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ममता के गढ़ में TMC को मिलेगी बीजेपी से चुनौती, वक्त के साथ रंग बदलती है यह सीट

जैसे रायबरेली और अमेठी को कांग्रेस का गढ़ कहा जाता है, ठीक वैसे ही कोलकाता दक्षिण तृणमूल कांग्रेस का गढ़ है. इस सीट से ही ममता बनर्जी सांसद थीं और फिर राज्य की सत्ता पर काबिज हुईं. 2014 के मुकाबले इस सीट पर तृणमूल का दबदबा कायम है, लेकिन बीजेपी टीएमसी को टक्कर देने की पूरी कोशिश करेगी. 

ममता के गढ़ में TMC को मिलेगी बीजेपी से चुनौती, वक्त के साथ रंग बदलती है यह सीट
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का फाइल फोटो...

नई दिल्ली : अंग्रेजों के जमाने में देश राजधानी रही कोलकाता बहुत पुराना शहर है. इस शहर में दो लोकसभा सीट आती हैं, कोलकाता दक्षिण और कोलकाता उत्तर. यह दोनों ही सीटों पर अब तक तृणमूल कांग्रेस के खाते में है. कोलकाता को पहले कलकत्ता कहा जाता था. यहां पर सबसे पुराना बंदरगाह है. ऐसा कहा जाता है कि कोलकाता में एशिया की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था है. देश का सबसे पुराना कोलकाता विश्वविद्यालय की पूरे देश में पहचान है. 

इसी सीट से ममता बनर्जी बनी सीएम
जैसे रायबरेली और अमेठी को कांग्रेस का गढ़ कहा जाता है, ठीक वैसे ही कोलकाता दक्षिण तृणमूल कांग्रेस का गढ़ है. इस सीट से ही ममता बनर्जी सांसद थीं और फिर राज्य की सत्ता पर काबिज हुईं. 2014 के मुकाबले इस सीट पर तृणमूल का दबदबा कायम है, लेकिन बीजेपी टीएमसी को टक्कर देने की पूरी कोशिश करेगी. 

सुभाषचंद्र के प्रपौत्र पर बीजेपी ने खेला दांव
बीजेपी ने पश्चिम बंगाल में सुभाषचंद्र बोस के प्रपौत्र चंद्र कुमार बोस पर दांव लगाया है. चंद्र कुमार बोस को कोलकाता दक्षिण से टिकट दिया गया है. चंद्र कुमार बोस पिछले विधानसभा चुनावों में बीजेपी की तरफ से सीएम ममता बनर्जी के खिलाफ चुनाव मैदान में उतरे थे. चंद्र कुमार बोस नेताजी सुभाष चंद्र बोस के परिवार से आते है. वह नेताजी के पड़पोते हैं. 

जमाने का साथ चलती है सीट
कोलकाता दक्षिण सीट के बारे में एक पुरानी कहावत है, जैसे-जैसे वक्त बदलता है इस सीट की जनता का मिजाज बदल जाता है. अंग्रेजों से आजादी के बाद जब इस सीट का गठन हुआ था, तब यहां सीपीएम मजबूत थी. 1967 में यहां से सीपीएम के जी घोष जीते थे. वक्त बदला और कांग्रेस ने अपनी पैठ को मजबूत किया और 1971 में सीपीएम की बाजी को पलटते हुए कांग्रेस के प्रिय रंजन दासमुंशी ने जीत दर्ज की. 1977 में बीएलडी के दिलीप चक्रवर्ती यहां से चुनाव जीते.1980 के चुनाव में सीपीएम के सत्य साधन चक्रवर्ती को विजय मिली.

कांग्रेस के प्रेम से भी नहीं रही अछूती
1984 में जब इंदिरा गांधी की हत्या हुई और देश में कांग्रेस के प्रति सहानुभूति की लहर चली, उस वक्त भी यह सीट उस लहर से अछूती नहीं औक 1984 में चुनाव में भोलानाथ सेन ने जीत दर्ज की. 1989 में बाजी पलट गई और सीपीएम के बिप्लब दास गुप्ता ने कांग्रेस को मुंहतोड़ जवाब दिया. बिप्लब दास के बाद ममता बनर्जी ने इसी सीट को कर्मभूमि बनाया और विजयी हुईं.

विधानसभा सीटों पर है तृणमूल कांग्रेस का कब्जा
इस सीट को तृणमूल कांग्रेस का गढ़ इसलिए भी कहा जाता है, क्योंकि इस सीट के अंतर्गत 7 विधानसभा सीटें आती हैं और इन सभी सीटों पर टीएमसी ने जीत दर्ज की हुई है. 

1-कस्बा पर AITC के अहमद जावेद खान विधायक हैं

2-बेहला पूरबा पर AITC के सोवन चटर्जी विधायक हैं

3-बेहला पश्चिम से AITC के प्रथा चटर्जी विधायक हैं

4-कोलकाता पोर्ट से AITC फिरहाद हकीम विधायक हैं  

5-भबानीपुर से AITC सुप्रीमो ममता बनर्जी खुद विधायक हैं  

6-रासबेहरी से AITC शोभानदेब चट्टोपाध्याय विधायक हैं

7-बालीगॉन्ग से AITC सुब्रत मुखर्जी विधायक हैं.