीण
फाइल फोटो- (फोटो साभारः हमारी सहयोगी वेबसाइट DNA India)

इंदौरः आगर-मालवा जिले की ग्राम पंचायत जेतपुरा के ग्राम लखमनखेड़ी के ग्रामीण एक-एक बूंद पानी के लिए तरस रहे हैं. लखमनखेड़ी के मझराखेड़ा में तो स्थिति विकराल रूप धारण कर चुकी है. यहां के ग्रामीण व मवेशी सभी एक गड्ढे का पानी को मजबूर हैं. भीषण गर्मी, झुलसा देने वाली चिलचिलाती धूप और अपना रंग दिखाने पर आमादा पानी. निर्मल नीर की पथरीली डगर पर बूंद-बूंद को तरसती जिंदगियां कई किलोमीटर दूर तक भटकने को मजबूर हैं. सूखी पड़ी नदी और मुंह चिढ़ाते कुएं, प्यासे कंठों को और अधिक मजबूर कर जाते हैं. किसी समय में मालवा क्षेत्र में कल-कल नीर बहता हुआ दिखाई देता था, लेकिन निरंतर अनदेखी के चलते अब एक-एक बूंद के लिए क्षेत्रवासियों को तरसते हुए देखा जा रहा है. 

नदी-नाले, तालाब तो गर्मी की शुरुआत में ही सूख जाते हैं. अन्य जल स्रोत भी धीरे-धीरे साथ छोडऩे लगे हैं. जिले के अधिकांश गांव इन दिनों जलसंकट की चपेट में आ चुके हैं. ग्राम पंचायत जेतपुरा के ग्राम लखमनखेड़ी की आबादी करीब 800 से अधिक है. आबादी का एक हिस्सा गांव के मझरे खेड़ा में रहता है. दोनों ही आबादी क्षेत्र में इन दिनो भीषण जलसंकट छाया हुआ है. लखमनखेड़ी की बात की जाए तो यहां के सभी हैंडपम्प दम तोड़ चुके हैं. गांव में एक निजी कुआं है जिससे लखमनखेड़ी के ग्रामीणों को पानी मिल रहा है लेकिन वह भी काफी मशक्कत के बाद मिल पाता है. यह कुआं सिर्फ आधा घंटा पानी देता है उसके बाद उसमें वापस पानी एकत्रित होने के लिए २-३ घंटे से अधिक का समय लगता है. 

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ऐसी दशा में आधे से अधिक ग्रामीणों को पानी ही नहीं मिल पाता है. खेतों पर बने कुओं से जैसे-तैसे पानी की पूर्ति की जाती है. खेड़ा के हालात की बात की जाए तो यहां तो दयनीय स्थिति का सामना ग्रामीणों को करना पड़ रहा है. लखमनखेड़ी एवं खेड़ा के बीच करीब 500 मीटर की दूरी है और खेड़ा में पानी का कोई स्रोत नहीं है. खेड़ा एवं लखमनखेड़ी के बीच से निकल रही नदी के एक कोने में इन ग्रामीणों ने गड्ढ़ा कर रखा है जिसे ग्रामीण भाषा में झरी कहा जाता है और इसी झरी से ग्रामीण अपनी प्यास बुझा रहे हैं. जिस गड्ढे में मवेशी पानी पीते हैं उसी गड्ढे का पानी ग्रामीणों को भी मजबूरन पीना पड़ रहा है. गंदा पानी पीने से बीमारियां भी पैर पसार रही है.