चुनाव प्रबंधन’ एक नकारात्मक चलन, इसकी आड़ में दब जाते हैं जनता के मुद्दे : प्रो. सुधा पाई

 पश्चिम बंगाल में 2021 के विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस की चुनावी रणनीति बनाने का जिम्मा लेकर भारतीय राजनीति में ‘‘चुनाव प्रबंधन’’ की नयी संकल्पना पर बहस तेज कर दी है.

चुनाव प्रबंधन’ एक नकारात्मक चलन, इसकी आड़ में दब जाते हैं जनता के मुद्दे : प्रो. सुधा पाई
भारतीय राजनीति में ‘‘चुनाव प्रबंधन’’ की नयी संकल्पना पर बहस तेज कर दी है.

नई दिल्ली: चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने पश्चिम बंगाल में 2021 के विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस की चुनावी रणनीति बनाने का जिम्मा लेकर भारतीय राजनीति में ‘‘चुनाव प्रबंधन’’ की नयी संकल्पना पर बहस तेज कर दी है. पश्चिमी देशों के बाद अब भारत में चुनाव के ‘प्रबंधन’ में तब्दील होने की अवधारणा के बारे में पेश हैं राजनीति विज्ञान की प्रोफेसर सुधा पाई से भाषा के पांच सवाल और उनके जवाब :- 

सवाल : चुनाव में अब नेताओं को रणनीतिकारों की जरूरत क्यों महसूस होने लगी है? क्या प्रशांत किशोर ने वाकई राजनीतिक दलों के लिये रणनीतिकार रखने को चुनाव जीतने का सुविधाजनक तरीका बना दिया है? 

जवाब : भारत में चुनाव के स्वरूप में पिछले तीन दशक में व्यापक बदलाव आया है. अत्याधुनिक तकनीक, सोशल मीडिया और समाज में उपभोक्तावादी मध्य वर्ग का इजाफा इस बदलाव के प्रमुख कारक हैं. इनकी वजह से पार्टी की विचारधारा से इतर उनके नेताओं की छवि को उभारना और उनके बारे में खास धारणायें गढ़ कर, चुनावी मुद्दों को राजनीतिक दलों की मर्जी से नया स्वरूप देना ही ‘चुनावी प्रबंधन’ है, जो भारत के बदलते चुनावी परिदृश्य में चुनाव की रणनीति का अहम हिस्सा बन गया है. प्रबंधन में जिस प्रकार से किसी उत्पाद की ब्रांडिंग कर उसे ‘मार्केटिंग स्ट्रेटजी’ के जरिये उपभोक्ताओं की ‘जरूरत’ साबित किया जाता है, वैसे ही चुनावी प्रबंधन में किसी एक नेता को चुनाव का चेहरा बनाकर उसकी इस प्रकार से ब्रांडिंग की जाती है कि जनता उसे अपनी जरूरत समझने लगे.

 

सवाल : चुनावी प्रबंधन की यह नयी अवधारणा, क्या वास्तव में असरकारी है ? 

जवाब : चुनाव जीतने की रणनीति बनाकर, राजनीतिक दलों की जरूरत के मुताबिक चुनाव को दिशा देना, एक वैश्विक अवधारणा है जो अमेरिका से लेकर तुर्की तक, तमाम विकसित देशों में प्रचलित है. इसमें ‘इमेज बिल्डिंग’ या छवि का निर्माण चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा हो गया है. भारतीय चुनाव में इस अवधारणा ने पिछले एक दशक में अपनी जगह बनायी है. वैश्वीकरण के फलस्वरूप 2000 के बाद भारत में मध्य वर्ग तेजी बदला है. समाज में उपभोक्तावाद की जड़ें गहराने के कारण निचले और मध्य वर्ग की सियासी दलों से अपेक्षायें बढ़ी हैं. ऐसे में चुनावी प्रबंधन की रणनीति के तहत एक व्यक्ति को इस रूप में पेश किया जाता है, जो सबकी अपेक्षायें पूरी करने में सक्षम हो. चुनाव परिणाम बताते हैं कि ब्रांडिंग के इस तरीके ने मतदाताओं पर असर छोड़ा है. 

सवाल : एक ही रणनीतिकार विपरीत विचारधारा वाले दलों की सफल चुनावी रणनीति बनाता है, क्या यह माना जाये कि अब चुनाव में दलों की विचारधारा पीछे रह गयी है? 

जवाब : व्यवहारिक बात तो यह है कि चुनाव में दलों की विचारधारा का कोई महत्व नहीं है. मकसद, चुनाव जीतना होता है. चुनाव में इमेज बिल्डिंग और ब्रांडिंग जब व्यक्तियों की होती है तब व्यक्ति, पार्टी और विचारधारा से बड़ा हो जाता है. ऐसे में विचारधारा ही नहीं बल्कि चुनाव में जनता के असल मुद्दे भी पीछे रह जाते है. इस प्रकार के चुनाव में इमेज बिल्डिंग और ब्रांडिंग के सभी तरीके अख्तियार किये जाते हैं. कुल मिला कर यह खेल धारणायें गढ़ने का है. इसमें बेरोजगारी, विकास और जनसरोकार से जुड़े अन्य मुद्दे, दूसरे दल चाहकर भी नहीं उठा पाते हैं. 

सवाल : लोकसभा चुनाव 2019 में भाजपा और कांग्रेस, दोनों ने चुनाव प्रबंधन का भरपूर इस्तेमाल किया. लेकिन कांग्रेस नाकाम क्यों रही? 

जवाब : चुनाव प्रबंधन के इस्तेमाल की तुलनात्मक बात की जाये तो मुझे ऐसा लगता है कि भाजपा ने सिर्फ सोशल मीडिया ही नहीं, बल्कि जमीन पर कार्यकर्ताओं की बदौलत व्यापक वर्ग तक पहुचंने की आक्रामक कोशिश की. मसलन, उनके कार्यकर्ता उन घरों में भी गये जिन्हें गैस चूल्हा नहीं मिला था और इस योजना के लाभार्थियों का हवाला देकर कहा कि जो वंचित रह गये हैं, उन्हें भी चूल्हा मिलने वाला है. इससे एक माहौल बनाने की कोशिश की गयी कि अगर नरेंद्र मोदी फिर से प्रधानमंत्री नहीं बने तो ऐसी तमाम योजनाओं का लाभ शेष लाभार्थियों को नहीं मिल पायेगा. इसके अलावा भाजपा ने अपने प्रचार तंत्र के माध्यम से अपने विरोधियों को राष्ट्रविरोधी करार देने में भी कामयाबी हासिल की, जिससे राष्ट्रवाद का मुद्दा हावी हो गया. 

सवाल : रणनीति के नाम पर चुनाव में ‘प्रबंधन’ का भारत में क्या भविष्य है और क्या यह भारतीय राजनीति में एक नये पेशे के लिये दरवाजे खोल रहा है? 

जवाब : निश्चित रुप से, मैं इसे नकारात्मक प्रचलन मानती हूं. क्योंकि रणनीति और प्रबंधन की आड़ में जनता के मुद्दे सामने आ ही नहीं पाते हैं. ऐसे में चुनाव पूरी तरह से छद्म युद्ध जैसा लगने लगता है. जहां तक इसके भविष्य की बात है तो भारत में अभी इस चलन की शुरुआत है, इसका असर इतने जल्दी दूर नहीं होगा. यह भी सही है कि चुनाव में रणनीति बनाना, मार्केटिंग और ब्रांडिंग करने जैसे नये आयाम जुड़ने के साथ ही प्रबंधन के छात्रों के लिये संभावनाओं के द्वार तो खुले ही हैं. लेकिन मैं फिर कहूंगी कि ऐसी चीजें कामयाबी का अंतिम विकल्प नहीं होती हैं. इसलिये यह अवधारणा कितने समय तक टिकेगी, यह देखने वाली बात होगी.