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ZEE जानकारी: प्रियंका गांधी का हुआ राजनीति में प्रवेश, बनीं कांग्रेस महासचिव

जो लोग भारत की राजनीति में दिलचस्पी रखते हैं, उन्हें ये बात पता है कि कांग्रेस के कार्यकर्ता पिछले कई वर्षों से प्रियंका गांधी वाड्रा को सक्रिय राजनीति में लाने की मांग कर रहे थे. 

ZEE जानकारी: प्रियंका गांधी का हुआ राजनीति में प्रवेश, बनीं कांग्रेस महासचिव

आज देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस के लिए एक बड़ा दिन है. क्योंकि आज कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी की बहन प्रियंका गांधी वाड्रा का औपचारिक तौर पर राजनीति में प्रवेश हो गया है. जो लोग भारत की राजनीति में दिलचस्पी रखते हैं, उन्हें ये बात पता है कि कांग्रेस के कार्यकर्ता पिछले कई वर्षों से प्रियंका गांधी वाड्रा को सक्रिय राजनीति में लाने की मांग कर रहे थे. 

2014 के लोकसभा चुनाव के बाद से कांग्रेस पार्टी जब भी कोई चुनाव हारती थी, तो कांग्रेस के कार्यकर्ता.. प्रियंका गांधी वाड्रा को राजनीति में लाने के लिए ऐसे ही पोस्टर लगाते थे. कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के अंदर ये टीस थी कि उनकी पार्टी लगातार हार रही है, लेकिन प्रियंका को राजनीति में नहीं लाया जा रहा. 

इसीलिए प्रियंका गांधी वाड्रा को कांग्रेस का Trump Card कहा जाने लगा. लेकिन अब लोकसभा चुनावों से ठीक पहले कांग्रेस ने राजनीति की बिसात पर अपना ये Trump Card इस्तेमाल कर लिया, लेकिन सवाल ये है कि इससे कांग्रेस को कितना फायदा होगा? राजनीति के गलियारों में ये बातें भी हो रही हैं कि प्रियंका गांधी वाड्रा को उनके कद के हिसाब से ज़िम्मेदारी नहीं मिली.

ये भी कयास लगाए जा रहे हैं कि गांधी परिवार में अब सत्ता के दो केन्द्र हो जाएंगे, एक राहुल गांधी और दूसरी प्रियंका गांधी वाड्रा. ये आज की सबसे बड़ी राजनीतिक ख़बर है, इसलिए आज हम इन सभी सवालों पर और भारतीय राजनीति की संभावित तस्वीर पर बात करेंगे. और आपको ये बताएंगे कि प्रियंका के राजनीति में आने से उत्तर प्रदेश में बीजेपी को क्या लाभ मिलेगा? जी हां आपने ठीक सुना.. यहां कांग्रेस के लाभ की नहीं बीजेपी के लाभ की बात हो रही है. लेकिन सबसे पहले ये जान लीजिए कि कांग्रेस ने आज प्रियंका गांधी वाड्रा को कौन सा पद दिया? 

ये वो प्रेस रिलीज़ है, जिसमें ये लिखा है कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रियंका गांधी वाड्रा को All India Congress Committee का महासचिव बनाकर पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रभारी नियुक्त किया है. और वो फरवरी के पहले हफ्ते से अपना काम संभालेंगी. यहां ध्यान देने वाली बात ये है कि उन्हें उत्तर प्रदेश का नहीं, बल्कि पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रभार दिया गया है.

प्रियंका गांधी वाड्रा को पूर्वी उत्तर प्रदेश और ज्योतिरादित्य सिंधिया को पश्चिमी उत्तर प्रदेश का महासचिव बनाया गया है. 

अभी तक गुलाम नबी आज़ाद पूरे उत्तर प्रदेश के महासचिव थे, अब उन्हें हरियाणा का महासचिव बनाया गया है. 

अब सवाल ये है कि जिस उत्तर प्रदेश में पहले कांग्रेस का एक महासचिव था, वहां अब दो-दो महासचिव क्यों बनाए गए हैं? कांग्रेस ने प्रियंका गांधी को पूरे उत्तर प्रदेश का प्रभार क्यों नहीं दिया? क्या प्रियंका गांधी को पूरे उत्तर प्रदेश का प्रभार देने में कांग्रेस पार्टी को किसी तरह का डर सता रहा था? क्या प्रियंका गांधी के कद से हिसाब से उनकी ज़िम्मेदारी छोटी नहीं है? इन सवालों पर देशभर में चर्चा हो रही है. 

लेकिन हमें लगता है कि प्रियंका गांधी को अगर कोई बड़ी ज़िम्मेदारी दी जाती और कांग्रेस हार जाती, तो फिर हार की सारी ज़िम्मेदारी प्रियंका पर डाल दी जाती. राजनीति के लिहाज़ से उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा राज्य है. जहां लोकसभा की 80 सीटें हैं. और उत्तरप्रदेश में कांग्रेस की स्थिति बहुत खराब है. समाजवादी पार्टी और बीएसपी ने भी अकेले ही गठबंधन कर लिया और कांग्रेस को पूछा तक नहीं. अब भी उत्तर प्रदेश से कांग्रेस के दो सांसद हैं, एक सोनिया गांधी और दूसरे खुद राहुल गांधी. इतनी बुरी स्थिति में कांग्रेस की बड़ी जीत की उम्मीदें बहुत कम हैं. इसीलिए प्रियंका गांधी को सिर्फ पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रभार दिया गया है. ताकि अगर चुनावी Damage ज्यादा हो तो उन पर कोई खंरोच न आए. 

एक संभावना ये भी लगती है कि राहुल गांधी ये कभी नहीं चाहेंगे कि उनके ही समकक्ष सत्ता का कोई दूसरा केन्द्र बन जाए, फिर चाहे उस केन्द्र में उनकी अपनी बहन प्रियंका गांधी ही क्यों ना हों? 

जो लोग कांग्रेस पार्टी के कामकाज के तरीके को जानते और समझते हैं, उन्हें पता है कि कांग्रेस के बड़े फैसले लेने में प्रियंका गांधी की हमेशा सक्रिय भूमिका रहती है. प्रियंका गांधी ने भले ही औपचारिक तौर पर राजनीति में आज Entry की हो, लेकिन अनौपचारिक तौर पर पर्दे के पीछे से वो राजनीति में लगातार सक्रिय हैं. 

हाल ही में जब राजस्थान और मध्य प्रदेश में जीत के बाद ये सवाल उठा कि मुख्यमंत्री किसे बनाया जाए, तो फैसला लेने में प्रियंका गांधी ने भी अहम भूमिका निभाई. सूत्रों से तो ये भी पता चला है कि प्रियंका गांधी की वजह से अशोक गहलोत को राजस्थान का मुख्यमंत्री बनाया गया. राजस्थान के मुख्यमंत्री पद के लिए कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी की पहली पसंद सचिन पायलट थे. सचिन पायलट को राहुल गांधी ने पहले राजस्थान का प्रदेश अध्यक्ष बनाया था. कांग्रेस ने सचिन पायलट की अगुवाई में ही चुनाव लड़ा और जीता. इसलिए राहुल गांधी ये चाहते थे कि सचिन पायलट को ही मुख्यमंत्री बनाया जाए. लेकिन प्रियंका गांधी और उनकी मां सोनिया गांधी अशोक गहलोत के पक्ष में थे. और अंत में अशोक गहलोत ही मुख्यमंत्री बने.

ये किस्सा हमने आपको इसलिए बताया ताकि आप ये समझ सकें कि कांग्रेस के अंदरूनी फैसले लेने में प्रियंका गांधी की कितनी बड़ी भूमिका रहती है. आज प्रियंका गांधी वाड्रा के राजनीतिक गृह प्रवेश से राहुल गांधी बहुत उत्साहित और प्रसन्न दिखाई दे रहे हैं. 

हालांकि कांग्रेस के नेताओं को ये लगता है कि प्रियंका गांधी वाड्रा को महासचिव बनाए जाने के इस फैसले से.. कांग्रेस पार्टी को पूरे देश में फायदा होगा. उनका राजनीतिक गृहप्रवेश भले ही आज हुआ हो, लेकिन 1998 से लेकर अबतक के सभी चुनावों में प्रियंका गांधी वाड्रा ने पर्दे के पीछे रहकर.. अपनी पार्टी के लिए सक्रिय भूमिका निभाई है. हालांकि आधिकारिक तौर पर वो सिर्फ रायबरेली और अमेठी में ही पार्टी के लिए चुनाव प्रचार का जिम्मा निभाती रही हैं. अब सवाल ये है कि प्रियंका के इस राजनीतिक गृहप्रवेश की Inside Story क्या है? 

प्रियंका गांधी को लाने की वकालत 2014 की हार के बाद से ही हो रही थी. लेकिन सूत्रों की माने तो सोनिया गांधी इस बात से सहमत नहीं थीं. क्योंकि ऐसा फैसला लेने से राहुल गांधी के नाराज़ होने का डर भी था. और पार्टी कार्यकर्ताओं में ये भी संदेश जाता कि राहुल गांधी में कांग्रेस पार्टी की बागडोर संभालने की क्षमता नहीं है. इसीलिए परिवार में ये तय हुआ कि राहुल गांधी पार्टी की कमान संभालें और पर्दे के पीछे से प्रियंका गांधी अपना काम करती रहेंगी.

2017 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में हार का ठीकरा भले ही राहुल गांधी के सिर फोड़ा गया, लेकिन उस चुनाव में समाजवादी पार्टी से गठबंधन से लेकर उम्मीदवारों के नाम तक.. प्रियंका ने ही फाइनल किए थे. हाल ही में 3 राज्यों में जीत के बाद मुख्यमंत्री तय करने के समय भी पूरे देश ने प्रियंका वाड्रा की भूमिका को देख लिया था. 

उत्तर प्रदेश, गुजरात और कर्नाटक विधानसभा चुनावों के बाद प्रियंका लाओ, कांग्रेस बचाओ के नारे..ज़ोर शोर से लगे. लेकिन इसके बाद भी प्रियंका को पार्टी में इसीलिए नहीं लाया गया... कि अगर ऐसा किया गया तो राहुल गांधी बैकफुट पर चले जायेंगे और अध्यक्ष होने के बावजूद पार्टी में उनकी बात नहीं सुनी जाएगी. 

इसीलिए अब जब राहुल गांधी की अगुवाई में पार्टी ने 3 राज्यों में अपने दम पर सरकार बना ली है, तो कांग्रेस पार्टी के अंदर ये तय हो गया है कि अब राहुल गांधी के नेतृत्व पर सवाल नहीं उठाया जा सकता. 

लेकिन जब समाजवादी पार्टी और BSP ने आपस में गठबंधन कर लिया और कांग्रेस को पूछा तक नहीं, तब पार्टी के सीनियर नेताओं ने सोनिया गांधी से प्रियंका गांधी वाड्रा को पार्टी में लाने की बात कही. ताकि उत्तर प्रदेश में मुरझाई हुई कांग्रेस पार्टी में एक नई जान फूंकी जा सके. और इस मांग पर आखिरकार राहुल गांधी और सोनिया गांधी ने अपनी मंज़ूरी दे दी. 

कांग्रेस के नेता आमतौर पर प्रियंका गांधी वाड्रा में... उनकी दादी इंदिरा गांधी की छवि देखते हैं. प्रियंका हाज़िर जवाब भी हैं. इसीलिए कांग्रेस पार्टी के नेता ये मानते हैं कि भले ही प्रियंका को आधे उत्तर प्रदेश का जिम्मा सौंपा गया है, लेकिन उनकी वजह से कांग्रेस को पूरे देश में फायदा होगा. पार्टी के बड़े नेता ये भी मानते हैं कि प्रियंका गांधी वाड्रा.. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का जवाब देने में ज्यादा सक्षम हैं. 

लेकिन ये भी कहा जा रहा है कि कांग्रेस की राजनीति में प्रियंका गांधी वाड्रा के सक्रिय होने के बाद पार्टी में खेमा बंदी भी शुरू होगी. कांग्रेस में अब दो Power सेंटर हो जाएंगे. कुछ नेता राहुल गांधी के गुट में हैं तो कुछ नेता प्रियंका के खेमे में दिखाई देंगे. और बीजेपी प्रियंका गांधी वाड्रा को उनके पति रॉबर्ट वाड्रा के खिलाफ़ चल रहे भ्रष्टाचार के मामलों पर घेरेगी. 
 
गांधी नेहरु ख़ानदान से देश को तीन प्रधानमंत्री मिले हैं. लेकिन राजनीति में देश के सबसे शक्तिशाली राजनीतिक परिवार के किसी भी सदस्य की Entry उस तरह नहीं हुई जिस तरह, प्रियंका गांधी वाड्रा की हुई है. 

इंदिरा गांधी ने अपने पिता पंडित जवाहर लाल नेहरू के साथ बचपन से राजनीति के कड़वे सबक सीख लिए थे. 

इंदिरा गांधी ने वर्ष 1947 से लेकर 1964 तक अपने पिता के साथ एक निजी सहायक के रूप में काम किया था. वो हर विदेशी दौरे पर पंडित नेहरू के साथ जाती थीं.

1955 में इंदिरा गांधी को Congress Working Committee यानी CWC का सदस्य बनाया गया.

इसके बाद 1959 में इंदिरा गांधी कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष बनीं. 

1964 में जवाहर लाल नेहरू के देहांत के बाद इंदिरा गांधी को राज्यसभा का सदस्य बनाया गया और इसके साथ ही वो लाल बहादुर शास्त्री के कैबिनेट में सूचना और प्रसारण मंत्री बनीं. 

लेकिन फिर अचानक 1966 में ताशकंद में लाल बहादुर शास्त्री की मौत हो गई. देश में राजनीतिक संकट पैदा हो गया. और फिर इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री बनाया गया. 24 जनवरी, 1966 को इंदिरा गांधी ने देश की पहली महिला प्रधानमंत्री के तौर पर शपथ ली. 

यानी देश का प्रधानमंत्री बनने से पहले इंदिरा गांधी 19 महीने तक कैबिनेट मंत्री थीं. और प्रधानमंत्री बनने से करीब 7 साल पहले ही वो कांग्रेस की अध्यक्ष बन गई थीँ. 
 
अब इंदिरा गांधी के बाद राजीव गांधी की बात करते हैं. 

राजीव गांधी एक पायलट थे, और राजनीति से उनका दूर दूर तक कोई लेना देना नहीं था. बल्कि राजीव गांधी के छोटे भाई संजय गांधी राजनीति में ज्यादा सक्रिय थे. इमरजेंसी के दौर में उनकी प्रमुख भूमिका थी. और अपनी मां इंदिरा गांधी के साथ सरकार चलाने में भी वो सक्रिय रहते थे. लेकिन 1980 में एक विमान दुर्घटना में संजय गांधी की मौत हो गई. इसके बाद इंदिरा गांधी अपने बड़े बेटे राजीव गांधी को सक्रिय राजनीति में ले आईं. 

संजय गांधी उत्तर प्रदेश के अमेठी से कांग्रेस के सांसद थे. लेकिन उनकी मौत के बाद ये सीट खाली हो गई. जब उपचुनाव हुआ तो कांग्रेस ने राजीव गांधी को अपना उम्मीदवार बनाया. 

उपचुनाव में अमेठी से सांसद बनकर राजीव गांधी लोकसभा पहुंचे. इसके बाद उन्हें 1980 में ही पार्टी का महासचिव बनाकर यूथ कांग्रेस का प्रभारी बनाया गया. 1982 में भारत में एशियन गेम्स होने थे. इसलिए इंदिरा गांधी ने उन्हें एशियन गेम्स का इंचार्ज बना दिया.

फिर 31 अक्टूबर 1984 को इंदिरा गांधी की हत्या हो गई. और तुरंत राजीव गांधी को प्रधानमंत्री बना दिया गया. इसके साथ ही राजीव गांधी को कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष भी बना दिया गया. 

इसके बाद उसी वर्ष यानी 1984 में ही लोकसभा के चुनाव हुए और राजीव गांधी ऐतिहासिक बहुमत से एक बार फिर देश के प्रधानमंत्री चुने गए. 

फिर 21 मई 1991 को उनकी भी हत्या हो गई. अपनी मृत्यु तक राजीव गांधी ही कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष थे. 

यानी प्रधानमंत्री बनने से पहले राजीव गांधी करीब 4 साल तक पार्टी के महासचिव रहे थे.
 
अपने पति राजीव गांधी की तरह सोनिया गांधी भी राजनीति में सक्रिय नहीं थी. 1991 में राजीव गांधी की मौत के बाद कांग्रेस के नेताओं ने सोनिया गांधी से राजनीति में आने का आग्रह किया, लेकिन सोनिया गांधी ने ये प्रस्ताव ठुकरा दिया था. 

1991 से 1996 तक देश में कांग्रेस की ही सरकार थी. नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री थे. और उस सरकार में सोनिया गांधी का कोई दखल नहीं था. 

लेकिन इसके बाद देश में गठबंधन की सरकारों का दौर आया. और कांग्रेस पार्टी की स्थिति भी खराब हो गई.

1997 में पार्टी की बुरी स्थिति को देखते हुए कांग्रेस के नेताओं ने एक बार फिर सोनिया गांधी से राजनीति में आने की अपील की. और इस बार सोनिया गांधी ने ये प्रस्ताव मान लिया . 

उस दौर में तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी, लोकसभा में विपक्ष के नेता शरद पवार और राजेश पायलट सहित तमाम नेताओं ने सोनिया गांधी का विरोध किया था. बार बार उनके विदेशी मूल का मुद्दा उठाया जा रहा था.

सोनिया गांधी ने 1998 में कांग्रेस के अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ा और जितेंद्र प्रसाद को हराकर कांग्रेस की अध्यक्ष बनीं. इसके बाद वर्ष 2017 तक.. यानी लगातार 19 साल तक वो इस पद पर बनी रहीं.

पार्टी अध्यक्ष के तौर पर सोनिया गांधी ने 2004 और 2009 में लोकसभा चुनाव में पार्टी को जीत दिलाई.
 
राजनीति में राहुल गांधी की Entry भी सीधे लोकसभा का सांसद बनने से ही हुई. 

2004 के लोकसभा चुनाव में अमेठी से मैदान में उतरकर राहुल गांधी ने सक्रिय राजनीति की शुरूआत की. अमेठी से राहुल गांधी ने 2004, 2009 और 2014 में लोकसभा का चुनाव जीता. 

सितंबर 2007 में उन्हें कांग्रेस का महासचिव बनाया गया था, 2007 से लेकर 2013 तक राहुल गांधी NSUI और Youth Congress के प्रभारी महासचिव रहे. 

फिर वर्ष 2013 में राहुल गांधी को कांग्रेस पार्टी का उपाध्यक्ष बनाया गया. और गुजरात चुनाव के नतीजों से ठीक पहले दिसंबर 2017 में उन्हें कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष बनाया गया.

2013 से लेकर अब तक जब भी कांग्रेस कोई चुनाव जीतती है तो उसका श्रेय राहुल गाँधी को दिया जाता है. लेकिन अगर कांग्रेस चुनाव हारती है... तो कांग्रेस के तमाम नेता, ये कहते हैं कि हार की ज़िम्मेदारी राहुल गांधी की नहीं, बल्कि पार्टी की है. 

वैसे आपको बता दें कि 2013 में राहुल गांधी के कांग्रेस उपाध्यक्ष बनने से लेकर अब तक, 43 चुनाव हो चुके हैं जिनमें से कांग्रेस ने 33 चुनाव हारे हैं और 10 चुनाव जीते हैं.
 
अब आपको ये समझाते हैं कि कांग्रेस पार्टी ने प्रियंका गांधी को पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रभारी क्यों बनाया है? 

इसकी वजह है लोकसभा सीटों की वो खान जो पूर्वी उत्तर प्रदेश में है. 
पूरे उत्तर प्रदेश में लोकसभा की 80 सीटे हैं और इनमें से 43 सीटें.. पूर्वी उत्तर प्रदेश में हैं. 
2014 के लोकसभा चुनावों में इस पूरे इलाके से बीजेपी ने 43 में से 40 सीटें जीती थीं. 
और कांग्रेस के हिस्से में सिर्फ दो सीटें आई थीं, रायबरेली और अमेठी. 
इसके अलावा एक सीट समाजवादी पार्टी के हिस्से में आई थी. आज़मगढ़ से समाजवादी पार्टी के तत्कालीन अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव जीते थे. 
जबकि बीएसपी को एक भी सीट नहीं मिली थी. 

अगर वोट प्रतिशत की बात की जाए तो 2014 के लोकसभा चुनावों में इस पूरे इलाके से कांग्रेस को 12%, बीजेपी को 40%, बीएसपी को 21%, समाजवादी पार्टी को 19% और अन्य को 8% वोट मिले थे. 

पूर्वी उत्तर प्रदेश बहुत महत्वपूर्ण है. 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने भी वाराणसी से नरेन्द्र मोदी को उम्मीदवार बनाया था. नरेंद्र मोदी वहां से जीते गये थे.. और आस पास के पूरे इलाके की 40 सीटों पर बीजेपी जीत गई थी. 

बीजेपी ने पूरे उत्तर प्रदेश में 80 में से 71 सीटें जीतीं और दो सीटें बीजेपी की सहयोगी पार्टी अपना दल ने जीतीं थीं.

अब विधानसभा चुनावों की बात करते हैं .

पूर्वी उत्तर प्रदेश में विधानसभा की कुल 192 सीटें हैं. 2017 में हुए विधानसभा चुनावों में बीजेपी को इस इलाके से 144 सीटें मिली थीं. इसके अलावा समाजवादी पार्टी को 22, बीएसपी को 14 और कांग्रेस को सिर्फ एक सीट मिली थी जबकि अन्य दलों को 11 सीटें मिली थीं. 

ये आंकड़े बताते हैं कि पूर्वी उत्तर प्रदेश का ये इलाका राजनीतिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है. और इस पूरे क्षेत्र में कांग्रेस की स्थिति बहुत खराब है. शायद इसीलिए कांग्रेस प्रियंका गांधी वाड्रा को लेकर आई है. ये भी कहा जा रहा है कि प्रियंका गांधी वाड्रा रायबरेली से खुद चुनाव भी लड़ेंगी. 
 
अब ये कहा जा रहा है कि प्रियंका गांधी की एंट्री से बीजेपी को ही लाभ मिलेगा. इस तर्क का आधार क्या है, ये भी समझिए. उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का गठबंधन हो गया है. और इस गठबंधन में कांग्रेस को कोई जगह नहीं दी गई. ये ज़रूर हुआ कि गांधी परिवार की पारिवारिक सीटों यानी अमेठी और रायबरेली से ये गठबंधन अपना कोई उम्मीदवार नहीं उतारेगा. 

लेकिन अब प्रियंका गांधी वाड्रा को महासचिव बना दिया गया है. इससे ये होगा कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के कार्यकर्ताओं में नया उत्साह आएगा. और पार्टी मज़बूत होगी. लेकिन जानकारों के मुताबिक वो ज्यादा सीटें जीतने की स्थिति में तब भी नहीं आएगी. हां ये ज़रूर होगा कि वो समाजवादी पार्टी और BSP के गठबंधन के वोट काटे.और ऐसी स्थिति में फायदा बीजेपी का ही होगा. 

2014 के लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश में सभी पार्टियां अलग अलग चुनाव लड़ी थीं और इसका फायदा बीजेपी को हुआ था. बीजेपी और उसके गठबंधन को उत्तर प्रदेश से 73 सीटें मिली थीँ. 
इसी तरह से 2017 के विधानसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस का गठबंधन हुआ था. लेकिन इसका फायदा भी बीजेपी को ही हुआ. और विधानसभा चुनावों में बीजेपी को ज़बरदस्त जीत मिली. बीजेपी और उसके सहयोगियों को सवा तीन सौ सीटें मिलीं. 

प्रियंका गांधी वाड्रा की उम्र 47 साल है. और वो अपने भाई राहुल गांधी से 19 महीने छोटी हैं. आज जब उन्हें महासचिव बनाने की घोषणा हुई तो प्रियंका देश में मौजूद नहीं थीं. सूत्रों के मुताबिक वो विदेश में हैं. और फरवरी में अपनी ज़िम्मेदारी संभालेंगी.

लेकिन यहां ये भी समझना चाहिए प्रियंका गांधी को राजनीति में लाने से कांग्रेस पार्टी को क्या फायदा और क्या नुकसान हो सकता है. 

सबसे पहले नुकसान की बात करते हैं. 

प्रियंका गांधी अपने पति रॉबर्ट वाड्रा पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों के साथ राजनीति में आ रही हैं. यानी इसका Baggage या बोझ... उनके साथ रहेगा. ऐसा कहा जाता है कि रॉबर्ट वाड्रा, गांधी परिवार में Mis Fit हैं. वो हमेशा विवादों में रहते हैं और उन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहते हैं.

दूसरा नुकसान ये होगा कि एक बार फिर से ये आरोप लगेगा कि कांग्रेस पार्टी वंशवाद को ही बढ़ावा देती है. 
लोग ये भी कहेंगे कि 133 साल पुरानी कांग्रेस पार्टी में क्या गांधी परिवार के किसी सदस्य को छोड़कर कोई दूसरा कद्दावर नेता नहीं है? 

अब ये देखते हैं कि फायदे क्या होंगे.

प्रियंका वाड्रा के आने से फायदा ये होगा कि कांग्रेस का सोया हुआ कार्यकर्ता जाग जाएगा. पूरे देश में कांग्रेस के कार्यकर्ताओं में एक नया जोश आएगा. 

सोनिया गांधी के बारे में ये कहा जाएगा कि उन्होंने इस बार के चुनाव में अपने दोनों बच्चों को दांव पर लगा दिया. 
ये भी कहा जाएगा कि कांग्रेस पार्टी इन चुनावों को लेकर बहुत गंभीर है. और इसीलिए उसने प्रियंका गांधी को चुनाव में उतारा है. कांग्रेस ने कुछ भी छुपाकर नहीं रखा.

ये भी कहा जा रहा है.. कि हो सकता है सोनिया गांधी खराब स्वास्थ्य की वजह से अगला चुनाव न लड़ें, और इसीलिए प्रियंका गांधी लोकसभा का चुनाव लड़ें. ये भी कहा जा रहा है कि प्रियंका गांधी अमेठी से और उनके भाई राहुल गांधी रायबरेली से चुनाव लड़ सकते हैं. 

वैसे गांधी परिवार के किसी भी सदस्य को कभी भी आधे राज्य का प्रभारी नहीं बनाया गया. या तो उन्हें अध्यक्ष बनाया गया या फिर महासचिव या फिर गांधी परिवार के सदस्य सीधे सांसद बने.