संस्कृति-सभ्यता रटते तोते पानी नहीं बचा सकते
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संस्कृति-सभ्यता रटते तोते पानी नहीं बचा सकते

देश की राजधानी दिल्ली से महज़ 4-5 घंटे और 235 किलोमीटर की दूरी पर राजस्थान और हरियाणा की सीमा पर एक गांव है शेरडा. हनुमानगढ़ जिले की भादरा तहसील में आने वाली शेरडा पंचायत में तहसील के तीन गांव आते हैं. 

संस्कृति-सभ्यता रटते तोते पानी नहीं बचा सकते

एक आदमी था एक बार उसने तीन तोते पाले. बचपन से ही उनको शास्त्र, गणित, साइंस सब कुछ सिखाया, यहां तक कि राजनीति भी सिखाई. जब तोते बड़े हुए तो इन सब विषयों की चर्चा करने लगे. वे महापंडित हो गए थे. फिर एक दिन वो आदमी मर गया. उसके अंतिम संस्कार के बाद उसके करीबियों ने सोचा कि इन तोतों को कौन संभालेगा, काफी सोचने के बाद उन्होंने उसे छोड़ने का फैसला ले लिया. पहली बार पिंजड़े से बाहर निकले तोते उछल कूद कर पास के एक पार्क में घास पर बैठ गए और वहां पर ज़माने भर के शास्त्रों पर गहन चर्चा करने लगे. उसी पार्क में ऊपर एक पेड़ पर एक और जंगली तोता बैठा हुआ था, उसने उनसे पूछ लिया कि ‘भाई तुम लोग कौन हो आज तक तो कभी नज़र आए नहीं. तीनों तोतों ने एक सुर मे कहा कि ‘हम ज्ञानी है. हमे सब पता है ’.

जंगली तोता चुप होकर बैठ गया. तीनों तोतों ने भी उसको कोई भाव नहीं दिया. तभी ऊपर बैठे तोते की नज़र पास में ताक लगा कर बैठी हुई बिल्ली पर पड़ी. उसने ऊपर से ही बोला ‘भाई लोगो फटाफट उड़ जाओ मुसीबत करीब आ रही है.‘ नीचे बैठे तोतों ने पूछा ‘उड़ जाओ मतलब.‘ ऊपर बैठे तोते ने कहा कि ‘भाई उड़ जाओ मतलब उड़ जाओ, क्या तुमको पता नहीं है कि उड़ना क्या होता है.‘

तोतों ने कहा कि ‘क्यो नहीं पता हम अच्छी तरह से जानते हैं कि उड़ने का पूरा विज्ञान क्या है. यहां तक कि हमें ये भी पता है कि पहला हवाई जहाज कैसे उड़ा था.‘ ऊपर बैठे तोते ने कहा कि ‘भाई तुम लोगों को खुद उड़ना आता है या नहीं.‘ तोतों ने कहा कि ‘उड़ना क्या होता है ये हमें पता है लेकिन उड़ना आता है का क्या मतलब हुआ. बाकी हमें सब पता है.’ इतनी बातचीत के बीच बिल्ली करीब आ चुकी थी. 

भारत में भी ऐसे कई लोग हैं जो अपनी सभ्यता और संस्कृति के बारे में काफी कुछ जानने का दावा करते हैं. हमारी सभ्यता सबसे पुरानी, हमारी संस्कृति सबसे निराली, हमारा ज्ञान सबसे वैज्ञानिक, हमने सबसे पहले ये किया, हमने दुनिया को ये सिखाया जैसे जुमले भारत का वो बंदा भी देता हुआ जा सकता है जो सभ्यता-संस्कृति की शुरुआत षटकोण वाले ष से करते है. लेकिन संस्कृति और सभ्यता की दुहाई देने वालों ने ही इस देश की उन पुरानी परंपराओ को पूरी तरह से भुला दिया है जो उन्हें विरासत में मिली थी. पानी को लेकर भी हमारी यही मानसिकता रही जिसने आज देश को उस कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है जहां से वापस लौटना बेहद मुश्किल हो गया है. 

राजस्थान में एक वक्त पानी की बूंद बूंद बचाने की परंपरा रही है. यहीं से ढाब, जोहड़, बावली बनाने की परपंरा बाहर निकली. लेकिन अब घर में नल पहुंच जाने के बाद यही जोहड़ या तो गांवों के घरों से निकलने वाले गंदे पानी को समेटने वाले सीवरेज टैंक बन कर रह गए हैं या फिर उन पर कब्जा करके उनपर घर बना दिए गए हैं.

देश की राजधानी दिल्ली से महज़ 4-5 घंटे और 235 किलोमीटर की दूरी पर राजस्थान और हरियाणा की सीमा पर एक गांव है शेरडा.

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हनुमानगढ़ जिले की भादरा तहसील में आने वाली शेरडा पंचायत में तहसील के तीन गांव आते हैं. 2011 की  जनगणना के मुताबिक शेरडा की जनसंख्या करीब 4909 है, गांव के जानकार वर्तमान में गांव की जनसंख्या करीब 6000 के आसपास बताते हैं. शेरडा में अंदर घुसते ही पचास साल से ज्यादा पुरानी जल निकास व्यवस्था देखने को मिलती है जिसमें ऊंचाई पर बने हुए घरों के मुख्य दरवाजे से लगा हुआ एक पाइप घर के पानी को गलियों के बीचों बीच बनी नालियों से जोड़ता है.

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इन नालियों का सिरा पकड़ कर चलो तो वो आपको गांव के किनारे बने हुए ढाब तक पहुंचा देता है. गांव वाले आज भी इसे ढाब कहते हैं लेकिन दरअसल वो अब गांव का सीवरेज टैंक बन कर रह गया है जिसमें शायद गर्मियों में मवेशी भी मजबूरी में पानी पीते हो और जो मवेशी इस डिटरजेंट और तमाम प्रकार की गंदगी वाला पानी पी रहे है, उनकी सेहत का अंदाज़ा आसानी से लगाया जा सकता है.

गांव के सरपंच रामचंद्र पचार के घर के पास अब नालियां किनारे पर बन गई है और उनके मुताबिक कुछ दिनों में सारे घरों के किनारे नालियां किनारे पर बना दी जाएंगी. फिर घरों की गंदगी किनारे-किनारे चल कर उस ढाब तक जाएगी जिसे कभी इस गांव के बुजुर्गों ने इसलिए बनाया था ताकि गांव के लोगो को उस वक्त इस्तेमाल के लिए पानी मिल सके जब सूरज अपने चरम पर हो. 

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अगर गांव में सोख्ता गड्ढे बना लिए जाएं तो इससे न सिर्फ उससे लगे हुए तालाब का पानी साफ बना रहेगा बल्कि भूमिगत जल का स्तर भी सुधरेगा. हालांकि इस इलाके में भूमिगत जल का ज्यादा इस्तेमाल किया नही जाता है क्योंकि ये पानी बेहद खारा है. खास बात ये है कि इलाके में रहने वाले युवाओं को तो नहीं लेकिन कुछ बुजुर्गों को सोख्ता गड्ढे के बारे मे जानकारी है. लेकिन अपने घर के सामने तीन फिट गहरे गड्ढे को खोदने को लेकर भी वो किसी सरकारी रहम की उम्मीद में बैठे हुए है जो गांव की पानी के प्रति जागरुकता और गंभीरता को दर्शाता है. 

अब जबसे गांव में घर घर नल की व्यवस्था हुई है तब से पानी को लेकर गंभीरता का अभाव और गहराने लगा है. पास से गुजरने वाली नहर से आने वाले पीने के पानी की व्यवस्था भी खासी रोचक है. सरकारी व्यवस्था के तहत गांव के पास पहले से बने एक सरोवर तक पानी ला दिया गया है. यहां से हर घर तक पानी पहुंचाने की व्यवस्था गांव वालों को खुद करनी है. 

खास बात ये है कि ये सरोवर भी 1974 में भयंकर सूखा पड़ने पर गांव वालों की मदद के लिए बनाया गया था, 142 फीट लंबे और चौड़े इस आर्य सरोवर की गहराई करीब 21 फीट है जिसकी 69 लाख लीटर पानी की क्षमता है. 
सरोवर के पास ही एक बड़ी सी पानी की टंकी बनवा दी गई है, जिसमें सरोवर में आए हुए पानी को चढ़ाकर पूरे गांव में सप्लाई किया जाता है. रोजाना 45 मिनिट के लिए पानी की सप्लाई अलग अलग मोहल्ले में की जाती है. इस तरह से गर्मी के दिन में हर चौथे दिन और सामान्य दिनों में हर तीसरे दिन घरों को पानी मिलता है जिसे वो अपने घरो में बनाई हुई नाद में इकट्ठा करके रखते है.

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टंकी से घरों तक जो पाइपलाइन बिछी उसका खर्चा गांव के लोगों ने खुद ही वहन किया है, यही वजह है की गांव में थोड़ा ऊंचाई पर बसे हुए दलित परिवारों के घर तक पानी नहीं पहुंच पाता है क्योंकि वो पाइपलाइन के खर्चे को वहन करने में असमर्थ थे. पंचायतो को जब बजट सरकार देती है उसमें वो पक्के निर्माण में सबसे ज्यादा खर्च कर सकती है, इसलिए पाइपलाइन बिछाने के लिए गांव के लोगों को खुद की जेब से पैसा लगाना पड़ा यानि सरकार भी यही समझती है कि गांव के लोगों को सिर पर रखकर पानी ढोने में कोई परेशानी नहीं है.

गांव की कमेटी ने ही रोजाना पानी की आपूर्ति करने के लिए एक व्यक्ति को नियुक्त किया है. हर घर से महीने के दो सौ रुपए लिये जाते हैं जिससे उस व्यक्ति की तनख्वाह और बाकी के देखरेख के काम काज होते हैं.  

शेरडा की ही मुख्य सड़क के उस पार गांव के दूसरे हिस्से में लगभग दो सौ साल पुरानी जोहड़ है. इसके किनारे छोटे बड़े कुल मिलाकर करीब  5-6 कुएं है. इस जोहड़ का निर्माण बताता है कि इसे बनाने वाले पानी के संरक्षण को लेकर किस कदर गभीर रहें होंगे और उनमें कितनी दूरदर्शिता रही होगी. 

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जोहड़ का निर्माण इस तरह से किया गया है कि गांव ऊंचाई पर रहे और गांव के बीचोंबीच बने इस जोहड़ को चारों तरफ गांव में बने घरों की तरफ से ढाल दिया गया है जिससे बरसात के दिनो में बहने वाला पानी इधर-उधर ना जाकर जोहड़ में इकट्ठा होता था. इस तरह भूमिगत पानी के स्तर में तो बढोतरी होती ही थी, साथ ही गांव के लोगों के लिए साल भर पीने के पानी की  व्यवस्था हो जाती थी. यही नहीं पास में बने हुए कुएं भी जोहड़ के करीब होने की वजह से साल भर भरे रहते थे.

अब ये जोहड़ भी गांव का सीवरेज टैंक बन कर रह गई है. जिस ढाल को बरसात के पानी को लाने के लिए बनाया गया था उससे अब गांव में मौजूद घरों की गंदगी बह कर जोहड़ में जमा होती है. आलम ये है कि अच्छी क्षमता वाला ये जोहड़ बेकार पड़ा है और उससे लगे हुए कुएं जिनका उपयोग किया जा सकता था, वो अब कबूतर और दूसरे पक्षियों के घर बन कर रह गए हैं.

जोहड़ क्या होता है
जोहड़, बारिश के पानी के संरक्षण की एक परम्परागत संरचना होती है. राजस्थान के अलवर एवं भरतपुर जिलों में इसे ‘जोहड़’कहते हैं, वहीं बीकानेर, गंगानगर, बाड़मेर एवं जैसलमेर में इसे ‘सर’ कहा जाता है तो जोधपुर में इसे ‘नाड़ा’-‘नाड़ी’ के नाम से जानते हैं. वही भादरा तहसील के शेरडा में इसे जोड कहा जाता है.  पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के कई इलाकों में इसे ‘पोखर’ कहते हैं.

जोहड़ धीरे-धीरे ही सही लेकिन असरदार होते हैं. इन्हीं से हमारी पेयजल पूर्ति होती थी और 1950 में भारत में कुल सिंचित क्षेत्र की 17 प्रतिशत सिंचाई भी जोहड़ से की जाती थी. 1950 से पहले तो जोहड़ ही सिंचाई का अहम साधन हुआ करते थे. जोहड़ भारत के हर कोने में पाए जाते रहे हैं.

अकेले शेरडा गांव में पक्के कच्चे मिलाकर करीब छह जीवित जोहड़ मौजूद है. इसके अलावा कुछ जगह इन पर कब्जा हो चुका है और कहीं पर ये पूर दिए गए हैं. आज नलों में 45 मिनिट तक आ रहे पानी से गुज़ारा करने वाले गांव के लोगों ने अपनी परंपराओं को पूरी तरह से भुला दिया है. सरकार को दोष देने वाले ग्रामीणों में पानी को लेकर वो चेतना ही नहीं नजर आती है. नई पीढ़ी ज्यादातर गांव छोड़ चुकी है जो लोग गांव में टिके हुए हैं वो जैसे तैसे जिंदगी गुजार रहे हैं. उन्हें किसी ने बताया भी नहीं और खुद भी वो पानी को लेकर अशिक्षित हैं. उसी का नतीजा है कि गांव में पड़ी धरोहर गटर बन चुकी है और लोगों के पास पीने का पानी भी सीमित है.  पास से गुजरने वाली नहर के पानी के गांव तक आने की बाट जोहते गांववालों में इच्छाशक्ति की बेहद कमी नज़र आती है या यूं कहिए कि उन्हें इस बात की परवाह ही नहीं है. राजनीति पर गंभीर राय रखने वाले गांव के युवा और बुजुर्ग दोनों ही उन तोंतो के समान बंजर पडी ज़मीन पर अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा करते नजर आते हैं. जिन्हें इस बात का अहसास तक नहीं है कि पानी का संकट ताक में खड़ा हुआ है और कभी भी झपट्टा मार सकता है. 

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार और WaterAid India 'WASH Matters 2018' के फैलो हैं)

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)

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