आजादी के 71 साल: 'खड़िया के घेरे' में हैं इंसान की आजादी

हम अपनी आज़ादी की 71वीं वर्षगांठ मना रहे हैं लेकिन क्या हम वाकई में आजाद हैं. दरअसल सभ्यता के विकास से लेकर अब तक हम कभी आजाद हुए ही नहीं है. जिस तरह से लाश को श्मशान तक ले जाते वक्त कंधे बदले जाते हैं उसी तरह हमने बस गुलामी के कंधे बदले हैं. 

आजादी के 71 साल: 'खड़िया के घेरे' में हैं इंसान की आजादी

'गेम ऑफ थ्रॉन्स' में लेडी टार्गेरियन जब तीन देशों के लोगों को गुलामी से मुक्ति दिला देती है और उनके मालिकों को सजा दे देती है. जब उसे लगता है कि अब यहां के लोग आजाद हैं तभी एक दिन उसकी सभा में एक बूढ़ा आदमी आता है. वो वहां पर तमाम प्रकार की शिकायतें करता है. जब रानी उसकी सारी समस्याओं का समाधान करने का वादा करती है तो वो कहता है कि नहीं उसे ये सब नहीं चाहिए. रानी के पूछने पर फिर वो उसके लिए क्या कर सकती है. बूढा बोलता है कि वो फिर से अपने मालिक का गुलाम बनना चाहता है. रानी उससे बोलती है, मैंने आप लोगों की आजादी के लिए ये लड़ाई लड़ी, जिससे कोई  आपको फिर से गुलाम बनाकर नहीं रख सके और आप फिर से गुलाम बनना चाहते हो.' बूढ़ा बोलता है, क्योंकि मुझे समझ नहीं आ रहा है कि मैं करूं क्या? रानी चुप हो जाती है. फिर कहती है क्योंकि हमने आजादी की लड़ाई लड़ी है और आजादी कहती है कि आप अपने फैसले लेने के लिए स्वतंत्र हो इसलिए आप फिर से गुलाम बन सकते हो.

हम अपनी आज़ादी की 71वीं वर्षगांठ मना रहे हैं लेकिन क्या हम वाकई में आजाद हैं. दरअसल सभ्यता के विकास से लेकर अब तक हम कभी आजाद हुए ही नहीं है. जिस तरह से लाश को श्मशान तक ले जाते वक्त कंधे बदले जाते हैं उसी तरह हमने बस गुलामी के कंधे बदले हैं. 

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गुलामी के नाम अलग–अलग हैं लेकिन गुलामी कायम है. हम एक को छोड़ने से पहले ही दूसरे को पकड़ने का इंतजाम कर लेते हैं. ये कुछ उस लत की तरह है जिसे छोड़ने के लिए हमें दूसरी लत पकड़नी पड़ती है. यानी सिगरेट छोडने के लिए च्यूइंगम को चबाने की लत डाल ली. हमें गुलामी की लत है.

इंसान के पास बेशकीमती विवेक होता है. लेकिन हमने उस विवेक को बांध दिया है. इसलिए हम उस सच को जान ही नहीं पाते हैं जो हमे बता सके कि हम किसी गुलामी की जंजीर में जकड़े हुए हैं. अगर हम किसी संप्रदाय को मन में लिए घूम रहे हैं, किसी वाद के तहत जी रहे हैं, मन को किसी शास्त्र ने जकड़ रखा है तो मानकर चलिए कि हमने अपने विवेक को गुलाम बना रखा है. हम जिन महापुरुषों को या वादों को मानते हैं वो भी यही चाहते हैं कि हम सबसे मुक्त हो सकें लेकिन होता क्या है हम उन महापुरुषों के ही गुलाम बन जाते हैं. 

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दरअसल हम जिसे आजादी का दिन कहकर उत्सव मना रहे हैं वो आजादी का दिन नहीं, बल्कि कंधे बदलने का दिन है. हम उस चिड़िया की तरह हैं जिसे एक पिंजरे में कैद करके रखा गया है. पिंजरा चारों तरफ से कांच से घिरा हुआ है. कांच की दीवार से चिड़िया बाहर की पूरी दुनिया देखती है. लेकिन शायद दीवार के इस तरफ कैद चिड़िया ये नहीं जानती है कि बाहर पूरा आकाश है. उसके पास पंख हैं. वो उड़ सकती है. उसे तो ये मालूम ही नहीं है कि इन पंखों से उड़ा भी जा सकता है. बल्कि आप उसे अगर पिंजरे से बाहर निकालो, तो वो घबराकर दोबारा पिंजरे में चली जाएगी क्योंकि उसे वो जगह सुरक्षित लगती है. 

हम आजादी की बात भले ही करते हों, अपने झंडे के तले खुद को आजाद मानकर खुश होते हों लेकिन हकीकत यही है कि आदमी पैदा भले ही स्वतंत्र हुआ हो, लेकिन फिर धीरे-धीरे वो बंधनो में बंधता जाता है. कम ही ऐसे खुशनसीब होंगे जो आजाद जीते हैं. और आजाद ही मरते हैं. खास बात ये है कि हमने अपनी इन बेड़ियों को फूलों से सजाकर रखा है, जो जेलें हैं हम उसे मंदिर मानकर बैठे हैं. हम आजादी चाहते तो हैं लेकिन हमारी कोशिश किसी ना किसी तरह की गुलामी में जीने की रहती है. 

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यही नहीं हम हमारी परतंत्रता की रक्षा भी करते हैं. अगर हमारी गुलामी पर कोई चोट पहुंचाता है तो हमें तकलीफ हो जाती है.  कोई हमें अगर बताता है या हमे गुलामी से मुक्ति दिलाना चाहता है तो वो हमें दुश्मन लगता है. ऐसा इसलिए हैं क्योंकि  हमने अपनी अपनी गुलामियों को आजादी शब्द के कपड़े पहना रखे हैं. 

जब कोई कहता है कि वो हिंदू है तो उसे इस बात का इल्म ही नहीं रहता है कि वो खुद के गुलाम होने की जानकारी दे रहा है. कोई अपने को मुसलमान बताते वक्त जरा भी नहीं सोचता है कि उसने अपने चारों तरफ एक दीवार बना ली है. किसी वाद में, किसी संप्रदाय में, किसी मानसिकता में अपने को बांधकर हम कभी भी नहीं सोचते हैं कि हमने अपने लिए एक जेल तैयार कर ली है. हम इस गुलामी के इस कदर आदी हो गए हैं कि हमने खुद को धोखा देना तक सीख लिया है. हमने अपनी जेलों को सुंदर नाम, उपमाएं दे रखी हैं, अपनी जंजीरों को फूलों की माला मान लिया है. और जो लोग या विचार हमें लगातार कैद कर रहे हैं हम उन्हें ही अपना मुक्तिदाता मान कर बैठे हैं.

हम दरअसल इंसानों के नहीं विचारों के गुलाम हैं. हमारी आजादी उसी दिन छिन जाती है जिस दिन कोई विचार का ढांचा हमें चारों तरफ से पकड़ लेता है. किसी को जेल में बंद कर दो, लोहे की जंजीर में जकड़ दो तो वो दिखेगी. लेकिन विचारों की जेल कभी दिखाई नहीं पड़ती है. और जो जेल अदृश्य होती है उससे खतरनाक कुछ नहीं है. दरअसल हम उन जंजीरों में बंधे हैं जो है ही नहीं. उन जेंलों में कैद हैं जो दिखाई ही नहीं देती है. 

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एक गांव में महिलाएं अपने छोटे बच्चों को लेकर जंगल में या खेत में काम करने जाती थीं तो उन्हें बच्चों को बांधे रखने के लिए कोई ना कोई उपाय करने पड़ते थे. उन्होंने इसके लिए एक बहुत ही अनूठी प्रक्रिया खोजी. ये वो प्रक्रिया है जो वहां कई सालों से चल रही है और बड़ी उपयोगी भी है. वो छोटे बच्चे को एक जगह पर बैठा देती हैं और उसके चारों तरफ खड़िया से एक लकीर खींच देती हैं, और उस बच्चे को समझा देती हैं कि तू इसके बाहर नहीं निकल पाएगा. कभी कोई बच्चा नहीं निकल पाया. अब बचपन से यही बात कही जा रही थी और गांव भर के बच्चों को कही जाती थी. सब बच्चे ये ही जानते थे कि खड़िया की रेखा के बाहर आज तक कोई नहीं निकल सका, इससे बाहर निकला ही नहीं जा सकता.

तो आजादी का उत्सव मनाने से पहले एक बार अच्छे से देख लीजिएगा कि कहीं किसी खड़िया के घेरे में कैद होकर आजादी का गीत तो नहीं गा रहे हैं...

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)