close

खास खबरें सिर्फ आपके लिए...हम खासतौर से आपके लिए कुछ चुनिंदा खबरें लाए हैं. इन्हें सीधे अपने मेलबाक्स में प्राप्त करें.

ZEE जानकारी: लोकसभा चुनाव के समीकरणों को कितना बदल सकती हैं प्रियंका गांधी

सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या अब लोकसभा चुनाव का मुकाबला, राहुल गांधी बनाम नरेन्द्र मोदी के बजाए प्रियंका वाड्रा बनाम नरेन्द्र मोदी का होगा? 

ZEE जानकारी: लोकसभा चुनाव के समीकरणों को कितना बदल सकती हैं प्रियंका गांधी

अब हम प्रियंका गांधी वाड्रा की बात करेंगे. जो एक राजनीतिक सैटेलाइट की तरह कांग्रेस की पारिवारिक राजनीति वाली Orbit में स्थापित हो चुकी हैं. प्रियंका वाड्रा के राजनीतिक गृह प्रवेश पर आज भी दिन भर चर्चा होती रही. आज के अखबार प्रियंका वाड्रा की तस्वीरों और उनके पुराने बयानों से भरे पड़े थे. अखबारों में ऐसी भी तस्वीरें छपी हुई थीं, जिनमें प्रियंका वाड्रा को उनकी दादी इंदिरा गांधी की Colour Photo Copy बताया गया. कांग्रेस के नेताओं में ज़बरदस्त उत्साह दिख रहा है और प्रियंका को लेकर बीजेपी के नेताओं के बयान और तीखे हो गए हैं. 

इस बीच जनता के मन में कई सवाल तैर रहे हैं. जैसे सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या अब लोकसभा चुनाव का मुकाबला, राहुल गांधी Versus नरेन्द्र मोदी के बजाए प्रियंका वाड्रा Versus नरेन्द्र मोदी का होगा? क्या प्रियंका को सामने लाकर कांग्रेस.. इस मुकाबले के समीकरण बदलना चाहती है ? क्या कांग्रेस अपना Goal Post बदल रही है? क्या नरेंद्र मोदी के लिए राहुल गांधी के मुकाबले, प्रियंका गांधी पर राजनीतिक हमला करना मुश्किल होगा ? और क्या प्रियंका गांधी सोशल मीडिया वाले इस दौर में खुद को एक मज़बूत राजनेता के रूप में स्थापित कर पाएंगी? इंदिरा गांधी के दौर में नेताओं को हर रोज़ जनसंपर्क करने की ज़रूरत नहीं पड़ती थी. क्योंकि उस समय़ संचार के माध्यम बहुत सीमित थे. तब लोग 5 साल में एक बार अपने नेता की एक झलक पाकर भी संतुष्ट हो जाया करते थे. लेकिन आज के दौर की राजनीति बहुत निर्मम है. नेताओं का Exposure पहले के मुकाबले कई गुना बढ़ गया है और उनकी छवि की चमक भी अब पहले के मुकाबले बहुत तेज़ी से फीकी पड़ती है. आज इन पहलुओं पर बात करना ज़रूरी है.

वैसे आज का अपडेट ये है कि प्रियंका वाड्रा महासचिव की ज़िम्मेदारी संभालते ही रायबरेली जाएंगी. फिलहाल वो विदेश में हैं. प्रियंका, रायबरेली में लोगों से मुलाकात करेंगी. ये भी संभावना है कि वो रायबरेली से अगला लोकसभा चुनाव लड़ेंगी. 

सूत्रों की मानें तो प्रियंका वाड्रा का चुनावी सेंटर.. दिल्ली में नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में होगा. उनका पूरा फोकस पूर्वी उत्तर प्रदेश की 43 लोकसभा सीटों पर होगा. और इन सीटों के चुनाव प्रबंधन और प्रचार पर वो लखनऊ से ही नज़र रखेंगी. सूत्र ये भी बता रहे हैं कि विदेश से लौटने के बाद प्रियंका पहली कॉन्फ्रेंस भी लखनऊ में ही करेंगी. और फिर 10 फरवरी को वो लखनऊ में अपने भाई राहुल गांधी के साथ एक चुनावी रैली करेंगी.  ये भी चर्चा है कि 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले जो भूमिका अमित शाह को नरेन्द्र मोदी ने दी थी, उसी भूमिका की उम्मीद राहुल गांधी को अपनी बहन प्रियंका से है.

ये सारे समीकरण अपनी जगह हैं, लेकिन सबसे बड़ी बात ये है कि पूरे उत्तर प्रदेश में कांग्रेस पार्टी का संगठन बहुत कमज़ोर है. पिछले कई वर्षों से कांग्रेस पार्टी के संगठन में ज़ंग लगा हुआ है. संगठन हताश, निराश और थका हुआ है. 2009 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस पार्टी ने उत्तर प्रदेश में अच्छा प्रदर्शन किया था. तब कांग्रेस पार्टी को यहां 22 सीटें मिली थीं. लेकिन इसके बाद जब 2014 में लोकसभा चुनाव हुए तो कांग्रेस को सिर्फ 2 सीटें मिलीं. वो भी एक राहुल गांधी की और दूसरी उनकी मां सोनिया गांधी की. 
 
प्रियंका वाड्रा को पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाकर कांग्रेस ने बहुत ही चतुर रणनीति का परिचय दिया है. इसे राजनीतिक विज्ञान की भाषा में Goal Post Shifting कहा जाता है. इसका मतलब ये हुआ कि कांग्रेस ने बीजेपी के राजनीतिक हमलों को नाकाम करने के लिए.. Target यानी लक्ष्य ही बदल दिया है. अभी तक बीजेपी के नेताओं के निशाने पर राहुल गांधी रहते हैं. राहुल गांधी की राजनीतिक नाकामी की चर्चा बीजेपी के बड़े बड़े नेता अपने मंचों से करते हैं. अगर लोकसभा का चुनावी मुकाबला राहुल गांधी Versus नरेन्द्र मोदी का हो जाए. तो इसका फायदा बीजेपी को होगा. लेकिन कांग्रेस की ये कोशिश है कि ये चुनाव नरेन्द्र मोदी Versus प्रियंका वाड्रा का हो जाए. इससे कांग्रेस को ये फायदा होगा कि बीजेपी के नेता प्रियंका वाड्रा के खिलाफ ज्यादा बात नहीं कर पाएंगे. क्योंकि हमेशा ये लिहाज़ रहेगा कि वो एक महिला हैं, इसलिए ज्यादा आरोप प्रत्यारोप नहीं लगेंगे. 

इसका एक उदाहरण इतिहास में भी मिलता है.
2004 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी के नेताओं ने सोनिया गांधी को विदेशी महिला बताकर उन पर राजनीतिक हमले किए थे. लेकिन इसका फायदा कांग्रेस को हुआ था. और बीजेपी हार गई थी. तब देश में कांग्रेस के नेतृत्व में UPA की सरकार बनी थी. 

हालांकि बीजेपी की ये पूरी कोशिश होगी कि वो प्रियंका वाड्रा को उनके पति रॉबर्ट वाड्रा पर लगे भ्रष्टाचार के मुद्दे पर घेरें. प्रधानमंत्री मोदी और राहुल गांधी की तुलना जब भी होती है तो ये कहा जाता है कि नरेन्द्र मोदी के सामने राहुल नहीं टिक पाएंगे. चाहे वो भाषणों की बात हो, हाज़िर जवाबी की बात हो, या नेतृत्व क्षमता की बात हो. 

ऐसे में 2019 के चुनाव से ठीक पहले प्रियंका वाड्रा को मैदान में उतारकर कांग्रेस पार्टी ने नरेन्द्र मोदी के सवालों और आरोपों का तोड़ खोजने की कोशिश की है. 

नोट करने वाली बात ये है कि 2014 के लोकसभा चुनावों में भी नरेन्द्र मोदी के हर आरोप का जवाब प्रियंका वाड्रा ने ही दिया था. उस वक्त प्रियंका वाड्रा के पास सिर्फ दो सीटों की ज़िम्मेदारी थी, एक रायबरेली और दूसरी अमेठी. लेकिन इस बार उनके पास पूरे पूर्वांचल की 43 लोकसभा सीटों की ज़िम्मेदारी है. 

इससे पहले वो 2017 के उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में पर्दे के पीछे से ज़िम्मेदारी संभाल चुकी हैं. तब कांग्रेस पार्टी ने समाजवादी पार्टी से गठबंधन किया था. और कांग्रेस के प्रत्याशियों के टिकट प्रियंका वाड्रा ने ही फाइनल किए थे. उस दौर में भी नरेन्द्र मोदी और प्रियंका गांधी के बीच ज़बरदस्त ज़ुबानी युद्ध हुआ था. आज हमने अपनी लाइब्रेरी से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के 2014 और 2017 के आरोप और प्रियंका वाड्रा के जवाब निकाले हैं. जो आपको सुनने चाहिएं. 

सबसे पहले तो नरेंद्र मोदी को अपने भाषणों की स्क्रिप्ट बदलनी पड़ेगी. पहले वो मां-बेटे की सरकार बोलते थे.. अब उन्हें मां-बेटी कहना पड़ेगा.

एक पहलू ये भी है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी के लिए "करो या मरो" जैसे हालात हैं. कांग्रेस पार्टी को इस बात का डर सता रहा है कि अगर पार्टी नरेन्द्र मोदी को सत्ता में आने से नहीं रोक पाती तो रॉबर्ट वाड्रा का जेल जाना तय है. और इसके साथ ही राहुल गांधी और सोनिया गांधी के खिलाफ़ नेशनल हेराल्ड केस में भी करवाई हो सकती है. 

शायद इसी डर की वजह से कांग्रेस को, प्रियंका गांधी वाड्रा को चुनाव के आखिरी दौर में मैदान में उतारना पड़ा. आमतौर पर ये माना जा रहा था कि 2019 के लोकसभा चुनाव में अगर कांग्रेस हारती है, तो राहुल गांधी के नेतृत्व पर सवाल उठता और फिर प्रियंका वाड्रा की राजनीति में Entry होती. लेकिन गांधी परिवार में आपसी सहमति से ये बात तय हुई कि 2019 के चुनाव में ही पूरी ताक़त लगा दी जाए. और इसीलिए कांग्रेस पार्टी ने अपना Trump Card इस्तेमाल कर लिया. प्रियंका वाड्रा को मैदान में उतारने का फैसला तब लिया गया, जब वो देश में थी ही नहीं. वो इस वक्त अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर में हैं. सूत्रों की मानें तो हाल ही में दुबई दौरे के बाद राहुल गांधी ने न्यूयॉर्क में जाकर प्रियंका से मुलाकात की और इसके बाद ये ऐलान हुआ. 
 
कल से लेकर आज तक बड़े बड़े अखबारों के लेख और चैनलों की न्यूज़ प्रोग्रामिंग में प्रियंका वाड्रा और उनकी दादी की समानताओं के बारे में ज्ञान दिया जा रहा है. लोग प्रियंका को उनकी दादी इंदिरा गांधी की Colored Photo Copy बता रहे हैं. और इसी आधार पर ये दावा कर रहे हैं कि प्रियंका के राजनीति में आने से कांग्रेस को फायदा होगा. 

लेकिन क्या वाकई ऐसा है? क्या सिर्फ चेहरा और नैन नक्श मिलने से ये समझ लिया जाना चाहिए कि प्रियंका गांधी भी अपनी दादी की ही तरह Dynamic Leader बनेंगी? 

यहां ये बात ध्यान में रखनी होगी कि 1984 में जब इंदिरा गांधी की हत्या हुई तब वो अपने चरम पर थीं. वो देश की प्रधानमंत्री थीं और कांग्रेस की अध्यक्ष भी थीं. लेकिन तब के और आज के भारत में बहुत बदलाव आ चुका है. इन 34 वर्षों में सिर्फ देश ही नहीं.. वो उत्तर प्रदेश भी बदल चुका है, जहां का महासचिव प्रियंका वाड्रा को बनाया गया है. 

आज का उत्तर प्रदेश...1984 वाला उत्तर प्रदेश नहीं है. वो दौर अलग था. तब अपने नेताओं की एक झलक पाने के लिए लोगों को 5 साल इंतज़ार करना पड़ता था. तब नेताओं का Exposure बहुत सीमित था. उस दौर में इंटरनेट नहीं था, सोशल मीडिया नहीं था, प्राइवेट टीवी चैनल्स नहीं थे और अखबारों की पहुंच भी बहुत सीमित थी. लेकिन अब ऐसा नहीं है. अब लोग अपने नेताओं की पल पल की गतिविधियों का अपडेट सोशल मीडिया या टीवी पर देख लेते हैं या अखबार में पढ़ लेते हैं. 

नेताओं का Exposure बहुत ज्यादा हो गया है. वो सार्वजनिक रूप से क्या करते हैं, इसकी हर जानकारी सोशल मीडिया पर मौजूद रहती है. आज का दौर ऐसा है कि कोई भी नेता.. रातों रात, ज़ीरो से हीरो बन सकता है और रातों रात... हीरो से ज़ीरो बन सकता है. 

इसलिए इस दौर में सिर्फ शक्ल और सूरत मिलने पर ये दावा नहीं करना चाहिए कि प्रियंका वाड्रा भी अपनी दादी इंदिरा गांधी की तरह एक मज़बूत नेता साबित होंगी. मौजूदा हालात में ऐसा कहना अभी जल्दबाज़ी होगी

वोटर समझदार हो चुका है

वोटर की अपेक्षाएं बहुत बढ़ चुकी हैं