CM बनना चाहते थे संजय राउत! बन गए शिवसेना के 'भस्मासुर', पढ़ें- 3 बड़े सबूत

एक नेता, जो बाला साहब ठाकरे के वक्त से शिवसेना का सबसे ज्यादा खास माना जाता रहा है. उस संजय राउत ने अपने करतूत से भाजपा के पीठ में छूरा घोंप दिया. ऐसा इसलिए क्योंकि खुद संजय राउत ने महाराष्ट्र के सीएम की कुर्सी पर विराजमान होने का ख्वाब संजोया था.

CM बनना चाहते थे संजय राउत! बन गए शिवसेना के 'भस्मासुर', पढ़ें- 3 बड़े सबूत

नई दिल्ली: महाराष्ट्र में आज सुबह की कुछ यूं हवा चली, कि आंधी का रूप धारण कर ली. देखते ही देखते शिवसेना और कांग्रेस के सपनों को तबाह कर दिया. और इसके पीछे के सबसे बड़े कारण शिवसेना के बड़बोले नेता संजय राउत बताए जा रहे हैं. महाराष्ट्र की राजनीति में शिवसेना की धज्जियां उड़ गई और ये सब सिर्फ राउत के तेवर के चलते हुआ है.

राउत ने डुबोई शिवसेना की नैय्या

शिवसेना ने एक जिद को कुछ इस कदर पकड़ा कि उसे औंधे मुंह गिरना पड़ा. महाराष्ट्र की राजनीति में इतने सालों तक अपने किंगमेकर की भूमिका अदा करने वाली पार्टी ना तो घर की रही और ना ही घाट की. उद्धव की पार्टी के साथ जो कुछ भी उसे देखकर ये कहना गलत नहीं होगा कि भाजपा ने जिस तरह से अपने साथ किए बेवफाई का इंतकाम लिया है, जो इतिहास के पन्नों पर दर्ज हो गया है. लेकिन आपको बता दें, प्रदेश की सियासत में शिवसेना की नैय्या डुबोने में सबसे बड़ा हाथ पार्टी के ही अपने नेता संजय राउत का है. राउत के तेवर और उनकी बयानबाजी ने शिवसेना के सपनों को चीथड़ेृ-चीथड़े कर दिया.

मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठना चाहते थे संजय

महाराष्ट्र की सियासत का सबसे बड़ा उलटफेर देखने के बाद राजनीतिक जंग और भी दिलचस्प होती जा रही है. जानकारी मिल रही है, कि एनसीपी-शिवसेना-कांग्रेस के बीच शुक्रवार को हुई बैठक में उद्धव के अलावा शिवसेना ने सीएम की कुर्सी के लिए एकनाथ सिंदे के अलावा संजय राउत के नाम पर भी जोर दिया था. जिससे राउत गदगद हो गए थे. हालांकि बैठक में राउत बार-बार उद्धव के नाम के लिए अपील करते रहे, क्योंकि वो जानते थे कि उद्धव ठाकरे कभी भी मुख्यमंत्री की कुर्सी को नहीं अपनाएंगे. ऐसे में राउत के पास एक सुनहरा मौका था. लेकिन अफसोस कि राउत के साथ ही नहीं बल्कि महाराष्ट्र के बड़े-बड़े सियासतदानों के साथ खेल हो गया. और शिवसेना के सपनों को जेल हो गया. संजय राउत को कुर्सी से कितना प्रेम है, ये समझना इसलिए आसान हो जाता है. वो बार-बार 50-50 फॉर्मूले का जाप इस तरह करते रहे जैसे कि कोई रोता हुआ बच्चा खिलौने की जिद पर अड़ा हुआ है. लेकिन शिवसेना का खिलौना अब टूट गया है. 

आपको इसके तीन बड़े सबूत बताते है कि कैसे संजय राउत की करतूत ने ये साबित किया कि वो सीएम बनने का ख्वाब संजोए बैठे थे.

सबूत नंबर 1

प्रदेश में किसकी सरकार बनेगी, और मुख्यमंत्री की कुर्सी पर कौन विराजमान होगा? इस सवाल पर जंग जारी ही था कि संजय राउत ने भाजपा-शिवसेना गठबंधन की लंका लगानी शुरू कर दी. उन्होंने आदित्य ठाकरे को मुख्यमंत्री बनाने का ख्वाब दिखाने लगे. क्योंकि वो जानते थे, कि सियासत में नौसिखिया होने के चलते आदित्य के नाम पर सियासी खेमे में बवाल होना तय है. उद्धव ठाकरे सीएम बनेंगे नहीं. अब ऐसे में राउत को लगता था कि बाला साहब का खास रहने का फायदा उन्हें यहीं मिलेगा और वो सीएम की कुर्सी पर बैठ जाएंगे. चर्चा भी हुई, लेकिन संजय राउत को भाजपा की शाह नीति ने इतना बड़ा झटका दिया कि वो कहीं के नहीं रहें.

सबूत नंबर 2

संजय राउत ने एक अजीबो-गरीब दावा करते हुए महाराष्ट्र में एक अजीब सा मोड़ उस वक्त ला दिया था, जब उन्होंने भाजपा के साथ गठबंधन में रहते हुए ये कह दिया कि शिवसेना के पास बहुमत का आंकड़ा है. उन्होंने ये राग अलापते हुए कहा कि हमारे में 170 विधायकों का समर्थन है, हालांकि ये कितना सच्चा है इसका अंदाजा उस वक्त लग गया जब राज्यपाल ने शिवसेना को सरकार बनाने का दावा पेश करने का ऑफर दिया. उस वक्त ये समझ आ गया कि शिवसेना कितनी पानी में है. हर कोई जानता था कि ये कितना संभव है. ऐसे में राउत शिवसेना के भस्मासुर बनकर सीएम की कुर्सी पर बैठना चाहते थे. और वो ये अच्छी तरह से जानते थे भाजपा के साथ रहकर ऐसा होना असंभव है. ऐसे में उन्होंने सबसे पहले भाजाप-शिवसेना के गठबंधन को मिट्टी में मिलाने की रणनीति बनाई. ये रणनीति को कारगर साबित हो गई, मगर उनका सपना टूट गया.

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सबूत नंबर 3

राउत बार-बार ये राग अलापते रहे कि शिवसेना अपनी ताकत पर अपना मुख्यमंत्री बनाकर दिखाएगी. शिवसेना कितनी ताकतवर है और उसकी क्या सियासी औकात है. ये उसके अपने नेता के पुराने बयान अच्छी तरह से समझाने का काम करते हैं. राउत ये तो कहते रहे कि शिवसेना अपना सीएम बनाएगी. लेकिन, उन्होंने कभी अपनी दिली इच्छा बयां नहीं किया कि वो खुद सीएम के सिंहासन पर बैठना चाहते हैं. उन्होंने बार-बार न सिर्फ भाजपा बल्कि फडणवीस और अमित शाह पर भी तंज कसने का काम किया, यानी साफ है. उन्होंने खुद को सीएम मान लिया था. वो हर बार शिवसेना के मुखपत्र को भाजपा के खिलाफ हथियार के तौर पर इस्तेमाल करते थे. अजीब-अजीब तरह का कार्टून और संपादकीय पर खुद राउत उस वक्त अपनी सहयोगी दल भाजपा को गिराने की कोशिश करते रहे. ताकि वो खुद सीएम की कुर्सी पर बैठ जाए. आदित्य ठाकरे के बहाने पहले तो राउत ने खूब 'नंगा नाच' किया. और फिर उद्धव के कंधे पर बंदूक रखने ही वाले थे कि संजय राउत को धोबिया पछाड़ देते हुए भाजपा ने उन्हें उनकी हैसियत बता दी. और राउत का सीएम बनने वाला सपना अधूरा रह गया.

कुल मिलाकर संजय राउत का ये सपना, सपना ही रह गया और भाजपा ने उसे ऐसा झटका दिया कि पूरी की पूरी शिवसेना चारों खाने चित हो गई. शिवसेना को आज अपनी करनी का काफी पछतावा हो रहा होगा. लेकिन अब कोई कर भी क्या सकता है. वो कहावत है न, 'अब पछताए होत क्या जब चिड़िया स्टोरी'

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