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पद्मश्री बाबूलाल दाहिया : देसी अन्नों का देहाती विश्वामित्र

दाहिया जी को यह सम्मान पारंपरिक बीजों के संरक्षण और उनकी खेती के विस्तार को प्रोत्साहन देने के लिए मिला है. वे पिछले पंद्रह सालों से देसी बीजों की तलाश में पूरा देश घूम चुके हैं. बाबूलाल एक साथ दस काम ओढ़े हुए चलते हैं.

पद्मश्री बाबूलाल दाहिया : देसी अन्नों का देहाती विश्वामित्र

 

चिलचिलात इया घाम, पसीना हमरे बद है
दिन निकरत से काम, पसीना हमरे बद है
कूलर, पंखा, छाँह, बैहरा सब तोहरैं ता
हमी अराम हराम, पसीना हमरे बद है.

 

पचहत्तर साल के रिमही बोली के इस जनकवि का यही परिचय है भारत के चौथे क्रम के सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मश्री मिलने के बाद भी. सम्मान की सूचना मिलने के बाद बधाई के जवाब में बाबूलाल दाहिया बताशे सी मिठास घोलते हुए वो कहते है- इया अकेले मोका(मुझको)भर थोरिन मिला है..एमा हम सब शामिल हैन. बाबूलाल दाहिया जो लिखते और बोलते हैं वही जीते हैं. 

दाहिया जी को यह सम्मान पारंपरिक बीजों के संरक्षण और उनकी खेती के विस्तार को प्रोत्साहन देने के लिए मिला है. वे पिछले पंद्रह सालों से देसी बीजों की तलाश में पूरा देश घूम चुके हैं. बाबूलाल एक साथ दस काम ओढ़े हुए चलते हैं. मसलन जब वो बीज यात्रा में निकलते हैं तो जहाँ-जहाँ उनका ठिकाना बनता है वहां-वहां की महक भी अपने साथ समेटे लाते हैं. वहां के रीति-रिवाज-परंपरा-संस्कृति सब यहां तक कि व्यंजनों का फार्मूला भी.

पिछले साल पूष में बाबूलाल जी मुझे अपने साथ त्योंथर तहसील के एक गांव कोनिया कोलमोजरा पकड़ ले गए थे. वहां के किसानों ने ज्वार महोत्सव रच रखा था. त्योंथर के इस दस्युपीड़ित गांव में दाहिया जी की प्रेरणा से किसान ज्वार-बाजरा, कौदौ-कुटकी, साँवा-काकुन की पारंपरिक खेती में लौट आए थे. जैवविविधता बोर्ड के सचिव श्रीनिवासन मूर्ति साहब भी थे. किसानों ने खुद एक-एक करके बताया कि इस पारंपरिक खेती ने उनकी खुशियां किस तरह लौटाईं है. किसानों ने दाहिया जी को ज्वार से तौलकर व अपने खेतों के फल-सब्जियों की माला पहनाकर अभिनंदित किया. वहां के खेतों में पैदा होने वाले मोटिया अन्नों के एक से एक स्वादिष्ट व्यंजनों से हम लोगों की ऐसी खातिरदारी की कि क्या बताएं. अमारी( भिंडी की प्रजाति का पौधा जिससे पटसन निकलता है और इसकी रस्सी बनाते हैं) के फूलों की वह खट्टी चटनी अभी तक जुबान पर है.

बाबूलाल जी का गांव पिथौराबाद किसान स्वाभिमान की एक नई क्रांति का जनक है. उनके गांव घुसते ही रामलोटन भाई की बगिया वे जरूर घुमाते हैं. रामलोटन की बगिया में देसी सब्जियों, विलुप्त हो रहे औषधीय पौधों की खूबसूरत नर्सरी है.  रामलोटन के इस कृतित्व के पीछे बाबूलाल जी की प्रेरणा है. वे खुद कहते हैं कि मैं अकेले कुछ भी नहीं हूँ..जो कुछ हूँ रामलोटन जैसे कई ऐसे किसानों की वजह से हूँ.

गांव के तालाब की तलहटी में दाहिया जी के काश्त की समूची जमीन प्रयोगशाला है. बड़े खेतों को छोटी-छोटी डग्गियों(रिमही में इन्हें गटई भी कहते हैं) में बाँट रखा है. दाहिया जी के खजाने में देसी धान की डेढ़ सौ से ज्यादा बीज हैं. छह एकड़ के रकबा कम पड़ता है. एक गटई में पाँच-पाँच किस्मों की धान. इन बीजों को बचाए रखने और इसकी खेती को फैलाने की गरज से गांव के किसानों को पटाया और फायदे गिनवाए. आज पिथौराबाद जैव विविधता की दुर्लभ प्रयोगशाला है. यहां वो सब कुछ जतन से है जिसे अबतक दाहिया जी ने कहीं खोजा. लोनगी, नेवारी, लोंचई, कालीमूछ, जिलदार, साँवासार, डिहुला धान की ये सब देसी प्रजातियां खरीफ के सीजन में लहलहाती मिलेंगी. धान की इन प्रजातियों का नाम इसलिए जानता हूँ कि बचपन में मेरे अपने गांव में यही बोई जाती थी. इन सबकी तासीर और स्वाद गजब का होता था. 

धानों का भी अपना वर्ग चरित होता था. मसलन यदि समधी आया तो जिलदार बनेगी. जिलदार अपनी महक से बता देता था कि आज उस घर में कोई खास मेहमान आया है. रूटीन में लोनगी, नेवारी बनती थी. बनी-मजूरों के बद डिहुला और साँवासार. दाहिया जी के खजाने में हजारों किस्से, कहावतें, उख्खान हैं जो हमारे खानपान, अन्न, पेंड़ पौधों से जुड़े हैं. बोली भाषा के एक श्रेष्ठ रचनाकार के वैग्यानिक बनने के पीछे का किस्सा बड़ा दिलचस्प है. दाहिया जी से जब से मेरा रिश्ता जुड़ा और उनको जितना जान पाया लगे हाथ वो भी सुन लीजिए.

विंध्यक्षेत्र में मेरी पत्रकारीय यात्रा कोई 1985 से शुरू हुई. दाहिया जी अखबार में नौकरी न करते हुए भी देशबन्धु परिवार के सदस्य बन गए. वजह हिंदी साहित्य सम्मेलन और प्रगतिशील लेखक संघ. पुण्यस्मरणीय मायाराम सुरजन इन सबके केंद्र में थे. एक दिन अखबार के साथी समर्थ कवि सुदामा शरद ने परिचय कराया इनसे मिलिए ये हैं प्रोफेसर बाबूलाल दाहिया फ्राम पिथौराबाद. सुदामा जी बाबूलाल जी को मजाक मजाक में प्रोफेसर कहते थे. उन्हें क्या पता कि आगे चलकर दाहिया जी जैवविविधता के इतने बड़े विशेषज्ञ बन जाएंगे कि वैग्यानिकों, प्रोफेसरों की भी क्लास लेने लगेंगे. उन दिनों सुदामा शरद- बाबूलाल दाहिया की क्षेत्रीय कवि सम्मेलनों में धूम थी. दाहिया जी रिमही में वैसे ही प्रभावशाली तरीके से लिख रहे थे जैसे कि बुंदेली में रमेश रंजक और अवधी में कैलाश गौतम. जनजीवन के संघर्ष की कथा वे अपनी कविताओं, गीतों में अत्यंत प्रभावशाली तरीके से उतारते थे. वे हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़ गए. देश प्रदेश जहाँ कहीं भी आयोजन होते दाहिया जी की उपस्थिति अनिवार्य रहती. चित्रकूट की कहानी रचना शिविर और कोरबा की नाट्य रचना शिविर में इनके लेखन की श्रेष्ठता का सम्मान भीष्म साहनी जैसे दिग्गज साहित्यकारों ने की. दाहिया जी देश भर में रिमही बोली यहां की परंपरा, कलासंस्कृति के ध्वजवाहक बनकर उभरे. अपनी बोली परंपरा व संस्कृति पर न्योछावर हो जाने वाले दाहिया जी को मैंने जब आचार्य कहना शुरू किया तो दाहिया जी ने कहा..या पोरफेसर से ज्यादा नीक लागत है.

वे जल्दी ही लोककला और देसज संस्कृति के अध्येता बन गए. इसका कारण बने डा.कपिल तिवारी. तिवारी जी तब मध्यप्रदेश आदिवासी लोककला परिषद के सचिव थे. कपिल जी कितने बड़े पारखी थे आप इसी से अंदाजा लगा सकते हैं कि तीजनबाई, जनगड सिंह श्याम, प्रहलाद टिपण्या जैसे न जाने कितने कलाकार उन्हीं की खोज थे. कपिल जी के दौर में लोककला परिषद ने समूचे मध्यप्रदेश में ऐतिहासिक काम किया. मालवी-निमाड़ी, बुंदेली, छत्तीसगढ़ी, बस्तरी, गोंड़ी जितनी भी जनभाषाएं हैं उनके विभिन्न रूपों का दस्तावेजीकरण किया. रिमही जो आधिकारिक तौर पर बघेली के नाम से दर्ज है पर उतने काम नहीं हुए थे. कपिल जी को बाबूलाल दाहिया जैसा अध्येता मिल गया. लोकभाषा परिषद ने दाहिया जी के काम को सम्मान दिया. कहावतों, उख्खानों, किस्सागोई, लोकगीतों की आधा दर्जन से ज्यादा अनुषांगिक पुस्तकें छापीं जो आज एक धरोहर है.

बीजों के बचाने के आंदोलन में  दाहिया जी कैसे कूद पड़े इसका भी किस्सा दिलचस्प है. सदाशयी दाहिया जी कहते हैं ..कि याके पीछे कहौं न कहौं अपनउ(यानी कि मैं) हूँ. बात दरअसल यह थी कि दाहिया जी देशबन्धु में रिमही बोली में एक स्तंभ लिखते थे..का कही का न कही... मुझे सतना से एक अखबार के संपादन का काम मिला तो लेखकों के एक पैनल में दाहिया जी को भी रखा. उनसे आग्रह किया कि आप लोकवृक्षों व लोकअन्नों पर लिखें. जनजीवन का जितना भी साहित्य है वह सब इसी से जुड़ा है. दाहिया जी ने लिखना शुरू किया. उन्होंने लोकअन्नों में कौदौ को पकड़ा. अब कोदौ से जुड़े हुए इतने किस्से, इतनी कहावतें हैं कि दाहिया जी इन्हीं की खोज में पिल पड़े. कोदौ से धान में पहुँचे फिर विश्वामित्री अन्नों जिन्हें हम मोटिया अनाज कहते हैं को अपने अध्ययन का विषय बना लिया. 

विश्वामित्री अन्नों के बारे में मुझे दाहिया जी ने ही वो आख्यान बताया. त्रिशंकु के लिए महर्षि विश्वामित्र ने जब नई सृष्टि रची तो उसके लिए अन्नों की भी खोज की ताकि इस नई दुनिया में रहने वाले लोगों का अपना अलग खानपान हो. बहरहाल, लोकमान्य तिलक के गीता रहस्य में भी एक प्रसंग आता है कि एक बार भीषण दुर्भिक्ष में उदर पोषण के लिए विश्वामित्र को स्वान का मांस खाना पड़ा. उस समय के भद्रलोक ने जब विश्वामित्र का उपहास उड़ाया और उनके ग्यान पर संदेह किया  तब विश्वामित्र ने अकालजयी अन्नों की खोज कर डाली. कौदौ अकालजयी अन्न है. 67 के अकाल में लोगों को कौदौ ने ही पार लगाया. कौदौ, काकुन, साँवा, कुटकी, ज्वार, बाजरा सभी अकालजयी अन्न हैं. इनकी पोषण क्षमता चमत्कारिक है. आज के न्यूट्रीशियन इन्हें ही डाइट के लिए मुफीद बना रहे हैं. गरीबों का अन्न अब अमीरों की थाल में सजने लगा. दाहिया जी ने समूचा देश घूमा और लोक अन्नों को लेकर अपनी समझ विकसित की.

बात अखबार में स्तंभ लेखन से उठी थी दाहिया जी उसके यथार्थ में उतर गए. वे बताते हैं कि जिन अन्नों के किस्सा, कहानी, कहावतें उख्खान उन्हें लिखने हैं जब वही लुप्त हो जाएंगे तो इस बुद्धविलास का मतलब ही क्या. इसलिए जरूरी है कि इन्हें सहेजा जाए.  देसी और पारंपरिक अन्नों के खिलाफ एक बड़ी साजिश चल रही है. आज खेती में प्रयोग आने वाले नब्बे फीसद बीजों का विदेशी पेटेंट है. बीजों को लेकर हमारे किसान गुलाम और परवश हैं. हमारे वैग्यानिकों ने कम पाप नहीं किया. क्या वो इतना नहीं समझते थे कि जिस जलवायु में अमेरिका में अन्न उपजते हैं वह जलवायु भारत में नहीं है. हमारे अपने देसी अन्नों के बीज हमारी जलवायु में सदियों से सर्वाइव कर रहे हैं. मोटिया अन्नों की लगभग हर प्रजाति को न तो अलग से सिंचाई चाहिए और न ही खाद व पेस्टीसाइड. दाहिया जी ने अपने गांव में यह प्रादर्श तैय्यार किया और वैग्यानिकों को इसे परखने की चुनौती दी. आज जैवविविधता, देसी अन्नों व पारंपरिक खेती के लिए दाहिया जी का गांव तीरथ बना हुआ है.


पद्मश्री बाबूलाल दाहिया 

खेती गुलामी की ओर कैसे धकेली जानी है बाबूलाल दाहिया ने इसे 1991 में ही भाँप लिया था जब नरसिंह राव के प्रधानमंत्रित्व काल में वित्तमंत्री डा. मनमोहन सिंह ने भारत को ग्लोबलाइजेशन में शामिल कर दिया. इसी दौर में डंकल प्रस्ताव आया था. डंकल प्रस्ताव यानी कि पेटेंट बीजों की तिजारत. सरकार इन पेटेंट बीजों से खेतों को पाट दिया..देसी अन्न बाहर होने लगे. दाहिया जी ने तभी एक कविता लिख मारी थी डंकल प्रस्तावों के दुष्परिणामों को लेकर. 1992-93 में लिखी इस कविता को आप भी बाँचिए और जानिए कि दाहिया जी खेती के भविष्य को लेकर कितने चिंतित और चौकस थे-

मनई सब पूछैं कि कइसा है डंकल
अंकल मनमोहन के जइसा है डंकल,
चरी हियन रुपिया उहन गोबरकरी डालर
सेंतिबरन अमरीकी भैंसा है डंकल,
विकसित कुछ देसनका सोने के खान भले
पर विकाससीलन का खोड़इसा है डंकल,
नेतन के बेसहूरी भारत के मजबूरी
हमही ता खोटहा हस पइसा है डंकल,

दाहिया जी सब काम एक साथ करते हैं. कविता.. लेख तबतक लफ्फाजी हैं जब तक कि वो यथार्थ में न उतरें. उनके काम को मान-सम्मान मिले इसकी उन्होंने कोई परवाह नहीं कि. पिछली प्रदेश सरकार का सम्मान यह कहते हुए उसी के मुँह में मार दिया था कि एक ओर किसान कष्ट में हैं. मेंडों फर सल्फास खाकर जान दे रहे हैं दूसरी ओर ये सम्मान हरगिज स्वीकार नहीं. पद्म सम्मान भी उनके लिए कोई तोप नहीं. पर यह एक नागरिक सम्मान है जो किसी बाबूलाल दाहिया को नहीं उस सामूहिक चेतना और संघर्ष को मिला है जिसके वे निमित्तमात्र हैं. 

दाहिया जी के तेवर वही हैं-
उंय भवनन चाकी परै,सड़कन ब्याढ़ सकाय,
हरियाली, पानी, हबा गें हमार जे खाय.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और टिप्पणीकार हैं)

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)

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