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ZEE जानकारी: सोनिया गांधी ने रायबरेली सीट से दाखिल किया नामांकन

नामांकन से पहले सोनिया गांधी ने कांग्रेस के दफ़्तर में हवन किया.

ZEE जानकारी: सोनिया गांधी ने रायबरेली सीट से दाखिल किया नामांकन

कल DNA में हमने आपको अमेठी का पारिवारिक नामांकन दिखाया था... आज रायबरेली की बारी है. रायबरेली में आज कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की मां और UPA की Chairperson सोनिया गांधी ने नामांकन दाख़िल किया है. अमेठी की तरह रायबरेली भी वो लोकसभा क्षेत्र है जिसे कांग्रेस की राजनीतिक जायदाद समझा जाता है. लेकिन 2019 में ये ग़लतफ़हमी दूर हो सकती है. अमेठी की तरह रायबरेली भी इस बार कांग्रेस के लिए सुरक्षित सीट नहीं रह गई है.

रायबरेली में अमेठी जैसा पारिवारिक रोड शो तो नहीं हुआ...लेकिन सोनिया गांधी के नामांकन को लेकर कांग्रेस के ताम-झाम में कोई कमी नहीं थी. सोनिया गांधी ने खुले ट्रक की बजाय अपनी गाड़ी में बैठकर ही रोड शो किया. कुछ जगहों पर वो अपनी गाड़ी से बाहर निकलीं और कार्यकर्ताओं का अभिवादन किया.

अमेठी की तरह रायबरेली की सीट पर भी कांग्रेस की इज़्ज़त और उसका परिवारवाद...दोनों दांव पर हैं.  आज नामांकन से पहले सोनिया गांधी ने कांग्रेस के दफ़्तर में हवन किया. इन तस्वीरों में भक्तिभाव है और राजनीतिक चपलता भी है. याद कीजिये आपने सोनिया गांधी को हवन करते हुए इससे पहले कब देखा था. ये हवन इसलिए ख़ास है क्योंकि ये नामांकन से पहले वाला हवन है. इस हवन में उनका पूरा परिवार मौजूद था. राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा के साथ उनके पति रॉबर्ट वाड्रा और बच्चे भी हवन में शामिल हुए. धर्म किसी भी व्यक्ति के लिये बहुत निजी मामला होता है. लेकिन जब इसके प्रदर्शन का समय और स्थान...राजनीतिक माहौल को देखकर तय किया जाता है तो इसके कई मायने निकलते हैं. सार्वजनिक जीवन में ऐसे लम्हों को सिर्फ निजी कहकर किनारे नहीं किया जा सकता. ऐसे लम्हों को भी राजनीति के Lens से देखा जाता है.

2014 में भी सोनिया गांधी ने नामांकन से पहले रायबरेली में हवन किया था. इसलिये 2019 में भी इस हवन में एक बड़ा संदेश है..क्योंकि कांग्रेस को अमेठी वाला डर रायबरेली में भी सता रहा है.

सोनिया गांधी, 2004 से रायबरेली की सांसद हैं.
इस बार सोनिया गांधी का मुक़ाबला दिनेश प्रताप सिंह से है. 
दिनेश प्रताप सिंह हाल ही में कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में शामिल हुए थे. 
दिनेश प्रताप सिंह ने गांधी परिवार के साये में रहकर रायबरेली में अपनी अलग पहचान बनाई है. आज वो अपनी पूर्व अध्यक्ष के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ रहे हैं.

2019 में सोनिया गांधी के लिये राहत की बात ये है कि समाजवादी पार्टी और BSP ने रायबरेली में अपना उम्मीदवार नहीं उतारा है. इसलिये उनका सीधा मुक़ाबला अपनी ही पार्टी के पुराने नेता और बीजेपी के उम्मीदवार दिनेश प्रताप सिंह के साथ है.

2014 के लोकसभा चुनाव में सोनिया गांधी रायबरेली से 3 लाख 52 हज़ार वोट से जीती थीं.
लेकिन 2017 में हुए विधानसभा चुनाव के नतीजों ने कांग्रेस के होश उड़ा दिये थे.
रायबरेली लोकसभा सीट के तहत विधानसभा की 6 सीटें आती हैं. 
इनमें कांग्रेस सिर्फ़ 2 सीट ही जीत पाई थी.
जबकि बाकी बची 3 सीटों पर बीजेपी और एक सीट पर समाजवादी पार्टी को जीत मिली थी.

इसलिये ख़तरे की ये घंटी कांग्रेस को बहुत अच्छी तरह सुनाई दे रही है. अगर 23 मई को रायबरेली से सोनिया गांधी के लिये अच्छी ख़बर नहीं आई...तो ये सोनिया गांधी और कांग्रेस पार्टी का बहुत बड़ा नुक़सान होगा. और रायबरेली में परिवारवाद का क़िला पूरी तरह ढह जाएगा. वैसे रायबरेली से गांधी परिवार का रिश्ता 60 साल से भी ज़्यादा पुराना है.

वर्ष 1957 में रायबरेली से इंदिरा गांधी के पति फ़िरोज़ गांधी चुनाव जीते थे. 
वर्ष 1967 और 1971 के चुनाव में इंदिरा गांधी यहां से जीती थीं.
लेकिन ये भी कांग्रेस के लिये एक कटु सत्य है कि इंदिरा गांधी वर्ष 1977 में रायबरेली से चुनाव हार गई थीं. तब इमरजेंसी के बाद राज नारायण ने इंदिरा गांधी को क़रीब 50 हज़ार वोटों के अंतर से हरा दिया था.
ये कांग्रेस की वो bad memory है...जिसके सपने कांग्रेस को आज भी आते होंगे.

रायबरेली में सोनिया गांधी जब अपनी जीत के लिये हवन कर रही थीं...तो 60 किलोमीटर दूर उनके बेटे राहुल गांधी को हराने के लिये भी एक हवन हो रहा था. लेकिन इस हवन में परिवारवाद का धुआं ग़ायब था. ये अमेठी से बीजेपी की उम्मीदवार और केंद्रीय कपड़ा मंत्री स्मृति ईरानी का हवन था. उनके साथ उनके पति ज़ुबिन ईरानी भी थे. इसके अलावा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी इस हवन में शामिल हुए. 

पूजा और हवन के बाद अमेठी में स्मृति ईरानी का रोड शो शुरू हुआ. वो दूसरी बार यहां से राहुल गांधी के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ रही हैं. उनकी दावेदारी इतनी मज़बूत मानी जा रही है कि राहुल गांधी को इस बार अमेठी के साथ-साथ केरल के वायनाड से भी चुनाव लड़ना पड़ रहा है. कांग्रेस भी बहुत अच्छी तरह जानती है कि अमेठी में उसे इतनी मज़बूत चुनौती, इससे पहले कभी नहीं मिली है.

वर्ष 2009 में राहुल गांधी को अमेठी में क़रीब 72 प्रतिशत वोट मिले थे.
इसके बाद वर्ष 2014 में जब स्मृति ईरानी उनके ख़िलाफ़ उतरीं... तो राहुल गांधी जीत तो गये...लेकिन उनके वोट घटकर 47 प्रतिशत रह गये.
2014 में अमेठी में दूसरे नंबर पर रहीं स्मृति ईरानी को करीब 34 प्रतिशत वोट मिले थे.
स्मृति ईरानी ने राहुल गांधी की जीत का अंतर 3 लाख 70 हज़ार वोटों से घटाकर एक लाख 7 हज़ार तक पहुंचा दिया था.

अमेठी और रायबरेली...दोनों ही लोकसभा क्षेत्रों में कांग्रेस का रिकॉर्ड ऐतिहासिक रहा है. लेकिन खेल की तरह चुनाव में भी.. रिकॉर्ड टूटने के लिये ही बनते हैं...और इतिहास में नई बातें दर्ज होती हैं. अमेठी की पसंद अब तक राहुल गांधी रहे हैं...लेकिन स्मृति ईरानी ने हार के बावजूद अमेठी का दामन नहीं छोड़ा. बीजेपी का दावा है कि स्मृति ईरानी पिछले 5 वर्षों में कम से कम 35 बार अमेठी जा चुकी हैं. जबकि राहुल गांधी के 17 दौरे हुए हैं. इसलिये अब इंतज़ार है 6 मई का...जब अमेठी और रायबरेली में परिवार vs चौकीदार वाला दिलचस्प मुकाबला होगा.

इस बार लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी वोट पर निशाना लगाने की कोशिश रहे हैं. लेकिन दूसरी तरफ कांग्रेस पार्टी को एक दूसरे निशाने का डर सता रहा है. 

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने बुधवार को अमेठी से अपना नामांकन भरा था. नामांकन के बाद वो पत्रकारों से बात कर रहे थे. इस दौरान उनके माथे पर कई बार हरे रंग की रोशनी का एक बिंदु दिखाई पड़ा.और इसी के बाद कांग्रेस पार्टी ने Sniper की Laser Light वाली राजनीति करनी शुरु कर दी. और इसे सुरक्षा में एक बहुत बड़ी खामी बताया. 

कांग्रेस की तरफ से गृह मंत्रालय को चिट्ठी लिखी गई. जिसमें कहा गया, कि जिस वक्त राहुल गांधी पत्रकारों से बात कर रहे थे, उस वक्त उनके माथे पर सात बार 'Green Laser' चमकती हुई देखी गई. हरे रंग की ये रोशनी दो बार, उनकी दायीं कनपटी पर भी Flash होते दिखाई दी. 

इस चिट्ठी में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी और इंदिरा गांधी की हत्या का भी जिक्र किया गया था. कांग्रेस पार्टी का आरोप था, कि राहुल गांधी को Target किया जा रहा है. लेकिन, Special Protection Group के डायरेक्टर ने जांच के बाद गृह मंत्रालय को बताया, कि ये मोबाइल फोन की हरी रोशनी थी. जो कांग्रेस समर्थकों द्वारा ही फोटो खींचने के दौरान इस्तेमाल की गई थी. आप इस घटनाक्रम को कांग्रेस पार्टी की फिल्मी चिंताएं भी कह सकते हैं. चुनावी मौसम है. इसलिए हो सकता है, कांग्रेस पार्टी के कई नेता अपनी चिंताएं दूर करने के लिए हल्की फुल्की फिल्मों या Action Movies का सहारा ले रहे हों. और फिल्में देख देखकर, कई बार असल ज़िंदगी भी फिल्म जैसी लगने लगती है. असली Sniper से 'Green Laser' निकलने के बाद क्या होता है....इसे समझने के लिए आज कांग्रेस पार्टी को बिना किसी टेंशन के हॉलीवुड की इस फिल्म का सीन देखना चाहिए. और राहुल गांधी की सुरक्षा को लेकर निश्चिंत रहना चाहिए.