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World water day 2019: रोटी के दाम चुकाती धरती

ये समझना बेहद ज़रूरी है कि धरती के नीचे मौजूद पानी उस टूथपेस्ट की तरह है जिसे जितनी तेजी से बाहर निकाला जा सकता है उतनी ही तेजी से अंदर नहीं डाला जा सकता है.

World water day 2019: रोटी के दाम चुकाती धरती

देश की एक नामी गिरामी आटा बेचने वाली कंपनी अपने विज्ञापन में एक खास बात जरूर बोलती है. ‘मध्यप्रदेश के चुनिंदा जगहों के गेंहू से बना हुआ शुद्ध फलाना आटा. ‘कंपनी इसे अपना यूनिक सेलिंग प्वाइंट यानि यूएसपी मानती है, इसका मतलब वह खास बात जो आपके उत्पाद की गुणवत्ता को ऊपर ला देती है. ये चुनिंदा जगह जिसका जिक्र इस विज्ञापन में होता है ये जगह सीहोर जिले के गांव है. इन्ही गांवों में से एक गांव है इछावर तहसील का दिवड़िया. दिवड़िया में हर गांव का बाशिंदा जानता है कि उसके यहां के गेंहू से कौन सी कंपनी आटा बनाती है और उसके यहां का गेंहू किस कदर प्रसिद्ध है. बाहर से आए हुए किसी व्यक्ति को गांव के लोग ये बात बताना कभी नहीं भूलते हैं.

गेंहू की वैसे तो कई किस्मे होती हैं लेकिन दो किस्मों को सर्वश्रेष्ठ की श्रेणी में रखा जाता है. ये किस्म है सरबती और लोकमन. इसमें सरबती गेंहू को आप बासमती चावल मान सकते हैं जो गेंहू की उत्कृष्ट किस्म है. अब जो उत्कृष्ट होता है उसके लालन पालन में उतना ही विशेष ध्यान देना पड़ता है. यही बात सरबती पर भी लागू  होती है. सरबती बाकि सारी किस्मों से कई गुना ज्यादा पानी पीता है. गांव के सभी लोग ये बात जानते हैं. लेकिन फिर भी वो सरबती ही उगाते हैं क्योंकि सरबती के दाम ज्यादा मिलते हैं. और ये दाम सिर्फ नामी गिरामी कंपनी नहीं चुका रही है ये दाम धरती के नीचे मौजूद पानी भी चुका रहा है. ये दाम गांव के रहने वालों के सूखते गले भी चुका रहे हैं. इछावर में आप यूं ही चलते चलते किसी भी बाशिंदे से पूछ लीजिए की उसके यहां मुख्य समस्या क्या है. वो इस चुनाव में कौन सी समस्या की तरफ ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं. आपको एक ही जवाब मिलेगा-पानी की समस्या.

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बरसों से भूमिगत जल के भरोसे रहने वाले गांव के लोग अब पानी को दूर से भर कर लाने, आठ से दस दिन पुराने पानी को पीने, हफ्तों-हफ्तों तक पानी के लिए इंतज़ार करने और टैंकर से पानी खरीदने को अपनी जिंदगी का हिस्सा मान चुके हैं. वो जानते हैं कि उनके यहां ऊगने वाला गेंहू उनकी ज़मीन के तले की तरावट को किस कदर सुखा रहा है लेकिन आप इसे उनकी मजबूरी कह सकते हैं या बाज़ार संचालित मानसिकता का उनपर हावी होना. ये भी कहा जा सकता है कि पानी की कमी से जूझते इन गांवो को फिर भी पानी की इस लगातार विकराल होती भयावह स्थिति और अपने भविष्य का अहसास ही नहीं हो पा रहा है.

ये सब बातें इसलिए क्योंकि अब वक्त रोटी बनाने के लिए आटा गूंथने में लगे पानी से ज्यादा रोटी को उगाने में लगे पानी के बारे में सोचने का आ गया है. वैसे तो हम जो पहनते हैं खाते है या कोई भी उत्पाद जो हम इस्तेमाल करते हैं वो बगैर पानी के उपयोग के बन ही नहीं सकता है. ये वो पानी है जिसका बहुतायत में इस्तेमाल होता है लेकिन ये इस्तेमाल क्योंकि प्रत्य़क्ष नहीं है इसलिए चर्चा में नहीं आता है. इसे वर्चुअल वॉटर यानि आभासी जल कहते हैं. 
अक्सर जब भी पानी बचाने की बात होती है तो तमाम संगठन से या आपके इर्द गिर्द भी आपको पानी कम बहाने, रोज़मर्रा मे इस्तेमाल होने वाले पानी के इस्तेमाल में किफायत बरतने जैसे सुझाव सुनने को मिलते हैं क्योंकि हमें इस बात का इल्म ही नहीं है कि उत्पाद निर्माण में पानी का इस्तेमाल करके हम किस तरह धरती के ऊपर और नीचे के जल को चूस चुके हैं.

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खास बात ये है कि इस काम में शामिल संपन्न राष्ट्र बड़ी ही चालाकी से अपने यहां के स्रोतों को बचाते हुए दूसरे देशों से हर सामान आयान करने लगे हैं यानि उनके शरीर में चढ़े हुए कपड़ों से लेकर उनके पेट में जाने वाले अनाज तक सब कुछ दूसरे देशों से आ रहा है.

संपन्न राष्ट्र के प्रतिव्यक्ति प्रति दिन पानी के भौतिक और आभासी जल के इस्तेमाल को देखें तो यूएसए में 7,800 लीटर प्रतिदिन प्रतिव्यक्ति  पानी इस्तेमाल होता है जिसमें से 20 फीसद पानी वो बाहर से निर्यात करते हैं, वहीं 3900 लीटर प्रतिदिन, प्रतिव्यक्ति इस्तेमाल करने वाले जर्मनी में 69 फीसद पानी बाहर से आता है, जापान में ये प्रतिशत 77 है तो यूके अपना महज 25 फीसद पानी ही इस्तेमाल में लाता है.

जो देश इसे निर्यात कर रहे हैं उन्हें लग रहा है कि आर्थिक समपन्नता ही सबसे बड़ी संपन्नता है वो प्राकृतिक संपन्नता को लगभग भुला चुके हैं उसका ही परिणाम है कि उनकी हिस्से की ज़मीन सूख रही है और लोगों के होंठ प्यासे होते जा रहे हैं.

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दरअसल इछावर जैसी जगह जो पानी की भीषण कमी को झेल रहे हैं वहां पर गेंहू के उत्पादन की बात ये दर्शाती है कि हम अभी भी पानी की कमी को लेकर कितने सचेत है. आज इस गांव की मुख्य फसल गेंहू और चना है. पहले गांव में मोटे अनाज की खेती का चलन था, ज्वार, बाजरा जैसे कम पानी में होने वाली खेती हुआ करती थी. लेकिन फिर बाज़ार में गेंहू की मांग और गेंहू की खपत के चलते 20 साल पहले से मोटे अनाज का उत्पादन पूरी तरह से खत्म हो गया, अब ले दे कर चना ही है जिसे उगाया जाता है. 

गांव के लोग जानते हैं कि गेंहू में पानी ज्यादा लगता है. लेकिन अब वो गेंहू पर इस कदर निर्भर हो गए हैं कि वो मोटा अनाज खाने तक की कल्पना नहीं कर पाते हैं. सुबह गांव के हर बाशिंदे की थाली में जो गेहू की रोटी होती है जिसे खाकर बच्चा स्कूल और मर्द अपने काम पर जाते हैं. इसी रोटी को खाकर ही औरतें खेतों में काम करती है. दोपहर के और रात के खाने में भी यही रोटी होती है. यही गेंहू देश की  नामी गिरामी कंपनी खरीदती है और इसका आटा बनाकर आकर्षक प्लास्टिक के बैग मे पैक करके दुनिया को खिलाती है.

हाल ही वर्चुअल वॉटर पर आई वॉटरएड की रिपोर्ट बताती है कि भारत में उगाई जाने  वाली मुख्य फसल पर जो पानी हम लगा रहे हैं वो भारत को किस कदर प्रभावित कर रहा है.

गेंहू — करीब 22 फीसदी भूमिगत जल की कमी इसके खाते में जाती है. इसका वैश्विक औसत वॉटर फुटप्रिंट  1,827 लीटर प्रति किलोग्राम है
धान- पूरी वैश्विक सिंचाई का 40 फीसद इसके खाते में आता है और 17 प्रतिशत वैश्विक भूमिगत जल इसमें लग जाता है, जिसका औसत वॉटर फुटप्रिंट 2,500 लीटर प्रति किलोग्राम है.

वहीं अगर कपास जैसी फसलों पर लगने वाला पानी को देखें तो स्थिति और बदतर हो जाती है. दरअसल, कपास भी बहुत पानी पीने वाली फसल है जिसमें भारी मात्रा मे ब्लू सिंचित जल लगता है(किसी भी चीज़ का वॉटर फुटप्रिंट तीन अलग-अलग प्रकार के पानी से बनता है. इस संदर्भ में ग्रीन वॉटर का मतलब मिट्टी की नमी है. ब्लू वॉटर वो जो सिंचाई में उपयोग किया जाता है और तालाब, नदी और भूमिगत जल स्रोतों से लिया जाता है. और ग्रे वॉटर वो प्रदूषित पानी है जो तमाम तरह के उत्पाद और सेवाओं के बनाए जाने से संबंधित है.

) जो सूखे वातावरण में लंबे समय तक नुकसान पहुंचा सकता है.  कज़ाकिस्तान और उज़्बेक़िस्तान में फैला हुआ अरल समंदर, कपास की खेती के लिए बड़े स्तर पर होने वाली सिंचाई की वजह से 1960 से अब तक 80 फीसद तक सिकुड़ चुका है. भारत में उगाये और उत्पादन किये जाने वाले कॉटन के कपड़े का वॉटर फुटप्रिंट 22,500 लीटर प्रति किलोग्राम है. पाकिस्तान में यह औसत 9,800 लीटर है और यूएसए में करीब 8,100 लीटर.

दरअसल ये बात इसलिए भी गंभीर हो जाती है क्योंकि निर्यात के लिए खाने और कपड़े के वॉटर फुटप्रिंट उन 400 करोड़ लोगों के लिए बहुत मायने रखते हैं जो भौतिक तौर पर पानी की कमी झेलते हैं. पानी के लिए इन लोगों का उन उद्योगों से आमना सामना है जो उस सामान को मुहैया करवाते हैं जिसे यूके में खऱीदा जाता है. भारत में 100 करोड़, 90 करोड़ चीन में और 14 करोड़ लोग बांग्लादेश में पूरे साल या कुछ वक्त के लिए भौतिक पानी का अभाव झेलते हैं. उसके बावजूद भारत में 2000 और 2010 के बीच में भूमिगत जल का दोहन 23 प्रतिशत तक बढ़ा है. और भारत भूमिगत जल का तीसरा सबसे बड़ा निर्यातक है यही नहीं भारत में भूमिगत जल का उपयोग सबसे ज्यादा मात्रा में किया जाता है जो दुनिया भर का कुल 24 प्रतिशत है.

भौतिक पानी का अभाव बदतर होता जा रहा है एक अनुमान के मुताबिक 2050 तक दुनियाभर में पानी के अभाव वाले इलाको में रहने वालों की संख्या बढ़कर 500 करोड़ तक पहुंच सकती है.

ये समझना बेहद ज़रूरी है कि धरती के नीचे मौजूद पानी उस टूथपेस्ट की तरह है जिसे जितनी तेजी से बाहर निकाला जा सकता है उतनी ही तेजी से अंदर नहीं डाला जा सकता है. तो जिस तरह से हम सोच समझकर पेस्ट की बोतल पर दबाव डालते हैं जिससे उतना ही पेस्ट निकले जितना हमारे दांतो के लिए ज़रूरी है तो पेस्ट चलता भी बहुत है और हमारी सेहत और मुस्कान दोनों बनी रहती है. हमें धरती के पानी के इस्तेमाल पर भी वैसा ही ध्यान देना होगा. 

देश का कानून बोलता है कि आपकी निजी जम़ीन पर भी  दो फीट नीचे तक ही आपका अधिकार होता है उसके बाद सारी संपत्ति राष्ट्र की है. लेकिन ये  बात पानी खींचने वालों पर लागू नहीं होती है. ऐसे में सख्त रवैया अपनाना बेहद ज़रूरी हो जाती है . और अगर तुरंत प्रभाव से ऐसा नहीं किया तो पहले तो पानी के अभाव में रोटी सख्त होगी और फिर धीरे धीरे वो गायब हो जाएगी क्योंकि धरती बहुत देर तक आपकी रोटी की कीमत नहीं चुका सकती है. 

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार और WaterAid India 'WASH Matters 2018' के फैलो हैं)

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)