दलितों को समान अधिकार देने के लिए लागू हुआ था आरक्षण, राजनीति में बना सियासी मुद्दा

देश में बड़ी तेजी से वोट बैंक के साथ-साथ यह मुद्दा भावनात्मक, आर्थिक, जातिगत और राजनीतिक तौर पर बढ़ता ही जा रहा है. अब केवल दलित और पिछड़ी जातियों को ही नहीं, बल्कि अगड़ो को भी 10 फीसदी आरक्षण का लाभ मिलने लगा है. 

दलितों को समान अधिकार देने के लिए लागू हुआ था आरक्षण, राजनीति में बना सियासी मुद्दा
1882 में महाराष्ट्र के कोल्हापुर में लागू हुआ था आरक्षण. (फाइल फोटो)

जयपुर: देश में संविधान निर्माता भीमराव अंबेडकर के नेतृत्व में आरक्षण की व्यवस्था इसलिए लागू की गई थी, ताकि गरीब और पिछड़ी जातियों को समानता का अधिकार मिल सके. लेकिन आज के परिप्रेक्ष्य में आरक्षण के मुद्दे का पूरी तरह से राजनीतिकरण होता दिख रहा है. जातियों को आरक्षण देने के नाम पर राजनीतिक दलों का पूरा फोकस जाति आधारित वोट बैंक को समेटने पर रहता है.

आज देश में आरक्षण का मुद्दा इतना ज्वलंत है कि कोई भी राजनीतिक पार्टी इसे समाप्त करने के बारे में सोचना भी नहीं चाहती. देश में बड़ी तेजी से वोट बैंक के साथ-साथ यह मुद्दा भावनात्मक, आर्थिक, जातिगत और राजनीतिक तौर पर बढ़ता ही जा रहा है. अब केवल दलित और पिछड़ी जातियों को ही नहीं, बल्कि अगड़ो को भी 10 फीसदी आरक्षण का लाभ मिलने लगा है. 

1882 में लागू हुआ था आरक्षण
भारत में आरक्षण सबसे पहले 1882 में शुरू किया गया था. महाराष्ट्र में कोल्हापुर के महाराज साहू ने इसे वहां लागू किया था. सामाजिक सुधार के लिए साहू ने आरक्षण लागू किया. वे बहुत उदार और प्रगतिशील सोच वाले व्यक्ति थे. उन्होंने राज्य में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए सबसे पहले आरक्षण की व्यवस्था की. इसके अलावा महाराष्ट्र के सामाजिक सुधार में भी उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.

प्रारूप समिति के अध्यक्ष थे अंबेडकर 
डॉ भीमराव अंबेडकर ने स्वतंत्रता के बाद संविधान बनाने में भी संविधान निर्माताओं का सहयोग किया. वे भारतीय संविधान सभा के प्रारूप समिति के अध्यक्ष भी थे. संविधान निर्माण के समय उन्होंने आरक्षण लागू करने की पहल की थी. इसके साथ दलितों के उत्थान के लिए आरक्षण कैसे मदद कर सकता है, इसकी जरूरत भी बताई. 

दलितों के विशेषाधिकार के लिए मिला था आरक्षण
उस समय दलित जाति के लोग काफी गरीब थे और ऊंची जाति के लोग उनका शोषण करते थे. आरक्षण लागू करने के अलावा दलितों के विशेषाधिकार के लिए की गई इस वयवस्था को अगले 10 साल तक जारी रखने का प्रावधान किया गया था. इसके बावजूद दलितों को मिल रहा आरक्षण अब तक जारी है. आरक्षण के मुद्दे पर संविधान में होने वाला संशोधन सवाल खड़ा करता है कि आखिर राजनीतिक दल इसके नाम पर कब तक वोटबैंक पर निशाना साधते रहेंगे.