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कोटा: Thalassemia के मरीजों के लिए नहीं ब्लड नेट टेस्टिंग मशीन, 300 किमी दूर भेजे जाते सैंपल

नेट टेस्टिंग की मशीन करीब 2 करोड़ रुपये की लागत से आती है. 

कोटा: Thalassemia के मरीजों के लिए नहीं ब्लड नेट टेस्टिंग मशीन, 300 किमी दूर भेजे जाते सैंपल
कोटा में सबसे ज्यादा थैलीसीमिया मरीज होने के बाद भी यहां नेट टेस्टेड ब्लड की मशीन नहीं है.

मुकेश सोनी, कोटा: संभाग में प्रदेश में सबसे ज्यादा थैलीसीमिया मरीज होने के बाद भी यहां नेट टेस्टेड ब्लड की मशीन नहीं है. ऐसे में यहां से थैलीसीमिया, सिकल सेल एनीमिया, हीमोफीलिया जैसे मरीजों को ट्रांसफ्यूज किए जाने वाले सैंपल करीब 300 किलोमीटर दूर उदयपुर भेजे जा रहे हैं. जांच के बाद नेट टेस्ट में ओके रिपोर्ट ऑनलाइन मिलने के बाद ब्लड मरीजों को चढ़ाया जा रहा है. 

सरकार ने अजमेर, कोटा और झालावाड़ के लिए एमबी चिकित्सालय उदयपुर के ब्लड बैंक को नोडल सेंटर बना रखा है. थैलीसीमिया समेत अन्य ब्लड डिसऑर्डर के शिकार मरीजों के लिए नेट (न्यूक्लिक एसिड टेस्ट) टेस्ट निशुल्क मुहैया कराया जा रहा है.

क्या नेट टेस्टिंग?
नेट टेस्टेड ब्लड मिलने से मरीजों में एचआईवी या हैपेटाइटिस जैसे संक्रमण की संभावना लगभग खत्म हो जाती है. नेट टेस्ट का विंडो पीरियड 5 से 7 दिन होता है. यानी ब्लड देने वाले मरीज के रक्त में 5 दिन पहले भी कोई इंफेक्शन हुआ है, वह जांच में डिटेक्ट जो जाता है. कोटा मेडिकल कॉलेज के ब्लड ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन विभाग के एचओडी डॉ. एचएल मीणा ने बताया कि अभी यहां फोर्थ जनरेशन किट से ब्लड टेस्ट किया जाता है. इसका विंडो पीरियड 15 से 21 दिन होता है यानी ब्लड देने वाले मरीज के रक्त में 14 दिन पहले भी कोई इंफेक्शन हुआ है, वह जांच में डिटेक्ट नहीं होगा और इन्फेक्टेड ब्लड दूसरे मरीज को चढ़ जाएगा.

सरकार ने मरीजों को संक्रमण रहित ब्लड की सुविधा मुहैया कराने का प्रयास किया है. इसी के तहत कोटा से दो-तीन दिन के अंतराल में करीब 100 ब्लड के सैंपल नेट टेस्टिंग के लिए उदयपुर भेजे जा रहे हैं ताकि ब्लड में इंफेक्शन का पता चल सके. कई मामलों में हैपेटाइटिस बी और सी और एचआईवी का संक्रमण होने की आशंका ज्यादा रहती है. खासकर उन मरीजों में, जो ब्लड डिसऑर्डर के शिकार होते हैं और उन्हें रेगुलर ब्लड चढ़ाना पड़ता है.

760 मरीज फिर भी नेट टेस्टिंग मशीन नहीं
कोटा ब्लड बैंक में बारां, बूंदी, झालावाड़, सवाई माधोपुर, चित्तौड़, भीलवाडा, टोंक सहित मध्यप्रदेश से भी मरीज आते हैं. जानकारी के मुताबिक, कोटा ब्लड बैंक में 760 थैलीसीमिया के केस रजिस्टर्ड हैं, जो प्रदेश में सबसे ज्यादा हैं. फिलहाल मरीजों को ट्रांसफ्यूज किए जाने वाले सैंपल पिछले 5 महीनों से उदयपुर भेजे जा रहे हैं, जिनकी जांच रिपोर्ट आने में तीन दिन का समय लगता है. मरीजों की संख्या को देखते हुए कोटा में ब्लड नेट टेस्टिंग मशीन की आवश्यकता है.
नेट टेस्टिंग की मशीन करीब 2 करोड़ रुपये की लागत से आती है. कोटा मेडिकल कॉलेज के ब्लड ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन विभाग के एचओडी डॉ. एचएल मीणा ने बताया कोटा ब्लड बैंक के लिए मशीन खरीदने के प्रस्ताव सरकार को भिजवाए गए हैं.