...जब हैदराबाद के निजाम को जाना पड़ा था अदालत

हैदराबाद के निजाम के आभूषणों का यह संग्रह भारत सरकार के स्वामित्व में है. इसी संग्रह में वह ‘जैकब’ हीरा भी शामिल है जिसकी वजह से छठे निजाम महबूब अली खान को कलकत्ता उच्च न्यायालय जाना पड़ा.

...जब हैदराबाद के निजाम को जाना पड़ा था अदालत
हैदराबाद के निजाम के आभूषणों का यह संग्रह भारत सरकार के स्वामित्व में है.

नई दिल्ली : अपने देश का इतिहास एक से बढ़कर एक रोचक किस्सों से भरा पड़ा है. ऐसा ही एक किस्सा हैदराबाद के निजाम से जुड़ा है. उनकी रियासत में गोलकुंडा के हीरे की खानें थीं, लेकिन एक विदेशी हीरा उन्हें अदालत तक ले गया और बाद में उन्हें इसके लिए अदालत के बाहर समझौता करना पड़ा. फिलहाल इस हीरे को पांच मई तक दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय में एक प्रदर्शनी में देखा जा सकता है.

हैदराबाद के निजाम के आभूषणों का यह संग्रह भारत सरकार के स्वामित्व में है. इसी संग्रह में वह ‘जैकब’ हीरा भी शामिल है जिसकी वजह से छठे निजाम महबूब अली खान को कलकत्ता उच्च न्यायालय जाना पड़ा.

राष्ट्रीय संग्रहालय संस्थान से संरक्षण में परास्नातक और प्रदर्शनी की गाइड निशा पुनिया ने इस कहानी के बारे में कहा, ‘‘ यह हीरा दक्षिण अफ्रीका की किंबरले खदान से निकला था. कई हाथों से होता हुआ यह हीरा 1890 में कारोबारी मैल्कम जैकब के पास पहुंचा और उन्होंने इसे महबूब अली को बेचने के लिए पेश किया. इसका सौदा 46 लाख रुपये में तय हुआ और निजाम ने 23 लाख रुपये बतौर पेशगी दिए. लेकिन तब अंग्रेजों के रेजिडेंट को यह बात पसंद नहीं आयी कि निजाम हीरा खरीदने पर इतनी रकम खर्च कर दें. इसके चलते निजाम ने हीरा खरीदने से मना कर दिया और जैकब से पेशगी के रुपये वापस मांगे.’’ 

उन्होंने कहा, ‘‘लेकिन जैकब ने यह रुपये देने से मना कर दिया. जैकब के रुपये देने से मना करने के बाद निजाम ने कलकत्ता उच्च न्यायालय में मुकदमा दायर किया. बाद में इस पर अदालत से बाहर फैसला हुआ और निजाम ने बाकी रुपये देकर यह हीरा लिया.’’ 

पुनिया ने कहा, ‘‘हालांकि इस बात से निजाम इतना आहत हुए कि उन्होंने कोहिनूर से लगभग दोगुने आकार के इस हीरे को अपनी जूती के अंदर दबाकर रखा. उनका मानना था कि अपनी रियासत में अब तक वह सारे फैसले लेते आए हैं. लेकिन इस हीरे की वजह से उन्हें अदालत तक जाना पड़ा. बाद में यह हीरा उनके बेटे और सातवें निजाम उस्मान अली खान ने सोने में जड़वाकर ‘पेपरवेट’ की तरह उपयोग किया.’’ 

राष्ट्रीय संग्रहालय में लगी इस प्रदर्शनी में निजाम के गोलकुंडा के हीरों, बसरा (इराक) के मोतियों, कोलंबिया के पन्ना और बर्मा के माणिकों से बने कई आभूषण प्रदर्शित किए गए हैं. इनमें कई तरह के बाजूबंद भी शामिल हैं, जिन पर आगे की तरफ हीरे एवं बहूमूल्य पत्थरों का काम है जबकि पीछे की तरफ मीनाकारी का काम है.

पुनिया ने कहा, ‘‘मीनाकारी के काम की अहम बात इसमें लाल और हरे रंग का उपयोग होना है. इन रंगों को विशेष नाम भी दिया गया था, जैसे लाल रंग को उस दौर में ‘खून-ए-कबूतर’ और हरे रंग को ‘गर्दन-ए-मोर’ कहा जाता था.’’ 

इस संग्रह में एक ‘अलेक्जेंडर पत्थर’ की अंगूठी भी है. इस पत्थर को रूस की उराल पहाड़ियों से निकाला गया. इस पत्थर की खास बात इसका रंग बदलना है.

इस आभूषण संग्रह को 1995 में भारत सरकार ने निजाम के न्यास से 218 करोड़ रुपये में खरीदा था. पांच मई तक चलने वाली इस प्रदर्शनी के लिए अलग से 50 रुपये का टिकट लगेगा और केवल 30 मिनट का समय दर्शकों को दिया जाएगा. हालांकि लोग यहां 58 फलक वाले जैकब हीरे की अनुकृति भी खरीद सकते हैं.