Bengal Election 2021: जानिए, मतुआ समाज की कहानी जिन्हें माना जाता है बंगाल में सत्ता की दूसरी चाभी

पश्चिम बंगाल में जिस मतुआ समाज ने 10 सालों से ममता दीदी का साथ दिया वो भी CAA के विरोध की वजह से उनसे दूर हो गया है.

Written by - Sandeep Singh | Last Updated : Mar 6, 2021, 03:22 PM IST
  • मतुआ समाज की राजनीतिक विरासत दशकों पुरानी है
  • मतुआ की अनदेखी ममता दीदी को भारी पड़ने वाली है
Bengal Election 2021: जानिए, मतुआ समाज की कहानी जिन्हें माना जाता है बंगाल में सत्ता की दूसरी चाभी

नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल में सत्ता की 2 चाभी है एक हुगली जिले में फुरफुरा शरीफ दरगाह तो दूसरी चाभी है नादिया जिले में मतुआ समाज. मतुआ समाज के पूज्य हरिचंद ठाकुर के वंशजों की राजनीतिक विरासत देखें तो पता चलता है कि पश्चिम बंगाल में मतुआ समाज सिर्फ पर्दे के पीछे से सियासत का रुख ही नहीं बदलता बल्कि सियासत का प्रतिनिधित्व भी करता है.

मतुआ समाज की राजनीतिक विरासत दशकों पुरानी है. मतुआ समाज सिर्फ सरकारें बनाता ही नहीं है बल्कि मतुआ समाज सरकार और सियासत में खासा दखल भी रखता है. ये समाज बंगाल की सियासत में अपने समाज की अगुवाई भी करता है. नॉर्थ 24 परगना जिले के ठाकुर परिवार का राजनीति से लंबा संबंध रहा है जिसकी शुरुआत हरिचंद ठाकुर के वंशजों ने की. हरिचंद ठाकुर के निधन के बाद उनके वंशजों ने मतुआ संप्रदाय की स्थापना की.

मतुआ समाज के 'भगवान' हैं हरिचंद ठाकुर

हरिचंद के प्रपौत्र प्रमथ रंजन ठाकुर 1962 में कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में पश्चिम बंगाल विधानसभा के सदस्य बने थे. प्रमथ की शादी बीणापाणि देवी यानी बोरो मां से 1933 में हुई. बीनापाणि देवी का जन्म 1918 में अविभाजित बंगाल के बारीसाल जिले में हुआ था.

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आजादी के बाद बीणापाणि देवी ठाकुर परिवार के साथ पश्चिम बंगाल आ गईं. मरते दम तक बारो मां को देवी की तरह सम्मान दिया गया. उन्हीं के आशीर्वाद से दीदी 10 सालों से सत्ता पर काबिज हैं. उनका आशीर्वाद बीजेपी को भी मिला जो 1 लोकसभा सीट से 18 लोकसभा सीट के रूप में दिखाई देता है.

हरिचंद ठाकुर के वंशजों की राजनीतिक विरासत

हाल के दिनों में ठाकुर परिवार के कई सदस्यों ने राजनीति में मतुआ वोटबैंक के दम पर ही सत्ता के गलियारों का सफर तय किया। बंगाल में किंग मेकर मतुआ परिवार ने अपने बढ़ते प्रभाव के चलते राजनीति में एंट्री ली. 1962 में परमार्थ रंजन ठाकुर ने पश्चिम बंगाल के नादिया जिले की रिजर्व सीट हंसखली से विधानसभा का चुनाव जीता.

मतुआ संप्रदाय की राजनैतिक हैसियत के चलते नादिया जिले के आसपास और बांग्लादेश के सीमावर्ती इलाके में मतुआ संप्रदाय का प्रभाव लगातार मजबूत होता चला गया. प्रमथ रंजन ठाकुर की सन 1990 में मृत्यु हो गई. इसके बाद बीनापाणि देवी ने मतुआ महासभा के सलाहकार की भूमिका संभाली.

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संप्रदाय से जुड़े लोग उन्हें देवी तरह मानने लगे. 5 मार्च 2019 को मतुआ माता बीनापाणि देवी का निधन हो गया. बीनापाणि देवी की नजदीकी साल 2010 में ममता बनर्जी से बढ़ी. बीनापाणि देवी ने 15 मार्च 2010 को ममता बनर्जी को मतुआ संप्रदाय का संरक्षक घोषित किया.

तृणमूल कांग्रेस को लेफ्ट के खिलाफ माहौल बनाने में मतुआ संप्रदाय का समर्थन मिला और 2011 में ममता बनर्जी बंगाल की चीफ मिनिस्टर बनीं. साल 2014 में बीनापाणि देवी के बड़े बेटे कपिल कृष्ण ठाकुर ने तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर बनगांव लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा और संसद पहुंचे.

कपिल कृष्ण ठाकुर का 2015 में निधन हो गया. उसके बाद उनकी पत्नी ममता बाला ठाकुर ने यह सीट 2015 उपचुनावों में तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर जीती. मतुआ माता के निधन के बाद परिवार में राजनैतिक बंटवारा खुलकर दिखने लगा. उनके छोटे बेटे मंजुल कृष्ण ठाकुर ने बीजेपी का दामन थाम लिया. 2019 के लोकसभा चुनाव में मंजुल कृष्ण ठाकुर के बेटे शांतनु ठाकुर बनगांव से बीजेपी के टिकट पर चुनाव जीता.

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कहावत है माया मिली न राम. दीदी के साथ भी यही हो रहा है. जिस 30 फीसदी मुस्लिम वोटबैंक के लालच में दीदी ने मतुआ समाज की अनदेखी की.

उस वोटबैंक को पीरजादा अब्बास सिद्दीकी और ओवैसी मिलकर बांट लेंगे. जिस मतुआ समाज ने 10 सालों से दीदी का साथ दिया वो भी CAA के विरोध की वजह से उनसे दूर हो गया है और राम नाम से नफरत ने दीदी को बंगाली हिन्दुओं से भी दूर कर दिया है.

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