चुनावी डाटा का दुरुपयोग और स्वैच्छिक आचार संहिता

देश में करोड़ों लीटर शराब और नगदी की जब्ती हो रही है. बैनर और पोस्टर लगाने वालों पर एफआईआर की जा रही है तो फिर सोशल मीडिया के माध्यम से चुनावी अराजकता पर लगाम क्यों नहीं लग पा रही है?

चुनावी डाटा का दुरुपयोग और स्वैच्छिक आचार संहिता

स्वतन्त्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए पूरे देश में चुनाव आयोग की सर्वोच्चता है. आचार-संहिता की सख्ती का यह आलम है कि प्रधानमंत्री के भाषण को भी चुनाव आयोग के एनओसी की दरकार है. देश में करोड़ों लीटर शराब और नगदी की जब्ती हो रही है. बैनर और पोस्टर लगाने वालों पर एफआईआर की जा रही है तो फिर सोशल मीडिया के माध्यम से चुनावी अराजकता पर लगाम क्यों नहीं लग पा रही है? पिछले आम चुनावों में बड़े पैमाने पर सोशल मीडिया के इस्तेमाल के बावजूद अक्टूबर 2013 के दिशा-निर्देशों का सही अनुपालन नहीं हो पाया था. 6 साल बाद नियमों का विस्तार करके सख्त तरीके से लागू करने की बजाय चुनाव आयोग ने उन्हें वॉलेन्टरी कोड ऑफ इथिक्स यानि स्वैच्छिक आचार संहिता में बदल दिया. देश में आम जनता के लिए कानून का पालन करना जरूरी और मजबूरी है तो फिर सोशल मीडिया कम्पनियों के लिए स्वैच्छिक आचार संहिता क्यों?

दस्तावेज में सदस्यों के नाम और हस्ताक्षर नहीं
तीन पेज के स्वैच्छिक कोड का दस्तावेज चुनाव आयोग की वेबसाइट पर उपलब्ध है. देश में आम लोगों को बैंक और राशन के लिए केवाईसी जरूरी है, लेकिन इस कोड में IAMAI का नाम है, लेकिन संस्था का पता, ई-मेल समेत अन्य विवरण नहीं दिये गये. नैतिक सिद्धान्तों से भरपूर इस कोड में हस्ताक्षर करने वाले व्यक्ति का नाम और विवरण भी नहीं दिया गया. इस महत्वपूर्ण दस्तावेज में सोशल मीडिया कम्पनियों का नाम, विवरण और हस्ताक्षर भी नहीं हैं तो फिर यह नियमावली सोशल मीडिया कम्पनियों पर कैसे लागू होगी?

सोशल मीडिया कम्पनियों की भारत में जवाबदेही
स्वैच्छिक आचार संहिता के साथ चुनाव आयोग की वेबसाइट में बीस मार्च को जारी दो पेज का प्रेस नोट है, जिसमें आयोग और सोशल मीडिया कम्पनियों के अधिकारियों के चित्र भी हैं. सोशल मीडिया कम्पनियों की भारतीय टीम के अधिकारी हमेशा ही कानूनी जवाबदेही से बचते रहे हैं, जो लोग कानूनी तौर पर जवाबदेह नहीं हैं, उन लोगों के साथ चुनाव आयोग द्वारा स्वैच्छिक आचार संहिता जारी करने का क्या प्रशासनिक और कानूनी औचित्य है?

भारत में शिकायत अधिकारी की नियुक्ति
चुनाव आयोग ने इस प्रेस नोट के माध्यम से यह बताने की कोशिश की है कि अब सोशल मीडिया कम्पनियों द्वारा तीन घंटे के भीतर कार्रवाई की जा सकेगी. शेयरचैट जैसी कम्पनियों ने तो भारत में अपना शिकायत अधिकारी नियुक्त किया है. चुनाव आयोग ने Twitter में प्रसारित ट्वीट को हटाने के लिए दिल्ली स्थित महिला अधिकारी को निर्देश जारी किये. फेसबुक और वॉट्सअप के शिकायत अधिकारी अमेरिका में बैठे हैं और चुनावों के लिए फेसबुक ने सिंगापुर में अपनी विशेष टीम बनाई है. इन कम्पनियों के जवाबदेह अधिकारियों का प्रेस नोट में चित्र के साथ इनका विवरण चुनाव आयोग की वेबसाइट में आना चाहिए, जिससे जनता और चुनावी अधिकारी शिकायतों का त्वरित निस्तारण कर सकें.

इंस्टाग्राम और वॉट्सएप भी आचार संहिता में शामिल हों
अक्टूबर 2013 की चुनावी आचार संहिता के अनुसार प्रत्याशियों को फेसबुक, ऑर्कुट (गूगल) और Twitter इत्यादि के खातों का विवरण अपने चुनावी शपथ पत्र में देना था. 2019 के आम चुनावों में वॉट्सएप ग्रुप का बड़े पैमाने पर दुरुपयोग हो रहा है, तो फिर चुनावी शपथ-पत्र में उनका विवरण क्यों नहीं लिया जाता? थिंक टैंक सीएएससी के प्रतिवेदन के बाद आईटी मंत्रालय की संसदीय समिति ने इंस्टाग्राम और वॉट्सएप को तलब किया, तो फिर चुनाव आयोग की आचार संहिता में भी बदलाव क्यों नहीं हो रहा? मतदान के 48 घंटे पहले के साइलेंस पीरियड में चुनावी ग्रुपों को निलम्बित करने के लिए चुनाव आयोग द्वारा वॉट्सएप कम्पनी को जवाबदेह बनाने के लिए भी आचार संहिता में उल्लेख क्यों नहीं है?

सोशल मीडिया कम्पनियों द्वारा डाटा का चुनावों हेतु दुरुपयोग
अमेरिका सहित कई देशों में सोशल मीडिया ने चुनावों को प्रभावित किया. कैम्ब्रिज एनालिटिका के खुलासे से भारत के डाटा लीक का भी सबूत सामने आया. फेसबुक कम्पनी के पास इंस्टाग्राम और वॉट्सएप का भी स्वामित्व है और इन तीनों कम्पनियों के डाटा का परस्पर एकीकरण हो रहा है. भारत में परम्परागत चुनाव प्रणाली पर चुनाव आयोग की पैनी और सख्त नजर है तो फिर सोशल मीडिया कम्पनियों के डाटा व्यापार पर लगाम क्यों नहीं लगती? चुनाव आयोग इन सभी कम्पनियों से शपथ-पत्र मांगे, जिससे की भारत के डेटा का इन कम्पनियों द्वारा चुनावों हेतु व्यवसायिक इस्तेमाल नहीं किया जा सके. नानुकुर या शपथ-पत्र के उल्लंघन पर चुनाव आयोग द्वारा संविधान के अनुच्छेद-324 के तहत सोशल मीडिया कम्पनियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए, तभी यह नैतिक कोड सार्थक हो सकेगा.

(लेखक विराग गुप्‍ता सुप्रीम कोर्ट अधिवक्ता और संवैधानिक मामलों के विशेषज्ञ हैं. Election on the Roads पुस्‍तक के लेखक हैं.)

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)