Lockdown: सेक्स वर्कर्स की गलियों में पसरा सन्नाटा उनके पेट की भूख के शोर को बढ़ा रहा है

मैं आज आपको एक ऐसे वर्ग की परेशानी के बारे में बताने जा रहा हूं जिसके बारे में सभ्य समाज के लोग बात करने से घबराते हैं या फिर यूं कहें कि इस वर्ग को नजरअंदाज करते हैं

Lockdown: सेक्स वर्कर्स की गलियों में पसरा सन्नाटा उनके पेट की भूख के शोर को बढ़ा रहा है

नई दिल्ली: कोरोना वायरस की वजह से दुनियाभर में हड़कंप मचा हुआ है. रिपोर्ट के मुताबिक अब तक दुनिया में 18 लाख से ज्यादा लोग कोरोना वायरस से पीड़ित हैं और एक लाख से ज्यादा लोग इस महामारी की वजह से अपनी जान गंवा चुके हैं. 

दुनिया का हर देश पूरी ताकत से इस महामारी का सामना कर रहा है लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद अब तक इस वायरस की दवाई खोजी नहीं जा सकी है. 

ऐसे में कोरोना से बचने के लिए कई देशों ने लॉकडाउन किया है. लॉकडाउन का मतलब है कि लोग अपने घरों पर ही रहेंगे और केवल इमरजेंसी के हालातों में ही घर से बाहर निकलेंगे. 

इस वजह से दुनिया के लगभग हर देश की इकोनॉमी को भारी नुकसान पहुंचा है.  कुछ समय पहले International Monetary Fund (IMF) ने बताया था कि दुनिया मंदी में प्रवेश कर चुकी है. अगर समय रहते इस महामारी पर काबू नहीं पाया गया तो इस मंदी से निपटने में काफी लंबा समय लगेगा.

लॉकडाउन की वजह से व्यापार ठप है और कई कंपनियों ने कर्मचारियों की छंटनी या उनकी सैलरी काटने का भी ऐलान कर दिया है. लॉकडाउन ने सबसे ज्यादा असर उन लोगों पर डाला है जो हर दिन कमाकर खाते हैं और वही कमाई उनके जिंदा रहने का आधार है. इन लोगों में मजदूर वर्ग समेत तमाम लोग हैं. 

ऐसे में संकट ये है कि जिन लोगों के पास एक दिन का खाना खाने के लिए भी पैसे नहीं हैं, वो लोग क्या करेंगे? ना ही वो मजदूरी कर अपना पेट पाल सकते हैं, क्योंकि लॉकडाउन है और ना ही किसी से खाना मांगने के लिए घर से बाहर जा सकते हैं, क्योंकि लॉकडाउन की वजह से बाहर निकलना मना है.     

मैं आज आपको एक ऐसे वर्ग की परेशानी के बारे में बताने जा रहा हूं जिसके बारे में सभ्य समाज के लोग बात करने से घबराते हैं या फिर यूं कहें कि इस वर्ग को नजरअंदाज करते हैं. सभ्य समाज के लोग ऐसा इसलिए भी करते हैं क्योंकि वो इस वर्ग को स्याही की वो छीटें मानते हैं जो उनके व्हाइट कॉलर पर जिंदगीभर के लिए दाग लगा देंगी. वहीं अगर ग्राउंड रिपोर्ट की बात करें तो लॉकडाउन ने इस वर्ग को आम आदमी से ज्यादा प्रभावित किया है और इनके जीवन के आधार को तोड़कर रख दिया है.  

ये वर्ग है सेक्स वर्कर्स का. लोग इन्हें तरह-तरह के नाम से बुलाते हैं. प्रोस्टीट्यूट, वेश्या, धंधा करने वाली, जिस्म बेचने वाली. ऐसी ना जाने कितनी पहचान लेकर ये सेक्स वर्कर्स हर दिन अपना पेट बमुश्किल पालती हैं. हमारे देश में कोई इनका असली नाम तक नहीं जानता तो सरकारी सुविधाओं और योजनाओं का लाभ मिलने की बात तो भूल ही जाइए. भारत के तमाम रेड लाइड एरियों में पेट की भूख मिटाने के लिए ये सेक्स वर्कर्स चंद रुपए में अपना शरीर बेचती हैं. जाहिर सी बात है कि कोई भी इंसान खुशी के साथ इस काम को नहीं करना चाहता, लेकिन कोई ना कोई मजबूरी उन्हें इस दलदल में ले आती है और फिर हर दिन जिस्म बेचकर ही उन्हें अपने पेट का इंतजाम करना पड़ता है. 

मैं यहां केवल रेड लाइट एरियों के कोठों में काम करने वाली सेक्स वर्कर्स की बात कर रहा हूं क्योंकि कॉल गर्ल्स और स्पा सेंटरों में काम करने वाली लड़कियों को कोठों की लड़कियों की तुलना में ज्यादा पैसा और आजादी मिलती है, जिससे वह अपनी आर्थिक जरूरतें तुलनात्मक रूप से ठीक तरह से पूरा कर पाती हैं. 

रेड लाइट एरिया में काम करने वाली सेक्स वर्कर्स को अपनी कमाई से 2 वक्त का अच्छा खाना और सुकून की नींद मिल जाए तो भी बड़ी बात है क्योंकि इन रेड लाइट एरियों में तमाम कोठे चलते हैं और इन कोठों के मालिक बेहद सख्त होते हैं. जो रुपए सेक्स वर्कर्स को अपना जिस्म बेचकर मिलते हैं, उनमें से एक बड़ा हिस्सा कोठे के मालिक का होता है. यानी ये सेक्स वर्कर्स उन मजदूरों की तरह कोठों में काम करती हैं, जहां इनसे मजदूरी तो दिन-रात कराई जाती है लेकिन मेहनताना ऊंट के मुंह में जीरे के समान मिलता है.  

अब अगर तथ्यों की बात करें तो लॉकडाउन की वजह से भारत में इन सेक्स वर्कर्स को 2 वक्त का खाना भी सही से नहीं मिल पा रहा है, जिससे इनके सामने भूखा रहने की नौबत आ गई है. बात सिर्फ इन सेक्स वर्कर्स की ही नहीं है बल्कि इनके बच्चे भी भूख से परेशान हो रहे हैं.

दुनियाभर में तमाम रेड लाइट एरिया हैं लेकिन भारत के अलावा बाकी देशों में सेक्स वर्कर्स की जिंदगी आर्थिक रूप से अपेक्षाकृत बेहतर है और वहां की सरकारें सेक्स वर्कर्स के हित के लिए तमाम योजनाएं भी चलाती है. ऐसा इसलिए भी है क्योंकि दुनिया के तमाम देशों में वेश्यावृत्ति (देह व्यापार) को कानूनी मान्यता मिली हुई है. 

अगर विदेशों के रेड लाइट एरिया की बात करें तो एम्सटर्डम का नाम मुख्य रूप से आता है. ये नीदरलैंड की राजधानी है. ये नगर जितना प्रसिद्ध अपनी नहरों के लिए है, उतना ही प्रसिद्ध अपने रेड लाइट एरिया के लिए भी है. यहां वेश्यावृत्ति कानूनी रूप से वैध है लेकिन कोरोना की वजह से यहां की सरकार ने भी 16 अप्रैल तक रेस्टोरेंट, कैफे और स्कूल बंद करने की घोषणा की है, जिसे आगे भी बढ़ाया जा सकता है. लोग रेड एरिया नहीं जा पा रहे इसलिए गांजे का सेवन कर रहे हैं. कुछ समय पहले तक यहां गांजा खरीदने के लिए लंबी लाइनें लगी हुई थीं. हैरान मत होइए, यहां गांजा भी कैफे वगैरह में मिल जाता है. 

बर्लिन में भी सेक्स वर्कर्स का बुरा हाल है. वह भी पैसे की तंगी से जूझ रही हैं. बंदी की वजह से उनके व्यापार पर भी काफी असर पड़ा है. जर्मनी में 2 लाख से ज्यादा सेक्स वर्कर हैं. 2002 में यहां वेश्यालयों को कानूनी रूप से वैध कर दिया गया था. 

दुनिया के तमाम देशों में वेश्यावृत्ति कानूनी रूप से वैध है, इससे सेक्स वर्कर्स को सभी तरह की सरकारी योजनाओं और सुविधाओं का फायदा मिलता है और वे बाकी देशों की सेक्स वर्कर्स की अपेक्षा आर्थिक रूप से समृद्ध जीवन जीती हैं. जिन देशों में वेश्यावृत्ति वैध है, उनमें बेल्जियम, ब्राजील, कनाडा, कोलंबिया, न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रेलिया, ऑस्ट्रिया, बांग्लादेश, डेनमार्क, इक्वेडोर, फ्रांस, जर्मनी, ग्रीस, इंडोनेशिया और नीदरलैंड हैं. 

वहीं अगर भारत की बात करें तो यहां देह व्यापार अवैध है लेकिन फिर भी देश में तमाम रेड लाइट एरिया हैं. भारत में कुछ रेड लाइट एरिया बहुत बड़े हैं जिनमें लाखों सेक्स वर्कर्स काम करती हैं. अकेले कोलकाता के सोनागाछी में ही एक लाख से ज्यादा सेक्स वर्कर्स हैं.  इसके अलावा ये रेड लाइट एरिया मुंबई के कमाठीपुरा, पुणे के बुधवार पेठ, इलाहाबाद के मीरगंज, दिल्ली के जीबी रोड, मुजफ्फरपुर (बिहार) के चतुर्भुज स्थान,  नागपुर के गंगा-जमुना, ग्वालियर के रेशमपुरा, वाराणसी के शिवदासपुर और मेरठ के कबाड़ी बाजार में हैं. इसके अलावा भी देश में तमाम रेड लाइट एरिया छोटे-बड़े स्तर पर चल रहे हैं. 

सोनागाछी के रेड लाइट एरिया पर बनी डॉक्यूमेंट्री Born Into Brothels को तो ऑस्कर अवॉर्ड भी मिल चुका है. ये फिल्म रेड लाइट एरिया में काम करने वाली सेक्स वर्कर्स के बच्चों पर आधारित है.

अब अगर लॉकडाउन की वजह से इन सेक्स वर्कर्स की परेशानी की बात करें तो सबसे बड़ा संकट 2 वक्त के खाने का है. भारत ने 25  मार्च को 21 दिनों के लिए लॉकडाउन घोषित किया था. इस अवधि को आगे भी बढ़ाया जा सकता है क्योंकि भारत में लगातार कोरोना के मामले बढ़ रहे हैं और इसकी निश्चित दवा ना होने की वजह से इस पर लगाम लगाना जरूरी है. भारत में कोरोना पीड़ितों की संख्या अब तक 9352 हो गई है और 324 लोगों की मौत हो चुकी है.

ऐसे में लोग घरों से बाहर नहीं निकल रहे हैं, इस वजह से सेक्स वर्कर्स के पास कमाई का कोई जरिया नहीं है और ना ही इतनी बचत है कि लंबे समय तक 2 वक्त की रोटी का इंतजाम कर सकें. चंद रुपए में सेक्स बेचने वाली इन वर्कर्स के लिए मुश्किल ये भी है कि उनकी आंखों के सामने उनके बच्चे भूख से बेहाल हो रहे हैं.

हालांकि तमाम एनजीओ, पुलिस और गुरुद्वारे...सेक्स वर्कर्स को खाना बांटने की मुहिम में आगे आए हैं लेकिन लाखों सेक्स वर्कर्स को हर दिन 2 टाइम का खाना पहुंचाना एक बड़ी चुनौती है. ऐसे में सेक्स वर्कर्स और उनके बच्चे भुखमरी की कगार पर पहुंच गए हैं. 

बीते 21 दिनों से इन सेक्स वर्कर्स की कोई आमदनी नहीं हुई है और आगे भी लॉकडाउन जारी रहने तक कोई कमाई होने की संभावना नहीं है. बिना पैसे के कोई भी दुकानदार इन्हें राशन का सामान देने को तैयार नहीं है और सरकार की तरफ से भी कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है. कुछ सेक्स-वर्कर्स को दुकानदार से आपसी व्यवहार में उधार मिल भी जाता है लेकिन देशभर की लाखों सेक्स वर्कर्स को अनिश्चित समय तक 2 वक्त का खाना देने का जिम्मा कौन उठाएगा? पेट की भूख मिटाने के लिए देह बेचने वाली इन सेक्स वर्कर्स के लिए क्या हम कुछ नहीं कर सकते? ये बड़े सवाल हैं.  

(लेखक: ऋतुराज त्रिपाठी Zee News डिजिटल में सीनियर सब एडिटर हैं)

(डिस्क्लेमर: इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)