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Sachin Kumar Jain

बाल गृहों का लैंगिक यातना गृहों में तब्दील हो जाना

बाल गृहों का लैंगिक यातना गृहों में तब्दील हो जाना

यह सवाल नहीं, निष्कर्ष है कि समीक्षा, निगरानी, संसाधनों और संवेदनशीलता के अभाव के चलते बाल संरक्षण गृह अब बाल लैंगिक यातना गृहों में तब्दील हो रहे हैं.

मध्यप्रदेशः स्थानीय निकायों की राजनीति महत्वहीन क्यों है?

मध्यप्रदेशः स्थानीय निकायों की राजनीति महत्वहीन क्यों है?

विधानसभा-लोकसभा चुनाव और उनके परिणाम सदैव चर्चा में रहते हैं.

बचपन उपेक्षित है और युवा महत्वपूर्ण!

बचपन उपेक्षित है और युवा महत्वपूर्ण!

जो अपने बचपन में छले गए हैं, वे आज युवा बन रहे हैं और युवाओं को यह समझाने की कोशिश हो रही है कि वे बहुत महत्वपूर्ण हैं. आप सबने भारत का संविधान पढ़ा होगा.

मध्य प्रदेश के चुनावी घोषणा पत्रों में बच्चे कहां हैं?

मध्य प्रदेश के चुनावी घोषणा पत्रों में बच्चे कहां हैं?

चुनाव आयोग ने अपने अवधारणा पत्र में लिखा है कि चुनाव का घोषणा पत्र व्यक्ति, समूह, राजनीतिक दल या सरकार द्वारा प्रकाशित एक ऐसा दस्तावेज होता है, जिसमें उनके मंतव्यों, सोच और विचारों की घोषणा होती है

घोषणापत्र को हाशिये पर डाल लोकतंत्र से मुंह मोड़तीं पार्टियां

घोषणापत्र को हाशिये पर डाल लोकतंत्र से मुंह मोड़तीं पार्टियां

देश की व्यवस्था और समाज का चरित्र बहुत हद तक इस बात से प्रभावित होता है कि किस तरह की राजनीतिक सोच व्यवस्था पर काबिज होती है.

21वीं सदी में भी कुपोषित बचपन से कुपोषित लोकतंत्र

21वीं सदी में भी कुपोषित बचपन से कुपोषित लोकतंत्र

21वीं सदी में जन्म लेने वाली पीड़ी वर्ष 2018-19 में पहली बार मतदान करेगी. आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक इस अवधि में अखिल भारतीय स्तर पर सवा पांच करोड़ बच्चे वयस्क होंगे.

21वीं सदी के पहले पूर्ण नागरिक

21वीं सदी के पहले पूर्ण नागरिक

वर्ष 2018 और वर्ष 2019 के बीच के 12 महीनों में भारत एक ऐसे मुहाने पर खड़ा जहां भारत की राजनीति की चारित्रिक परीक्षा होगी.

आदिवासी समाज के बिना पर्यावरण संरक्षण एक आत्मघाती सोच है...

आदिवासी समाज के बिना पर्यावरण संरक्षण एक आत्मघाती सोच है...

क्या समाज का बहिष्कार करके पर्यावरण और जैव विविधता का संरक्षण किया जा सकता है? यह असंभव है. हमें यह सवाल पूछना ही होगा कि भारत में वर्ष 1927 में भारतीय वन कानून बनाए जाने के पीछे मंशा क्या थी?

हम भीड़तंत्र की ओर बढ़ रहे हैं, खामोशी से नहीं, ढोल-नगाड़ों के साथ

हम भीड़तंत्र की ओर बढ़ रहे हैं, खामोशी से नहीं, ढोल-नगाड़ों के साथ

नफरत की शिक्षा, नफरत के रिश्ते, व्यापार में नफरत, कलाओं में नफरत, कलम में नफरत और व्यवहार में नफरत, सियासत की नफरत.

आरसीईपी - मुनाफे के व्यापार के सामने कहीं देश हार न जाए!

आरसीईपी - मुनाफे के व्यापार के सामने कहीं देश हार न जाए!

आसियान देशों समेत 16 देशों के बीच चल रही क्षेत्रीय आर्थिक साझेदारी (रीजनल काम्प्रीहेंसिव इकोनोमिक पार्टनरशिप-आरसीईपी) बातचीत के भारत पर गहरे असर होंगे.