कोटा: सरकारी सुविधाओं से अब भी दूर शाहाबाद का भील समाज, प्रशासन बेखबर

क्षेत्र में एक दर्जन से अधिक इस भील समाज के गांव हैं लेकिन इनकी दूरी सुविधा क्षेत्र से काफी अधिक है.

कोटा: सरकारी सुविधाओं से अब भी दूर शाहाबाद का भील समाज, प्रशासन बेखबर
सुरजा भील ने बताया कि खाद्य सामग्री लेने के लिए करीब 5 किलोमीटर जाना पड़ता है.

राम प्रसाद मेहता/बारां: कोटा संभाग के बारां जिले के आदिवासी क्षेत्र शाहाबाद के दूरस्त इलाके में बसे कई परिवार अब भी सरकारी सुविधाओं के लिए मशक्कत कर रहे हैं. यहां के लोगों के लिए शिक्षा, चिकित्सा और राशन तक की सरकारी सुविधा लेना मशक्कत भरा काम है. 

यहां तक कि इनको सरकारी सुविधाओं की जानकारी तक नहीं है. बच्चे कहने भर को स्कूल जाते हैं. उनके सामने अपने परिवार का पेट भरें या स्कूल जाएं यह सवाल मुंह बाए खड़ा रहता है. ऐसे में गरीबी के चलते ही कई परिवार अपने बच्चों को भैड़ चराने वाले पशु पालकों के पास गिरवी तक रख देते हैं. शाहाबाद ब्लॉक में 172 सरकारी स्कूल हैं. इनमें दो हजार के आसपास इन गरीब बच्चों का नामांकन है, लेकिन स्कूल में इनकी उपस्थिति नाम मात्र की ही रहती है। 

वहीं, गांव के लोगों का कहना है कि सरकार स्कूल तो खोलती है लेकिन वहां व्यवस्थाएं ठीक नहीं चलती. सवाल हमारे पेट का है. बच्चे पढ़ते नहीं हैं. ऐसे में हम उन्हें काम पर भेज देते हैं. अध्यापक बच्चों को सही तरीके से पढ़ाते नहीं है. साथ ही समय पर भी विद्यालय नहीं आते हैं और जल्दी चले जाते हैं. ऐसे में बच्चों को पढ़ाई का माहौल नहीं मिल पाता है. विद्यालय में बच्चों को पढने के लिए भेजते हैं तो वहां भी वह मौज मस्ती करते नजर आते हैं. इसलिए बच्चों को काम पर भेज देते हैं. सरकारी स्कूलों में भेजते हैं तो ना तो बच्चे पढ़ पाते हैं ना काम कर पाते हैं. 

यही हाल चिकित्सा का है. उपखंड़ में तीन सामुदायिक केन्द्र, तीन प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र और चालीस सब सेन्टर हैं. कभी कभार कोई बीमार हो जाए तो इन सेन्टर तक पहुंचना ही भारी होता है. क्षेत्र में एक दर्जन से अधिक इस भील समाज के गांव हैं लेकिन इनकी दूरी सुविधा क्षेत्र से काफी अधिक है. कभी कभार हम पहुंच जाएं तो हमें हिकारत की दृष्टि से देखा जाता है. कुछ गोलियां पकड़ा कर टरकाने की प्रवृति रहती है. ज्यादा हो तो शाहाबाद रैफर कर देते हैं. गांव से सब सेन्टर की दूरी चार से पांच किलोमीटर तक है. ऐसे में ज्यादातर लोग नाम हकीम से ही इलाज करवा लेते हैं. 

आदिवासियों को समय पर खाद्य सामग्री उपलब्ध कराने के लिए ब्लॉक में 72 खाद सुरक्षा की दुकानें खोल रखी हैं लेकिन भील समाज के लोगों को खाद सुरक्षा का भी पूरा लाभ नहीं मिल पा रहा है. भील समाज के लोग खेतों पर टापरी बनाकर रहते हैं. इनको गेहूं वितरण की सूचना समय पर नहीं मिल पाती है. ऐसे में कई परिवारों को इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है. 

सुरजा भील ने बताया कि खाद्य सामग्री लेने के लिए करीब 5 किलोमीटर जाना पड़ता है. उसके पति के दोनों पैर कट जाने की वजह से पूरे परिवार की जिम्मेदारी सुरजा पर ही रहती है. उसके तीन छोटे बच्चे हैं. छोटे बच्चों को पति के पास छोड़कर गेहूं लेने जाते हैं तो कई बार तो पूरा दिन इंतजार में ही निकल जाता है.