अयोध्या पर पक्षकार बनकर मामले को तेजी से निपटा सकती है सरकार

पांच राज्यों में चुनावों के बाद शिवसेना द्वारा संसद में राम मंदिर का मुद्दा उठाये जाने से आम चुनावों के एजेंडे का आगाज़ हो गया.

अयोध्या पर पक्षकार बनकर मामले को तेजी से निपटा सकती है सरकार

पांच राज्यों में चुनावों के बाद शिव सेना द्वारा संसद में राम मंदिर का मुद्दा उठाये जाने से आम चुनावों के एजेंडे का आगाज़ हो गया है. संघ परिवार और संतों की धर्म संसद ने इस बारे में सरकार से कानून बनाने या अध्यादेश लाने की मांग की है. तो दूसरी ओर राकेश सिन्हा समेत कुछ और सांसदों ने निजी बिल लाने की मंशा जाहिर की है. नये साल की छुट्टियों के बाद इस मामले में सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा नई बेंच के गठन से मामला और जटिल हो सकता है. संत, सरकार, संसद और सुप्रीम कोर्ट की जद्दोजहद में फंसे राम मन्दिर के पेंच को कैसे सुलझाया जाए-

1993 के पुराने कानून के बाद कैसे बने नया कानून- अयोध्या में बाबरी ढांचा गिरने के बाद तत्कालीन  नरसिम्हा राव सरकार ने संसद में विशेष कानून पारित करके अयोध्या में 67 एकड़ भूमि का 1993 में अधिग्रहण कर लिया था. इस कानून में पुराने अध्यादेश की अनेक बातों का समावेश नहीं किया गया था, जिसमें विवादित स्थल पर अस्पताल जैसी सुविधाओं की बात कही गई थी. धारा 3 और 4 के अनेक प्रावधानों को रद्द करने के बावजूद सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की पीठ ने केन्द्र सरकार द्वारा किये गये अधिग्रहण को बहाल रखा था. उस वक्त केन्द्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि विवादित स्थल में प्रमाण मिलने पर अधिग्रहित भूमि को मन्दिर निर्माण हेतु सौंपा जा सकता है. 25 साल अब बाद पुराने कानून को रद्द किये बगैर, केन्द्र सरकार द्वारा नया कानून कैसे लाया जा सकता है?

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सुप्रीम कोर्ट में बेंच गठन का संकट- इलाहाबाद हाईकोर्ट में तीन जजों द्वारा 21 साल की लम्बी सुनवाई के बाद 8000 पेज के फैसले को सबसे लम्बा फैसला माना जा सकता है. इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में 8 साल से सिविल अपील लम्बित होने के बाद अब नई बेंच का गठन हो रहा है. भूमि का सिविल विवाद मानते हुए सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच द्वारा इस मामले की सुनवाई होगी. भूमि के विवाद में फैसला देने के लिए मन्दिर से संबंधित प्रमाणों पर भी विचार करना होगा. अयोध्या में जमीन अधिग्रहण के लिए संसद द्वारा बनाये गये कानून के मामले में 1994 में पांच जजों की संविधान पीठ ने फैसला दिया था. सवाल यह है कि मन्दिर से जुड़े इस मामले की तीन जजों की बेंच द्वारा सुनवाई कैसे होगी?

मन्दिर निर्माण के लिए केन्द्र सरकार राजाज्ञा जारी कर सकती है- सरकार, संसद और सुप्रीम कोर्ट के बीच शक्तियों के बंटवारे के लिए संविधान में व्यवस्था की गई है, जिसे केशवानन्द भारती मामले में 13 जजों की बेंच ने मान्यता दी है. इसके अनुसार अधिग्रहीत की गई भूमि को इस्तेमाल करने के लिए राज्य या केन्द्र सरकार को अधिकार है. सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या में भूमि अधिग्रहण के 1993 के कानून को बहाल रखा था. सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस मामले को सामान्य भूमि विवाद बताये जाने के बाद, केन्द्र सरकार धारा 6 के तहत अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए विवादित भूमि को मन्दिर निर्माण के लिए सौंप सकती है. सरकार द्वारा सौंपे गये स्थान पर सोमनाथ मन्दिर की तर्ज पर ट्रस्ट द्वारा राम मन्दिर के निर्माण की पहल किये जाने पर संविधान के धर्मनिरपेक्ष ढांचे को भी आंच नहीं आयेगी.

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सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दाखिल करे केन्द्र सरकार- इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा विवादित भूमि को तीन पक्षों रामलला, निर्मोही अखाड़ा और सुन्नी वक्फ बोर्ड में बांटने का आदेश दिया गया. डॉ0 सुब्रहमण्यम स्वामी द्वारा पक्षकार बनने की अर्जी भले ही खारिज हो गई हो पर पूजा के व्यक्तिगत अधिकार पर बहस जारी है. ऐसे अनेक व्यक्तियों द्वारा पक्षकार बनने का यह सिलसिला अन्तहीन है, तो फिर यह मामला कितनी पीढ़ियों तक और चलेगा? केन्द्र सरकार विवादित स्थल समेत 67 एकड़ भूमि की मालिक है, तो फिर सुप्रीम कोर्ट में पक्षकार क्यों नहीं बनती? सिविल और क्रिमिनल मामलों में 6  महीने के बाद स्टे खत्म होने का फैसला आने के बावजूद रामलला 26 सालों से टेन्ट के नीचे हैं. संसद द्वारा 1993 में पारित कानून के 10 साल बाद प्राचीन मन्दिर के पुरातात्विक साक्ष्य मिले हैं. इसके आधार पर केन्द्र सरकार द्वारा धारा-6 के तहत राजाज्ञा जारी करने के साथ सुप्रीम कोर्ट में अर्जी लगाकर इस विवाद का अन्त किया जा सकता है.

("Ayodhya's Ram Temple in Courts" के लेखक विराग गुप्ता सुप्रीम कोर्ट के वकील और संवैधानिक मामलों के जानकार हैं.)

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