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ZEE जानकारी: जानें कैसा काम कर रहा चंद्रयान-2

चंद्रयान-Two को Launch हुए 19 दिन बीत चुके हैं. और अभी तक इसका Performance शानदार रहा है.

ZEE जानकारी: जानें कैसा काम कर रहा चंद्रयान-2

पाकिस्तान पाताल में जा रहा है, लेकिन भारत अंतरिक्ष की ऊंचाइयों की तरफ बढ़ रहा है .  अब एक जानकारी भारत के Moon Mission चंद्रयान-2 के बारे में . चंद्रयान-Two को Launch हुए 19 दिन बीत चुके हैं. और अभी तक इसका Performance शानदार रहा है.

इसपर लगे कैमरे की मदद से पूरी दुनिया ने पृथ्वी की अद्भुत तस्वीरें भी देखीं. और अब 7 सितम्बर का इंतजार है क्योंकि उसी दिन चंद्रयान-Two चंद्रमा की सतह पर उतरेगा .

लेकिन कई लोगों के मन में ये जिज्ञासा है, कि चांद की सतह पर उतरने के लिए चंद्रयान-Two को 48 दिन क्यों लगेंगे ? 1959 में सोवियत संघ के Luna Two को चांद तक पहुंचने में सिर्फ 34 घंटों का वक्त लगा था. जबकि इसी पैमाने पर NASA का Apollo 11 सिर्फ 4 दिनों में चांद पर पहुंच गया था. फिर चंद्रयान Two इतने विलंब से क्यों पहुंचेगा ? आज हम आपकी इस दुविधा को दूर करेंगे.

इस प्रश्न का उत्तर चंद्रयान Two को ले जाने वाले रॉकेट के निर्माण, ईंधन की मात्रा और उसकी गति में मौजूद है.

अंतरिक्ष में, लंबी दूरी को Cover करने के लिए उच्च गति और सीधी Trajectory यानी प्रक्षेप पथ की आवश्यकता होती है.
साधारण भाषा में कहें, तो Trajectory का मतलब उस रास्ते से हुआ, जिसपर यान सफर करता है. 

Apollo-11 के लिए Nasa ने एक Super Heavy-Lift Launcher, Saturn Five का उपयोग किया था. ये Rocket प्रति घंटे 39 हज़ार किलोमीटर से अधिक की यात्रा करने में सक्षम था. 

Rocket के शक्तिशाली इंजन ने सिर्फ चार दिनों में Apollo-11 को 3 लाख 84 हज़ार किलोमीटर दूर चांद तक पहुंचा दिया. 

भारत के पास अमेरिका की Space Agency, Nasa जितना शक्तिशाली Rocket नहीं है. जो चंद्रयान -Two को सीधे चंद्रमा पर ले जा सके. 

यही वजह है, कि ISRO ने पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण का लाभ उठाने के लिए एक दूसरे मार्ग को चुना. 

GSLV Mark Three की क्षमता केवल चार टन तक का वज़न उठाने की है. जबकि, चंद्रयान Two का वजन 3 दशमलव 8 टन है. 

ये Rocket, चंद्रयान Two को केवल Geo-synchronous Transfer Orbit तक छोड़ सकता था. 

इस वक्त चंद्रयान Two का Propulsion System, यानी आगे की दिशा में धक्का देने वाला System, इसे अपने लक्ष्य की तरफ बढ़ा रहा है. 

पृथ्वी की अंतिम परिक्रमा के दौरान चंद्रयान-2 का Acceleration अर्थात, गति इतनी बढ़ जाएगी, कि वो चंद्रमा की कक्षा तक पहुंच सकेगा. 

चंद्रमा पर जाने के लिए अंतरिक्ष यान को न्यूनतम 11 किलोमीटर प्रति सेकेंड की गति की आवश्यकता होती है. 

उसमें से 10 दशमलव 3 किलोमीटर प्रति सेकेंड की गति Rocket द्वारा दी जाती है. जबकि बाकी बचे, 700 मीटर प्रति सेकेंड की रफ्तार चंद्रयान Two के Propulsion System द्वारा दी जाती है.

चंद्रयान-Two में छोटा इंजन होने के कारण, इसे लगातार नहीं चलाया जा सकता है. इसलिए गति को बनाए रखने के लिए इसे थोड़ी-थोड़ी देर में चलाया जा रहा है. 

चंद्रमा पर जिस जगह पर इसकी Landing तय की गई है...उसका रुख़ 6 और 7 सितंबर के बीच पृथ्वी की तरफ़ होगा. और उस हिस्से पर सूर्य की रौशनी भी पड़ रही होगी. इस Deadline को हासिल करने के लिये चंद्रयान-Two पहले के मुक़ाबले चंद्रमा के 15 चक्कर कम लगाएगा, जबकि उसे पृथ्वी के 6 चक्कर ज़्यादा लगाने पड़ेंगे. भारत को ज़्यादा वक़्त ज़रूर लग रहा है, लेकिन ये पूरी प्रक्रिया मिशन पर होने वाले ख़र्च को कई गुना कम कर देती है. अमेरिका और Russia के पास भारत से शक्तिशाली रॉकेट हैं और वो बहुत कम वक़्त में सीधे चंद्रमा तक पहुंच सकते हैं. लेकिन भारत ने इस कमी का रास्ता निकाला है. 

हमें उम्मीद है, कि चंद्रयान Two पर आधारित ये जानकारी आपके काम आएगी. और आप इसे अपने बच्चों और मित्रों के साथ शेयर करके उनकी जिज्ञासा दूर कर पाएंगे.