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ZEE जानकारी: स्कूली किताबों में इतिहास के साथ राजनीति का विश्लेषण

हर देश के अपने आदर्श पुरुष और महापुरुष होते हैं और वहां के लोग इऩ महापुरुषों में आस्था रखते हैं, इन्हें लेकर विवाद और राजनीति नहीं करते. लेकिन हमारे देश में महापुरुषों को लेकर भी विवाद होते हैं.

ZEE जानकारी: स्कूली किताबों में इतिहास के साथ राजनीति का विश्लेषण

आज हम विश्लेषण की शुरुआत, वीर सावरकर की वीरता से जुड़े प्रश्न से करेंगे . 
क्या मशहूर स्वतंत्रता सेनानी वीर सावरकर, वीर नहीं थे ? कायर थे ? क्या उन्हें वीर कहना गलत है? 
इस सवाल का जवाब ढूंढने के लिए इतिहास का गहराई से अध्ययन करना ज़रूरी है? 

लेकिन उससे पहले आपको इस विश्लेषण की भूमिका को समझना होगा.

हर देश के अपने आदर्श पुरुष और महापुरुष होते हैं और वहां के लोग इऩ महापुरुषों में आस्था रखते हैं, इन्हें लेकर विवाद और राजनीति नहीं करते. लेकिन हमारे देश में महापुरुषों को लेकर भी विवाद होते हैं. अंग्रेज़ों के खिलाफ संघर्ष करने वाले क्रांतिकारी विनायक दामोदर सावरकर की भूमिका को लेकर आज भी वैचारिक संघर्ष हो रहा है. बीजेपी, वीर सावरकर को एक वीर क्रांतिकारी और महान देशभक्त बताती है . लेकिन कांग्रेस पार्टी कहती है कि वीर सावरकर, अंग्रेज़ों के सामने झुक गये थे और उन्होंने अंग्रेज़ों से माफी मांग ली थी. इसलिए उन्हें वीर नहीं कहा जा सकता. वीर सावरकर को लेकर कांग्रेस और बीजेपी की सोच में य़े मूल अंतर है.

अब ये देखिए कि वीर सावरकर की वीरता पर आज सवाल क्यों उठ रहे हैं ? राजस्थान की कांग्रेस सरकार ने राजस्थान बोर्ड के पाठ्यक्रम में विनायक दमादोर सावरकर से जुड़े अध्याय में बड़ा बदलाव किया है .

पहले पाठ्यक्रम में वीर सावरकर के शीर्षक से एक अध्याय प्रकाशित किया गया था . लेकिन कांग्रेस सरकार ने अब ये शीर्षक बदल दिया है . और अध्याय का नया शीर्षक है... विनायक दामोदर सावरकर . यानी शीर्षक से वीर शब्द हटा दिया गया है.

पहले वीर सावरकर के लिए ये लिखा गया था कि वो एक वीर क्रांतिकारी थे और अपने दौर के बड़े क्रांतिकारियों में से एक थे. लेकिन कांग्रेस की सरकार ने इसे बदल दिया है... नए पाठ्यक्रम में सावरकर के बारे में लिखा गया है कि वो एक क्रांतिकारी थे लेकिन जेल की यातनाओं से प्रताड़ित होकर उन्होंने 4 बार ब्रिटिश सरकार के सामने दया याचिका लगाई थी . 

इसके साथ ही देश में एक अजीबोगरीब स्थिति पैदा हो गई है. अब राजस्थान की सीमाओं में, पाठ्य पुस्तकों में वीर सावरकर को सिर्फ सावरकर कहा जाएगा, जबकि राजस्थान के बाहर भारत के दूसरे हिस्सों में उन्हें वीर सावरकर कहा जाएगा. यानी एक ही व्यक्ति को देश के एक कोने में कायर माना जाएगा और दूसरे कोने में वीर माना जाएगा. ये बहुत बड़े भ्रम की स्थिति है 

इस बदलाव के बाद पूरे देश में एक बार फिर वीर सावरकर के व्यक्तित्व और चरित्र पर एक विवाद छिड़ गया है . इसीलिए आज हमने वीर सावरकर के जीवन का अध्ययन किया है. और इस विषय से जुड़े कई Experts से बात की है. हमें जो जानकारियां मिलीं उनके मुताबिक - 

वर्ष 1927 में महात्मा गांधी ने महाराष्ट्र के रत्नागिरि में अपनी पत्नी कस्तूरबा गांधी के साथ वीर सावरकर से मुलाकात की थी . महात्मा गांधी के वीर सावरकर से मतभेद ज़रूर थे लेकिन वो वीर सावरकर की देशभक्ति से प्रभावित थे . 

आज़ादी के बाद भारत में स्कूलों में पढ़ाने के लिए इतिहास की तमाम किताबें लिखी गईं . लेकिन कांग्रेस की पुरानी सरकारों के दौर में भी वीर सावरकर का इस तरह अपमान नहीं किया गया था . कांग्रेस के राज में भी स्कूल के पाठ्यक्रम में विनायक दामोदर सावरकर को वीर सावरकर ही लिखा गया . ऐसे में अचानक राजस्थान की कांग्रेस सरकार ने ये बदलाव क्यों किया ? क्या वीर सावरकर का अपमान इसलिए किया जा रहा है क्योंकि वो कांग्रेस पार्टी की मुख्य विरोधी पार्टी बीजेपी के आदर्श पुरुष हैं ?

क्रांतिकारियों और महापुरुषों के बारे में भ्रामक जानकारियां देश के सामने नहीं आनी चाहिए . इसीलिए आज हमने विनायक दामोदर सावरकर के पूरे जीवन का एक ज्ञानवर्धक DNA टेस्ट किया है . 

सबसे पहले हम ये जान लेते हैं कि विनायक दामोदर सावरकर थे कौन ? सावरकर को भारतीय राष्ट्रवादी और हिंदू राष्ट्रवादी कहा जाता है . 
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((वीर सावरकर का जन्म 28 मई 1883 को मुंबई में हुआ था .))

1906 से 1910 के बीच वीर सावरकर London में कानून के छात्र थे. 

उस दौरान उन्होंने Russia के क्रांतिकारियों से क्रांति के तरीके सीखे थे.

वर्ष 1906 से 1910 के बीच ही सावरकर ने एक किताब लिखी..The Indian War of Independence, 1857.

इस किताब में उन्होंने 1857 के विद्रोह को अंग्रेज़ों के खिलाफ पहला स्वतंत्रता संग्राम कहा था . 

अंग्रेजों ने इस किताब पर प्रतिबंध लगा दिया था . 

मार्च 1910 में वीर सावरकर को ब्रिटिश सरकार के खिलाफ हिंसा और युद्ध भड़काने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया . 

वीर सावरकर पर भारत में मुकदमा चलाया गया .

उन्हें भारत में एक ब्रिटिश ज़िला मजिस्ट्रेट की हत्या के लिए भी दोषी ठहराया गया . 

वर्ष 1911 में सावरकर को अंडमान द्वीप में कालापानी की सज़ा दी गई . 

सावरकर को अंडमान द्वीप ले जाया गया जहां उन्हें भयंकर यातनाएं दी गईं.
करीब 10 वर्ष तक उन्हें कालापानी में अंग्रेज़ों के अत्याचार झेलने पड़े . 

वर्ष 1921 में अंग्रेज़ों ने उन्हें रिहा करके दोबारा भारत भेज दिया . 

लेकिन भारत में भी उन्हें वर्ष 1924 तक नज़रबंद रखा गया . 

वर्ष 1923 में जेल में रहते हुए वीर सावरकर ने एक किताब लिखी... Hindutva: Who Is a Hindu?

आज की राजनीति में आप बार-बार हिंदुत्व शब्द सुनते हैं . इस शब्द की रचना वीर सावरकर ने ही की थी . 
वर्ष 1924 के बाद उन्हें नज़रबंदी से रिहा तो किया गया लेकिन उन्हें रत्नागिरी से बाहर जाने की इजाज़त नहीं थी . 

अंग्रेज़ों की नज़रबंदी से रिहा होने के बाद वीर सावरकर ने अपना ध्यान हिंदुओं को एकता के सूत्र में बांधने और हिंदू नवजागरण पर लगाया . 

उन्होंने हिंदू धर्म में छुआ-छूत खत्म करने के लिए अभियान चलाए और अनुसूचित जाति और सवर्ण जातियों के लोगों के सह-भोज यानी एक साथ भोजन करने पर विशेष ज़ोर दिया. 

वर्ष 1937 में जब वो पूरी तरह रिहा हुए तब वो हिंदू महासभा के प्रेसीडेंट बने.

वर्ष 1948 में नाथूराम गोडसे ने महात्मा गांधी की हत्या की . 

इस हत्या का आरोप वीर सावरकर पर भी लगा लेकिन पर्याप्त सबूत नहीं होने की वजह से उन्हें रिहा कर दिया गया . 

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने वीर सावरकर को अपने आदर्श पुरुषों में शामिल किया है . 

पहले जनसंघ और बाद में भारतीय जनता पार्टी ने वीर सावरकर को अपना आदर्श पुरुष माना . 

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भी वीर सावरकर से काफी प्रभावित थे . 

वीर सावरकर के सम्मान में अटल बिहारी वाजपेयी ने एक कविता भी लिखी थी . 

इस कविता की पंक्तियां कुछ इस प्रकार थीं... 

याद करें काला पानी को,
अंग्रेजों की मनमानी को,
कोल्हू में जुट तेल पेरते,
सावरकर से बलिदानी को.

वामपंथी बुद्धिजीवी और इतिहासकार, वीर सावकर पर ये आरोप लगाते हैं कि उन्होंने 
अंग्रेज़ों से माफी मांगी थी . उनकी एक याचिका भी एक विशेष राजनीतिक वर्ग के लोगों द्वारा खूब प्रचारित की जाती है.

ये बात बिलकुल सही है कि वीर सावरकर ने अपनी रिहाई के लिए याचिकाएं दायर की थी . ये बात भी सही है कि उन्होंने अंग्रेज़ सरकार के प्रति विद्रोह ना करने का भरोसा दिलाया था . लेकिन इस चिट्ठी को सिर्फ एक माफीनामा माना जाए या फिर युद्ध की रणनीति... इसे लेकर इतिहासकारों में मतभेद हैं . 

हमने आज इस संबंध में कुछ इतिहासकारों से भी बात की है. सावरकर के जीवन पर शोध कर रहे इतिहासकार विक्रम संपथ के विचार, आपके ज्ञान में काफी इज़ाफा कर सकते हैं. वो वीर सावरकर के जीवन से जुड़ी घटनाओं पर एक पुस्तक भी लिख रहे हैं. आज विक्रम संपथ ने एक वीडियो के ज़रिए अपने विचार हमें भेजे हैं. आप भी उनकी बातें सुनिए और अपना ज्ञानवर्धन कीजिए

आज मशहूर इतिहासकार विक्रम संपथ ने इस रिसर्च में हमारी बहुत मदद की है, इसके लिए हमारी और आपकी तरफ से भी मैं उन्हें शुक्रिया कहना चाहता हूं.

कहा जाता है कि सावरकर... जेल से बाहर रहकर देश की सेवा करना चाहते थे . वो ये मानते थे कि मातृभूमि की सेवा करने के लिए आज़ाद होना होगा . 

सावरकर का जन्म महाराष्ट्र में हुआ था . महाराष्ट्र के लोग छत्रपति शिवाजी महाराज को अपना नायक मानते हैं . सावरकर, शिवाजी को अपना सबसे बड़ा आदर्श मानते थे . सावकर ने भी शिवाजी की तरह अपने दुश्मन से लड़ने के लिए साम, दाम, दंड-भेद का सहारा लिया था . 

सत्रहवीं शताब्दी में छत्रपति शिवाजी ने भारत की तीन मुस्लिम रियासतों से अकेले संघर्ष किया था . उन्होंने दिल्ली के मुगल साम्राज्य, बीजापुर की आदिलशाही और हैदराबाद के निजाम से संघर्ष किया और वर्ष 1674 में एक हिंदू राज्य की स्थापना की थी . 

शिवाजी ने अपनी राजसत्ता की स्थापना के लिए साम, दाम, दंड-भेद का सहारा लिया था . उन्होंने दुश्मन को धोखा देने के लिए भी कई बार पत्र भेजे थे . इन पत्रों में उन्होंने दुश्मन की खूब प्रशंसा की थी ताकि वो भ्रमित हो जाए . 

शिवाजी ने बीजापुर की आदिलशाही के शक्तिशाली सेनापति अफज़ल खान की भी इसी योजना के तहत हत्या की थी . शिवाजी ने कट्टरपंथी मुगल सम्राट औरंगजेब की दोस्ती के प्रस्ताव को भी इसीलिए स्वीकार किया था ताकी वो औरंगजेब के दरबार में मौजूद राजपूत सरदारों को अपनी तरफ मिला सके . 

जब औरंगजेब ने शिवाजी को आगरा में कैद किया तब वो बहुत चालाकी से मुगलों की जेल से निकल गए थे . इस घटना को दुनिया के इतिहास की आश्चर्यजनक घटनाओं में से एक माना जाता है . 

आश्चर्य की बात ये है कि जो लोग दिन भर Air Conditioned कमरों में रहते हैं और एक दिन के लिए भी कड़ी धूप में खड़े नहीं रह सकते. वो लोग 10 साल तक कालापानी की सज़ा झेलने वाले वीर सावरकर के व्यक्तित्व और वीरता पर सवाल उठाते हैं . 

ऐसे लोगों को आज हम इतिहास के कटु सत्यों की जानकारी देना चाहते हैं . देश को कालापानी में कैद विद्रोहियों की स्थिति और भारत की जेलों में बंद राजनीतिक कैदियों की स्थिति पर भी गौर करना चाहिए . 

वर्ष 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन की ऐलान के बाद अंग्रेजों ने कांग्रेस पार्टी के सभी बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर लिया था . मौलाना आज़ाद, सरदार पटेल और पंडित नेहरू को अहमदनगर किले की जेल में कैद किया गया था . 

इस जेल का वर्णन मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने अपनी जीवनी India Wins Freedom में किया है . इस किताब के हिंदी अनुवाद के पेज नंबर 82 और 83 पर उन्होंने क्या लिखा है ये मैं आपको पढ़कर सुनाता हूं - 

अब दूसरी तरफ आप ये देखिए... कि कालापानी में कैदियों को किस तरह की यातनाएं झेलनी पडती थीं . 

693 कमरों वाली इस जेल में कैदियों के रहने की जगह बहुत छोटी हुआ करती थी....रोशनी के लिए सिर्फ एक छोटा सा रोशनदान होता था.

क्रांतिकारियों को वहां पर तरह-तरह की यातनाएं दी जाती थीं, उन्हें बेड़ियों से बांधा जाता था. उनसे कोल्हू से तेल निकालने का काम करवाया जाता था. 

वहां हर कैदी को एक निश्चित समय में करीब साढ़े तेरह किलो नारियल और सरसों से तेल निकालना होता था. और अगर कोई ऐसा नहीं कर पाता था....तो उसे बुरी तरह से पीटा जाता था और बेड़ियों से जकड़ दिया जाता था.

अंग्रेज़ बहुत निर्दयी थे और हमेशा भारतीय लोगों के सम्मान पर चोट करते रहते थे. भारतीय क़ैदियों को गंदे बर्तनों में खाना दिया जाता था. उन्हें पीने का पानी भी सीमित मात्रा में मिलता था . इतिहासकारों का दावा है कि कई बार कैदियों के खाने में ज़हरीले जंतुओं के अवशेष भी मिला दिए जाते थे . 

कैदियों की गर्दन पर बहुत भारी लोहे का टुकड़ा लटकाया जाता था . उनके पैर हमेशा ज़ंजीरों में बंधे रहते थे . उनके लिए चलना-फिरना और नित्य कर्म करना भी मुश्किल था . 

इस जेल के चारों तरफ समुद्र था . इस जेल से भागना असंभव था इसलिए कई क्रांतिकारियों ने फांसी लगा ली थी . कुछ क्रांतिकारियों ने अनशन भी किया था . लेकिन सावरकर ने आत्महत्या और अनशन को गलत रणनीति बताते हुए जिंदा रहकर और आजाद होकर देश की सेवा करने का रास्ता अपनाया था . 

इतिहास में कई बार महापुरुषों ने अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अलग-अलग रणनीति अपनाई है . आज हम आपको भारत के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के पत्र के बारे में बताना चाहते हैं . ये पत्र महात्मा गांधी ने प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारत के वायसराय... लॉर्ड चेम्सफोर्ड को लिखा था . 

अंग्रेजों ने महात्मा गांधी को ये भरोसा दिलाया था कि अगर भारत के लोग प्रथम विश्व युद्ध में अंग्रेजों का साथ देंगे तो वो भारत को आज़ाद करने पर विचार करेंगे . इसके लिए अंग्रेज़ों ने कांग्रेस पार्टी के नेताओं से ये अपील की थी कि भारत के जवानों को अंग्रेज़ों की सेना में भर्ती करवाया जाए . 

महात्मा गांधी ने खुद ये जिम्मेदारी ली थी . उन्होंने भारत के लोगों को अंग्रेज़ों की सेना में भर्ती होने के लिए अपील की थी . 

इसी संदर्भ में दिल्ली में एक युद्ध सम्मेलन हुआ जिसमें महात्मा गांधी को बुलाया गया था. तब महात्मा गांधी ने भारत के वायसराय लॉर्ड चेम्सफोर्ड को एक पत्र लिखा था . 

इस पत्र की कुछ लाइनें हम आज पूरे देश को सुनाना चाहते हैं .

महात्मा गांधी ने लिखा था कि युद्ध के दौरान अगर मेरा बस चले तो मैं भारत के हर सक्षम निवासी को साम्राज्य की सेवा में बलिदान कर दूं 

हमें ये मानना चाहिए कि अगर हम ब्रिटिश साम्राज्य की सेवा कर पाए तो उस सेवा के माध्यम से ही हमने स्वराज पा लिया . 

इसलिए मेरी नजर में ये साफ है कि हमें अपने हर व्यक्ति को ब्रिटिश साम्राज्य की रक्षा में लगा देना चाहिए . 

पत्र के आखिर में महात्मा गांधी ने लिखा..

मैं ऐसा लिख रहा हूं - क्योंकि मैं ब्रिटिश राष्ट्र से प्यार करता हूं और मैं हर भारतीय में अंग्रेजों के प्रति वफादारी पैदा करना चाहता हूं.

सावरकर के बारे में बुद्धिजीवियों के द्वारा लगातार ये Propaganda चलाया जाता है कि उनकी Two Nation Theory की वजह से भारत का विभाजन हुआ था . लेकिन सच्चाई ये है कि Two Nation Theory मुस्लिम समाज सुधारक सर सैयद अहमद खान का विचार है . 

सावरकर के बारे में ये कहा जाता है कि उनकी विचारधारा में मुसमलानों के लिए कोई जगह नहीं थी . 

भारत के संविधान निर्माता भीम राव अंबेडकर ने सावरकर के साहित्य का अध्ययन किया था . उन्होंने अपनी किताब 'पाकिस्तान या भारत का विभाजन' में सावरकर विचारों और उनके idea of india पर विस्तार से टिप्पणी की थी . 

भीम राव अंबेडकर के इन विचारों से बिलकुल साफ है कि सावरकर के राज्य की कल्पना में मुसलमानों का भी स्थान था . 

सावरकर ने मुसमलानों को वोट का अधिकार देने की बात की थी 

सावरकर ने भारत के बंटवारे का विरोध किया था . 

उन्होंने अल्पसंख्यकों को उनके सभी अधिकार देने का वादा किया था

वो मुस्लिम धर्म और संस्कृति की रक्षा के समर्थक थे . 

लेकिन वीर सावरकर मुसलमानों को आरक्षण देने के खिलाफ थे. अंग्रेजों के राज में मुसलमानों को चुनाव में सीटों पर आरक्षण मिला हुआ था. वीर सावरकर अंग्रेजों द्वारा मुसलमानों को दिए गए इस लाभ के खिलाफ थे. 

26 फरवरी 2003 को NDA की सरकार के कार्यकाल में संसद के सेंट्रल हॉल में वीर सावरकर की एक तस्वीर भी लगाई गई थी . सवाल ये है कि अगर उस वक्त वीर सावरकर एक देशभक्त और क्रांतिकारी थे तो आज उन्हें अंग्रेजों के सामने झुकने वाला व्यक्ति कहकर अपमानित करने का क्या औचित्य है. जिस व्यक्ति की तस्वीर को संसद में पूरे सम्मान के साथ लगाया जा चुका हो, उसके नाम से वीर शब्द हटाना, एक निचले स्तर की राजनीति है.

हमारा मकसद किसी का भी महिमामंडन करना नहीं है . हम ये चाहते हैं कि देश के सामने सभी पक्ष आने चाहिए . 

सबसे बड़ा प्रश्न हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था पर है . 

ऐसा कैसे हो सकता है कि भारत के अलग-अलग राज्यों में सावरकर को अलग-अलग तरह से पेश किया जाए . 

क्या भारत के ही एक राज्य में सावरकर को अंग्रेजों के सामने झुकने वाला व्यक्ति बताया जाएगा और दूसरे राज्य में उन्हें एक महान देशभक्त कहा जाएगा ? 

सबसे हास्यास्पद बात ये है कि राजस्थान के चुनाव में बीजेपी की हार से पहले छात्र ये पढ़ रहे थे कि वीर सावरकर एक महान क्रांतिकारी थे और कांग्रेस की जीत के बाद छात्र ये पढ़ेंगे कि सावरकर अंग्रेजों के सामने झुक गए थे . 

जो छात्र स्कूल में पढने जा रहे हैं उन्हें इस तरह भ्रमित क्यों किया जा रहा है?