close

खास खबरें सिर्फ आपके लिए...हम खासतौर से आपके लिए कुछ चुनिंदा खबरें लाए हैं. इन्हें सीधे अपने मेलबाक्स में प्राप्त करें.

ZEE जानकारी : UNSC ने की पुलवामा आतंकी हमले की निंदा

सबसे बड़ी बात ये है, कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने अपने बयान में आतंकवादी संगठन जैश-ए-मोहम्मद का नाम लिया है.

ZEE जानकारी : UNSC ने की पुलवामा आतंकी हमले की निंदा

United Nations Security Council ने भी अब पुलवामा हमले की कड़े शब्दों में निन्दा कर दी है. और सबसे बड़ी बात ये है, कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने अपने बयान में आतंकवादी संगठन जैश-ए-मोहम्मद का नाम लिया है. ये बहुत बड़ी ख़बर है. क्योंकि, इसी सुरक्षा परिषद के 5 स्थायी सदस्यों में से एक देश चीन भी है जिसने हमेशा जैश-ए-मोहम्मद के आतंकवादी, मसूद अज़हर का समर्थन किया है. 

भारत जब भी सुरक्षा परिषद में मसूद अज़हर पर प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव आगे बढ़ाता है... तो हर बार चीन रास्ते में आ जाता है और इस प्रस्ताव को Hold कर लेता है. इस बीच कई लोगों को ऐसा भी लग रहा है, कि मसूद अज़हर और पाकिस्तान के आतंकवादी चरित्र को लेकर चीन का हृदय परिवर्तन हो गया है, और वो इनके खिलाफ हो गया है. जबकि सच्चाई कुछ और है. 

ये बात सच है, कि सुरक्षा परिषद द्वारा जारी किए गए बयान में जैश-ए-मोहम्मद का नाम लिया गया है. और ये बात भी स्पष्ट रुप से लिखी गई है, कि जैश-ए-मोहम्मद ने इस आतंकवादी हमले की ज़िम्मेदारी ली है. लेकिन सुरक्षा परिषद के बयान में जैश का नाम आने के पीछे की एक बड़ी वजह भारत का कूटनीतिक युद्ध था. जो उसने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान के खिलाफ छेड़ा हुआ था.

भारत के प्रस्ताव के अनुसार ही सुरक्षा परिषद के बयान में जैश-ए-मोहम्मद का नाम लिया गया. और हमले में शामिल आतंकवादियों को सज़ा दिलाने की बात की गई. 

आसान भाषा में कहें, तो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव में जैश-ए-मोहम्मद का नाम और आतंकवादियों को सज़ा देने की अपील के लिए एक ख़ास तरह की भाषा प्रयोग की गई, जो भारत ने अपने सहयोगी देशों के माध्यम से प्रस्तावित की है.

और इसी के बाद इस प्रस्ताव को चीन सहित सुरक्षा परिषद के तमाम सदस्य देशों ने सर्वसम्मति से पारित किया.

दिलचस्प बात ये है, कि चीन इस बयान में जैश-ए-मोहम्मद का नाम शामिल नहीं करना चाहता था. और वो ये भी चाहता था, कि सुरक्षा परिषद के बयान में जम्मू-कश्मीर की जगह, India-administered Kashmir का प्रयोग किया जाए.

इसके अलावा चीन को सुरक्षा परिषद द्वारा जारी किए जाने वाले बयान के एक हिस्से पर भी आपत्ति थी. जिसमें लिखा गया था... Urging All States To Co-Operate Actively With The Government of India..

आतंकवाद के जिक्र को लेकर अकेले चीन के विरोध की वजह से पुलवामा हमले पर सुरक्षा परिषद के बयान में एक हफ्ते की देरी हुई.

पहले पुलवामा हमले पर सुरक्षा परिषद का बयान 15 फरवरी की शाम..यानी हमले के अगले ही दिन जारी होने वाला था.

लेकिन चीन लगातार समय बढ़वाता रहा. 

15 फरवरी को जब सुरक्षा परिषद के 14 सदस्य देश बयान जारी करनेवाले थे, तब चीन ने 18 फरवरी तक का समय मांगा. 

दो बार तो ऐसा भी हुआ, जब चीन ने बयान में कई बदलाव करने की मांग की, ताकि इस प्रक्रिया को टाला जा सके या इसमें देरी हो सके. 

बताया जा रहा है कि चीन, सुरक्षा परिषद के बयान की विषयवस्तु को कमज़ोर करना चाहता था.

दूसरी तरफ पाकिस्तान ने भी पूरी कोशिश की थी, कि ये बयान जारी ना हो पाए. संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान की स्थायी प्रतिनिधि मलीहा लोधी ने इस मामले में सुरक्षा परिषद के अध्यक्ष से भी मुलाकात की थी. लेकिन उनकी मंशा पूरी नहीं हो सकी.

क्योंकि, अमेरिका सहित सुरक्षा परिषद में भारत के दूसरे मित्र देशों ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी. ताकि इस मामले में परिषद के सभी सदस्यों की मंजूरी मिल सके. 

संयुक्त राष्ट्र का बयान पाकिस्तान के लिए एक बहुत बड़ा झटका, और भारत के लिए बहुत बड़ी जीत है. क्योंकि सुरक्षा परिषद ने भारत द्वारा प्रस्तावित भाषा में ही आतंकवाद की निंदा की है. हालांकि, बयान जारी होने के बाद भी चीन चालाकी दिखा रहा है. आज चीन की तरफ से एक और बयान जारी किया गया. जिसमें उसने कहा है, कि सुरक्षा परिषद के बयान में पाकिस्तान में मौजूद आतंकवादी संगठन का ज़िक्र 'General Terms' में किया गया है. और ये कोई फैसला नहीं है. ऐसी बातें कहना चीन के लिए नया नहीं है. क्योंकि, उसे All Weather Ally Of Pakistan कहा जाता है. लेकिन, पाकिस्तान और चीन की तमाम कोशिशों के बाद भी संयुक्त राष्ट्र, पूरी मज़बूती से भारत के साथ खड़ा है.

ये तो UNSC की बात हुई. अब FATF यानी Financial Action Task Force की बात करते हैं. 

पेरिस में हुई FATF की बैठक में भी पुलवामा हमले की कड़े शब्दों में निन्दा की गई है.

इसके अलावा पाकिस्तान को फटकार लगाते हुए कहा गया है, कि उसने Terror Funding रोकने को लेकर पर्याप्त कोशिशें नहीं कीं.

इस संस्था द्वारा जारी किए गए बयान में, अल-कायदा, जमात-उद-दावा, लश्कर-ए-तैय्यबा, जैश-ए-मोहम्मद और हक्कानी नेटवर्क तक का ज़िक्र किया गया है. और कहा गया है, कि पाकिस्तान ने इन सभी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की. 

FATF ने पाकिस्तान को कड़े शब्दों में चेतावनी दी है, कि पाकिस्तान..आतंकवादियों को मिलने वाली Funding को रोकने वाले Action Plan को मई 2019 तक पूरा कर ले. अन्यथा इसके गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं.

ये संस्था जून और अक्टूबर 2019 में एक बार फिर पाकिस्तान की समीक्षा करेगी. और अगर पाकिस्तान ने समय रहते कार्रवाई नहीं की, तो इस बात की संभावना काफी ज़्यादा है, कि FATF उसे Black List में डाल दे.

FATF एक ऐसा संगठन है, जो दुनिया में आतंक की Funding पर नज़र रखता है और उसे रोकने की कोशिश करता है. ये संस्था ऐसे देशों की लिस्ट तैयार करती है जो मनी लॉन्ड्रिंग और आतंकी फंडिंग पर लगाम लगाने में नाकाम रहते हैं.

पुलवामा हमले के बाद भारत की कोशिश ये थी, कि FATF, पाकिस्तान को 'Black List' में डाल दे. 

FATF ऐसे देशों की दो लिस्ट तैयार करता है. पहली लिस्ट Grey और दूसरी Black होती है. Grey लिस्ट में शामिल होने वाले देशों को अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं से आर्थिक मदद मिलने में मुश्किल होती है. 

जबकि, Black List में आने वाले देशों को आर्थिक सहायता मिलने का रास्ता पूरी तरह से बंद हो जाता है. इस List में आने के बाद संबंधित देश को IMF, World Bank, Asian Development Bank और European Union जैसे अंतर्राष्ट्रीय कर्ज़दाता Downgrade कर सकते हैं. 

पिछले वर्ष इस संगठन ने पाकिस्तान को Grey-List में डाल दिया था. और पेरिस में इस बार हुई बैठक में भी पाकिस्तान Grey List में है.))

आतंकवाद के मुद्दे पर दुनिया का हर देश, दुनिया की बड़ी से बड़ी संस्थाएं.. पाकिस्तान के पीछे हाथ धोकर पड़ चुकी हैं. और इसके परिणाम भी दिखाई देने लगे हैं. क्योंकि, FATF के डर की वजह से कल ही पाकिस्तान के गृह मंत्रालय ने आतंकवादी हाफिज़ सईद के संगठन जमात-उद-दावा और फलाह-ए-इंसानियत नामक संगठन पर प्रतिबंध लगा दिया गया था. और इसी के बाद हाफिज़ सईद ने भी एक बयान जारी कर दिया है. वैसे तो हम आतंकवादियों की बातों का प्रचार नहीं करते. लेकिन आज आपको हाफिज़ सईद की बातें ध्यान से सुननी चाहिए. क्योंकि, इस वीडियो में उसका डर साफ-साफ दिखाई दे रहा है. यहां पर सोचने वाली बात ये है, कि लोगों का खून बहाने वाला आतंकवादी...अगर United Nations में जाकर अपना केस लड़ने की बात कहने लगे...तो समझ लीजिए... कि भारत बिल्कुल सही दिशा में आगे बढ़ रहा है.

हाफिज़ सईद जिस डरी हुई और सहमी हुई आवाज़ में पाकिस्तान की हिफाज़त के लिए दुआएं मांग रहा है. अपने संगठन की सलामती के लिए मिन्नतें कर रहा है. आज बिल्कुल ऐसी ही भाषा और कुछ ऐसी ही Body Language, पाकिस्तान की सेना के प्रवक्ता मेजर जनरल आसिफ गफूर की भी थी. जब वो रावलपिंडी में Press Conference करने पहुंचे. उनके डर का आलम ऐसा है, कि आज उन्होंने ये तक कह दिया...कि भारत अगर चाहे, तो पाकिस्तान से दुश्मनी करे...पाकिस्तान की फौज से दुश्मनी करे...लेकिन इंसानियत से दुश्मनी ना करे. यहां सवाल ये है, कि जो देश आतंकवाद की भाषा समझता है...आतंकवादियों को मेहमान बनाकर रखता है, वो आज इंसानियत की बातें क्यों कर रहा है. अब आप एक-एक करके...मेजर जनरल आसिफ गफूर द्वारा फेंके गए झूठे मिसाइल्स को देखिए कीजिए. और पाकिस्तान की घबराहट का अंदाज़ा लगाइये.

ऐसा लगता है कि पाकिस्तान में कांग्रेस का चुनाव प्रचार शुरू हो गया है. और पाकिस्तान के लोग अब बेसब्री से कांग्रेस के चुनाव जीतने का इंतज़ार कर रहे हैं. ऐसा हम नहीं बल्कि खुद पाकिस्तान के मीडिया चैनल्स कह रहे हैं. पुलवामा हमले के बाद मीडिया चैनलों पर रोज़ घंटों तक चर्चाएं हो रही हैं. कोई डरा हुआ है, कोई सहमा हुआ है, तो कोई भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का मज़ाक उड़ा रहा है. लेकिन पाकिस्तान के बहुत से पत्रकारों ने ये भविष्यवाणी कर दी है कि भारत आने वाले चुनावों में नरेंद्र मोदी हारेंगे और कांग्रेस जीतेगी. 

पाकिस्तान के एंकर और वहां का मीडिया भले ही ऐसे भड़काऊ बयान दे रहा हो, लेकिन उनकी फौज को अपना मीडिया बहुत पाक साफ नज़र आता है. आज पाकिस्तान की सेना के प्रवक्ता मेजर जनरल आसिफ गफूर ने भारत के मीडिया की बुराई की और अपने मीडिया की तारीफ की. 

आज हमारे देश में पाकिस्तान के खिलाफ बहुत ज़्यादा क्रोध है . पुलवामा आतंकवादी हमले के बाद ये एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया है . लेकिन पाकिस्तान के खिलाफ क्रोध और राष्ट्रवादी भाव से कुछ डिज़ाइनर पत्रकार काफी परेशान और बेचैन नज़र आ रहे हैं . इन्हीं में से एक पत्रकार ने एक विवादित लेख लिखा है जो आजकल Social Media पर Trend कर रहा है . 

इस Article में पुलवामा में शहीद हुए जवानों को General Category, Muslim, OBC, SC और ST में बांट दिया गया है . 

इस लेख में ये कहा है कि पुलवामा आतंकवादी हमले में शहीद होने वाले 12.5 प्रतिशत जवान ऊंची जातियों के हैं और बाकी जवान दूसरी जातियों के हैं . Article में ये कहने की कोशिश की गई है कि ये राष्ट्रवाद शहरी मध्यम वर्ग द्वारा पैदा किया गया है जिसमें मुख्य भूमिका उच्च जातियों के लोगों की है . और इस राष्ट्रवाद का ख़ामियाज़ा दूसरी जातियों के लोगों को भुगतना पड़ रहा है . 

Article को लिखने वाले ने खुद बताया है कि उसने कुछ शहीदों की जातियों को Confirm करने के लिए शहीदों के परिवार में बात भी की है . ये बहुत शर्मनाक है . 

सेना को जाति और धर्म में बांटने की कोशिश करना सीधे-सीधे पाकिस्तान और ISI के एजेंडे को आगे बढ़ाने के बराबर है . आश्चर्य की बात ये है कि ये काम हमारे देश के ही पत्रकारों का एक वर्ग कर रहा है . 

बम कभी ये पूछकर नहीं फटता कि मरने वाले की जाति क्या है ? अगर पाकिस्तान का कोई आतंकवादी भारत में धमाका करता है तो पहले ये पता नहीं लगाता कि जहां धमाका करना है वहां सामान्य वर्ग के कितने लोग हैं ? कितने OBC हैं और कितने लोग SC-ST हैं ? लेकिन हमारे देश के डिज़ाइनर पत्रकार शहीद जवानों की जातियां ढूंढने में लगे हुए हैं . 

हम आज बहुत साफ-साफ कहना चाहते हैं कि इस तरह के जातिवादी पत्रकार... भारत में अलगाववादियों की मदद कर रहे हैं . ये लोग भारत की सेना को भी जातियों में तोड़ना चाहते हैं ताकि भारत की सुरक्षा व्यवस्था कमज़ोर हो जाए और इसका फायदा पाकिस्तान को मिले . 

इस मौके पर आज हम इतिहास की एक घटना का ज़िक्र करना चाहते हैं . वर्ष 1398 में तैमूर लंग नामक एक आक्रमणकारी ने भारत पर हमला किया . दिल्ली की सीमा पर पहुंचने तक तैमूर लंग की कैद में एक लाख हिंदू थे . तैमूर लंग ने दिल्ली पर हमला करने से पहले इन सभी एक लाख हिंदुओं का कत्ल करवा दिया गया . अब ज़रा सोचिए कि क्या तैमूर लंग के सिपाही कत्ल करते वक्त हिंदुओं की जाति पूछ रहे थे ? 

डिजाइनर पत्रकारों को इन ऐतिहासिक घटनाओं पर विचार करना चाहिए . इस तरह के जातिवादी मानसिकता वाले पत्रकारों पर देशद्रोह की धाराएं लगाकर, उन्हें गिरफ्तार किया जाना चाहिए . अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर देशद्रोही पत्रकारिता नहीं की जा सकती .

आप ये भी अनुमान लगा सकते हैं कि जब देश की सुरक्षा वाली खबर को इस जातिवादी मानसिकता के साथ लिखा जा सकता है . तो फिर सामान्य खबरों में इस तरह के पत्रकार जातिवादी Agenda की कितनी ज्यादा मिलावट करते होंगे ?