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बाल गृहों का लैंगिक यातना गृहों में तब्दील हो जाना

कुछ महीनों पहले मुज्ज़फरनगर से लेकर देवरिया होते हुए जम्मू के कठुआ तक ऐसे दर्जनों मामले सामने आ चुके हैं, जिन्होंने साबित किया है कि किशोर न्याय अधिनियम के तहत संचालित होने वाले बाल संरक्षण गृहों में भी बच्चे सुरक्षित नहीं हैं.

बाल गृहों का लैंगिक यातना गृहों में तब्दील हो जाना

यह सवाल नहीं, निष्कर्ष है कि समीक्षा, निगरानी, संसाधनों और संवेदनशीलता के अभाव के चलते बाल संरक्षण गृह अब बाल लैंगिक यातना गृहों में तब्दील हो रहे हैं. मध्यप्रदेश में जनवरी 2018 से जनवरी 2019 के बीच बच्चों के संरक्षण और सुरक्षा के लिए संचालित होने वाले 7 संस्थानों में बच्चों के ही शोषण, बलात्कार और हिंसा के मामले सामने आ चुके हैं. सबसे ताज़ा मामला रतलाम जिले के जावरा में कुंदन कुटीर बालिका गृह में बच्चियों के साथ हिंसा और यौन उत्पीडन हुआ है. उल्लेखनीय है कि इस मामले में रतलाम बाल कल्याण समिति की अध्यक्ष की ही केन्द्रीय भूमिका रही है. इस गृह में 30 लड़कियां रहती थीं. इसके पहले शिवपुरी में शकुंतला परमार्थ समिति की संचालक के शिक्षित पिता संस्था द्वारा संचालित अनाथ आश्रम में रहने वाली बच्चियों का शोषण करते थे.

कुछ महीनों पहले मुज्ज़फरनगर से लेकर देवरिया होते हुए जम्मू के कठुआ तक ऐसे दर्जनों मामले सामने आ चुके हैं, जिन्होंने साबित किया है कि किशोर न्याय अधिनियम के तहत संचालित होने वाले बाल संरक्षण गृहों में भी बच्चे सुरक्षित नहीं हैं. वहां उनका विविध प्रकार का शोषण होता है. इस तारतम्य में उच्चतम न्यायलय ने भी कई गंभीर वक्तव्य दिए, जो अखबारों की सुर्खियाँ बने. पिछले 2-3 सालों के अनुभव के आधार पर क्या यह माना नहीं जा सकता है कि हमारा समाज आज बच्चों के साथ यौन दासों सरीखा बर्ताव कर रहा है. वर्ष 2001 से 2016 के बीच बच्चों के लैंगिक शोषण और बलात्कार के प्रकरणों की संख्या 2113 से बढ़कर 36022 हो गयी, यानी 1705 प्रतिशत की वृद्धि. सरकार को इसे अपने जीडीपी विकास दर में जोड़ लेना चाहिए!

बच्चों के साथ शोषण और उत्पीडन के मामलों के वर्गीकरण और आधिकारिक आंकड़ों से पता चलता है कि बच्चों के साथ ऐसा करने वालों में अपरिचित या अज्ञात व्यक्ति नहीं होते हैं; 95 फीसदी मामलों में परिवार के ही सदस्य, पडौसी और परिवार के जानकार को बच्चों के शोषण में मुख्य पात्र पाया गया है. 

प्रधानमन्त्री से लेकर मुख्यमंत्री तक बहुत कोशिश कर रहे हैं कि आर्थिक विकास के लिए निवेश आये. इसके लिए वे धरती की परिक्रमा कर रहे हैं. दुनिया को विश्वास दिलाने की कोशिश कर रहे हैं कि आईये, मध्यप्रदेश आईये और यहाँ निवेश कीजिये.

क्या आपको पता नहीं है कि आदिवासी छात्रावास में रहने वाले बच्चों को 5 डिग्री के तापमान में ओढने के लिए फटा हुआ पतला कम्बल मिलता है? क्या आपको पता नहीं है कि बालिका गृह और संरक्षण गृहों में बच्चियों को आंतरिक वस्त्र और सेनेटरी नेपकिन नहीं मिलते हैं? क्या आपको पता नहीं है कि बाल संरक्षण गृहों, विकलांग छात्रावास और ऐसे संस्थानों में दीवालें सीलन से भरी और शौचालय बिना सफाई के होते हैं क्योंकि एक बच्चे के लिए 2000 रुपए का आवंटन होता है, जिसमें से 1000 रुपए सेवादारों के खाते में चले जाते हैं. बाल संरक्षण गृहों और अनाथ आश्रम से संचालन के तरीकों से ही समाज और सरकार उन्हें यह अहसास करवाती है कि वे वंचित हैं, उनके कोई अधिकार नहीं हैं, उनकी उपयोगिता उनकी शोषण में है. वस्तुतः समाज और सरकार दोनों मिलकर वंचित बच्चों का दोहरा शोषण करते हैं और जीवन के हर पल में उन बच्चों के गरिमा, शोषण से मुक्ति, स्वतंत्रता और जीवन जीने के अधिकार का हनन किया जाता है.

सामाजिक अंकेक्षण गया भाड़ में
बिहार में बाल संरक्षण गृह में हुए बच्चों के शोषण के भयावह मामले सामने आने के बाद उच्चतम न्यायलय ने स्पष्ट निर्देश दिए थे कि देश में बच्चों के संरक्षण और सुरक्षा के लिए संचालित हो रहे सभी गृहों और संस्थानों का सामाजिक अंकेक्षण किया जाए. इस पर महिला और बाल विकास मंत्रालय ने कुछ प्रारूप भी बना लिए और अदालत को दिखा दिए. बात ख़तम सी हो गयी. हमारे नीति निर्माता और अदालतें भी यह मानती हैं कि यौन शोषण का घाव बस शरीर पर पड़ता है और कुछ दिनों में भर भी जाता है. सरकारें कुछ दिन अपने अधिकारियों को इधर-उधर दौडाती हैं, कुछ लोगों को नोटिस देती हैं. 100 में से 30 आरोपियों को अपराधी साबित करवा पाती हैं और फिर अपनी आरामगाह में चली जाती हैं.

कम से कम मध्यप्रदेश में तो बाल संरक्षण गृहों का सामाजिक अंकेक्षण करने की प्रक्रिया शुरू नहीं हुई. जब मामला बहुत चर्चा में था, तब औपचारिकता के लिए एक निरीक्षण का आदेश जरूर जारी कर दिया गया था, यह निरीक्षण भी सरकार के अधिकारियों और नुमायिन्दों के द्वारा की करना तय किया गया था. मंशा साफ़ थी कि बाल संरक्षण गृहों में जो कुछ भी घट रहा है, वह सामने न आने पाए. यह तय है कि किशोर न्याय अधिनियम के तहत संचालित होने वाले गृहों में घट रही घटनाओं और बच्चों के शोषण के बारे में जिम्मेदार अधिकारियों को पूरा अहसास रहता है. उन्हें पता है कि संरक्षण की आड़ में शोषण हो रहा है, परन्तु राजनीतिक और सामाजिक प्रभावशाली लोगों और समूहों के दखल और रूचि के कारण कार्यवाही नहीं होती है. चूंकि पिछले 5 सालों से सरकारें स्वैच्छिक संस्थाओं को अपना दुश्मन मानने लगी हैं, इसलिए उन्हें इस बात से बहुत तकलीफ है कि सामाजिक संपरीक्षा में ऐसी लोगों और संस्थाओं को जोड़ना होगा, जो सरकारी न हो या क्रियान्वयन में शामिल न हों. ऐसे में वे भरसक कोशिश कर रही हैं कि किसी भी योजना, कार्यक्रम या संस्थान में सामाजिक अंकेक्षण न करना पड़े.

जो बच्चे संरक्षण और सुरक्षा से वंचित हैं, उनके लिए समाज भी संस्थाएं संचालित करता है. कहा जाता है कि अनाथ बच्चों और सुरक्षा से वंचित बच्चों बच्चों के जीवन को बेहतर करने के लिए समाज संवेदनाओं के साथ अपनी भूमिका निभाता है; दिक्कत यह है कि पुण्याई और भलाई के काम को पवित्रता का तमगा लगाकर निगरानी से बाहर मान लिया गया है, जिससे कई अनाथ आश्रम या छात्रावास संचालन करने वाले धार्मिक-सामाजिक समूहों को यह लगने लगा कि उन्हें अनाथों-विकलांगों के शोषण का अधिकार भी प्राप्त है. जरूरी नहीं कि हर संस्थान की निगरानी या जांच सरकार ही करे, पर यह सच है कि समाज ने खुद भी उन संस्थानों को जांच-निगरानी में नहीं रखा, जहाँ वंचित-उपेक्षित बच्चे संरक्षण पाने के लिए जाते हैं. बाबा-बहरुपिये एक ख़ास आवरण ओढ़कर बच्चों का शोषण करने लगते हैं. 

उच्चतम न्यायालय और किशोर न्याय अधिनियम दोनों का कहना है कि बच्चों के संरक्षण के लिए बनाये गए हर गृह का वैधानिक पंजीयन होना चाहिए और हर संस्थान को व्यवस्थागत निगरानी के दायरे में रखा जाना चाहिए; इसके बावजूद भी मध्यप्रदेश में संचालित होने वाले अनाथ आश्रम, धार्मिक समूहों द्वारा संचालित होने वाले ऐसे छात्रावास, जहाँ गरीब बच्चे या अनाथ बच्चे रहते हैं, सरीखे संस्थान वैधानिक व्यवस्था की निगरानी में नहीं है. ऐसे ज्यादातर संस्थान समाज कल्याण विभाग के तहत दर्ज होते हैं, किन्तु किसी तरह की निगरानी या समीक्षा से बाहर हैं.    

वस्तुस्थिति
परन्तु क्या देश में बच्चों के विकास के लिए कोई निवेश हो रहा है? मध्यप्रदेश में संचालित हो रहे 24 गृहों के संचालन में प्रभावशाली राजनीतिक और सामाजिक नेताओं का निवेश है. राजनीतिक-आर्थिक हितों को साधने के लिए बच्चों का इस्तेमाल किया जाता है. मामला बच्चों का नहीं, सत्ता का लाभ पाने के लिए बच्चों की उपयोगिता का है. भारत में 7189 बाल संरक्षण संस्थान/गृह सक्रिय हैं, जिनमें से 5850 पंजीकृत हैं और 1339 पंजीकृत नहीं हैं. इन संस्थानों में 232936 बच्चे रहते हैं. उच्चतम न्यायलय में दाखिल अध्ययन रिपोर्ट के मुताबिक 2874 बाल गृहों में से केवल 54 को ही सकारात्मक अंक मिले हैं. रिपोर्ट में जिन 185 गृहों का अंकेक्षण किया गया, उनमें से केवल 19 में ही वहां रहने वाले बच्चों से सम्बंधित जानकारियाँ और रिकार्ड उपलब्ध था. क्या यह निष्कर्ष निकला जा सकता है कि बाल संरक्षण गृह प्रताड़ना-शोषण गृह में तब्दील हो चुके हैं और निगरानी से बाहर हैं?

वर्ष 2018-19 में भारत के सरकार ने समेकित बाल विकास योजना (आईसीपीएस) के लिए कुल 775 करोड़ रुपए का आवंटन किया था. इस बजट में शिक्षण-प्रशिक्षण-निगरानी-प्रचार-जागरूकता-अध्ययन-यात्रा-वेतन सबकुछ शामिल है. थोडा सा गणित लगाए तो सरकार का अमानवीय चेहरा सामने आ जाता है. यदि इस बजट को पूरा उन 232936 बच्चों के लिए खर्च किया जाता, जो बाल गृहों में रह रहे हैं, तब एक बच्चे के लिए 85 रुपए प्रतिदिन का बजट मिलता.

वर्ष 2019-20 के अंतरिम बजट में भारत का कुल बजट 27.84 लाख करोड़ रुपए है, जिसमें से बच्चों के लिए 90594.25 करोड़ रुपए दिए गए हैं. इस वक्त भारत में बच्चों की संख्या 54 करोड़ के मान से एक बच्चे की शिक्षा, स्वस्थ्य, सुरक्षा, विकास, सहभागिता के लिए 1677 रुपए सालाना यानी 4.60 रुपए प्रतिदिन के बराबर बजट का आवंटन किया है. यह महज़ नीतिगत अपराध नहीं, राज्य व्यवस्था की अनैतिकता का परिचायक है. 

मानसिक स्वास्थ्य का प्रत्यक्ष रिश्ता बच्चों के साथ किये जाने वाले व्यवहार से है, परन्तु भारत की मौजूदा नीतियों का मानसिक स्वास्थ्य से भी गहरा बैर-भाव है. वर्तमान स्थिति में भारत को 13500 मनोचिकित्सकों की जरूरत है, पर उपलब्ध हैं कुल 3827; हमें क्लीनिकल मनोवैज्ञानिक चाहिए 20250, पर उपलब्ध हैं 895; भारत को 37000 मनोचिकित्सक सामाजिक कार्यकर्ता चाहिए, पर उपलब्ध हैं केवल 850. ऐसी स्थिति में हमारे स्कूलों, बाल कल्याण संस्थाओं, संरक्षण गृहों में मनोवैज्ञानिक परामर्शदाता उपलब्ध ही नहीं है. भारत को आज 3000 मनोचिकित्सा नर्सों की जरूरत है, पर देश में 1500 ही उपलब्ध हैं.

व्यवस्थाओं के साथ खिलवाड़
किशोर न्याय अधिनियम के तहत हर जिले में बाल कल्याण समिति का गठन किया जाता है. यह समिति बच्चों के शोषण और उत्पीडन के मामलों का संज्ञान लेती है और उसकी निर्णायक भूमिका होती है कि बच्चे का हित किस निर्णय में होगा? यही समिति बाल गृहों के निरीक्षण के लिए भी अधिकार संपन्न है; फिर जावरा का मामला कैसे छिपा रहा? यह छिपा रहा क्योकि जिन्हें निरीक्षण करना है, निगरानी करना है, वे ही गृह का संचालन भी कर रहे हैं. यह छोटी सी बात सरकार को समझ नहीं आई कि वह “हितों के टकराव” से सम्बंधित पहलू पर नज़र रखे और सुनिश्चित करे कि क्रियान्वयन और निगरानी के बीच कोई नाजायज़ रिश्ता नहीं होना चाहिए.

शिवपुरी से लेकर जावरा तक, यह बात साफ़ है कि बाल-बालिका संरक्षण गृहों में बच्चों-बच्चियों को गुलाम और यौन दासों की तरह इस्तेमाल किया जाता रहा है. जब बच्चे किसी भी तरह का प्रतिकार करते, तो उनके साथ शारीरिक प्रताड़ना का व्यवहार किया जाता था. बात साफ़ है कि बच्चे चुप नहीं थे, वे प्रतिकार करते थे, इसीलिए उन्हें डंडों से मारा जाता था. अगर सरकार सच में इन संस्थानों के सामाजिक अंकेक्षण की व्यवस्था को ईमानदारी से लागू करती, तो शोषण का सच समय रहते ही सामने आ जाता. परन्तु सरकार ने ऐसा नहीं किया; इस तरह सरकार बच्चों के संरक्षित शोषण में मुख्य भागीदार है. जिस तरह से राजनीतिक दलों और उनके कार्यकर्ताओं का दखल स्थापित हुए है, उसमें चिंता को और बढ़ा दिया है.

जरा गौर से देखिये, जब बच्चे या बच्चियां शोषण से प्रताड़ित होकर गृह से भाग जाते हैं, तभी मामला सामने आता है. जब तक बच्चे गृह में हैं, तब तक समाज को पता नहीं कि उन गृहों की चार दीवारी के भीतर हो क्या रहा है? सामजिक अंकेक्षण भीतर के दृश्य को जिम्मेदारी के साथ सामने लाने का जरिया है. अब तक मध्यप्रदेश सरकार ने भी निरीक्षण के नाम पर जो पहल की है, उसमें सरकार का वह नुमायिन्दा निरीक्षण के लिए जाता है, जिसे यह लगता है कि यदि मैंने सच कहा तो मेरी नौकरी असुरक्षित हो जायेगी; अतः सरकार केवल ऐसी जानकारियाँ इकठ्ठा करती है, जिनसे सरकार के नुमायिंदे के सामने नैतिक संकट न खडा हो. गृह को पहले से पूरी सूचना देकर अफसरान निगरानी के लिए जाते हैं, उनके पास एक कागज़ होता है, जिसमें गृह में अलमारी, मेज़, बिजली, पंखों, गुसलखाने, शौचालय, पानी, गद्दे, रजाई, टीवी से सम्बंधित जानकारी इकठ्ठा की जाती है.

उसमें बच्चों से मनौवैज्ञानिक संवाद के लिए कोई स्थान नहीं होता है. बच्चों के मन में क्या घट रहा है? बच्चे भयाक्रांत कर देने वाले वातावरण में कैसे जीवन बिता रहे हैं? उनके मन और शरीर पर किस तरह से घाव दिए जा रहे हैं, इससे सम्बंधित सहभागी और विशेषज्ञ जांच की कोई पहल हमारी सरकार नहीं करती है. यह सवाल भी नहीं उठा अब तक कि हर गृह में बाल मनौविज्ञान को जानने वाला परामर्शदाता होना चहिये, वह कहाँ है? यदि है, तो उसने अपनी भूमिका निभाते हुए क्या पाया?

मुझे यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि कई संरक्षण गृहों में बच्चों के साथ बर्बर व्यवहार होता है और यह व्यवहार हमारे राज्य और समाज को दागदार न बना दे, इसके लिए सच को छिपाने की भरसक प्रयत्न किये जाते हैं. सच को छिपाने में मीडिया, सामाजिक संस्थाएं, धार्मिक संस्थाएं, न्याय व्यवस्था और सरकार साझेदार हैं.

हमारे राजनीतिक दल हर उस पद और संस्थान पर काबिज़ हो जाना चाहते हैं, जिनके पास थोड़े भी अधिकार हैं. बाल कल्याण समिति का अध्यक्ष और इसके सदस्यों को यह अधिकार है कि वे पुलिस से सीधे बात करके उन्हें निर्देश दे सकते हैं और उन्हें मजिस्ट्रेट के अधिकार होते हैं. राजनीतिक दल के छुटभैय्ये नेताओं को यह अधिकारिता ललचाती है और वे अपने प्रभाव का उपयोग करके बाल कल्याण समिति में पदासीन हो जाते हैं. उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि किशोर न्याय अधिनियम के तहत यह एक संवेदनशील संस्था और भूमिका है? एक अध्ययन के मुताबिक मध्यप्रदेश के 17 जिलों की समितियों में वकालत कर रहे वकील काबिज़ हैं, जबकि नियमानुसार वे समिति में नहीं हो सकते है; संस्था चलाने वाले, राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता और कम शिक्षा प्राप्त व्यक्ति इन पदों पर हैं, जो नहीं हो सकते हैं. यही बात राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग और बाल संरक्षण समितियों की गठन और तौर तरीकों पर भी लागू होती है. 

सरकार निवेश चाहती है, क्या सरकार को यह पता नहीं है कि यदि बच्चों को शोषण से मुक्त नहीं किया गया, तो उनका निवेश न तो लीपने का होगा, न पोतने का. मध्यप्रदेश का सच यह है कि यहाँ की सरकार तीर्थयात्रा योजना के लिए 200 करोड़ रुपए का आवंटन करती है और बाल संरक्षण के लिए 95 करोड़ रुपए का. हम अक्सर यह कहते रहे हैं कि बच्चों के बारे में राजनीतिक दल और सरकारें सोचती नहीं है क्योंकि वे मतदाता नहीं होते हैं और चुनाव को प्रभावित नहीं करते हैं; परन्तु यह अधूरा सच है. बच्चों के बारे में इसलिए भी बात नहीं होती है क्योंकि शोषण के जरिये बच्चों का उपयोग राजनीतिक-सामाजिक व्यवस्था के कुछ प्रभावशाली लोगों अपने हित साधने और आनंद के लिए करते हैं. हमारे समाज में दान और पुण्य के काम को पवित्र मानते हुए इन पर सवाल न किये जाने की परंपरा है, किन्तु वक्त आ गया है कि दान और पुण्य के कामों की भी निगरानी हो, समीक्षा और सामाजिक संपरीक्षा हो.  सबसे पहली जरूरत यह तय करना भी है कि बाल संरक्षण के लिए हितों के टकराव और राजनीतिक दखल को ख़तम किया जाए. आखिर में बस इतनी सी बात कि हमें सरकार और समाज, दोनों पर संदेह है; यह उनकी जिम्मेदारी है कि हमारे संदेह को दूर करें.

(लेखक विकास संवाद के निदेशक, लेखक, शोधकर्ता और अशोका फेलो हैं.)

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)