Haridwar Mahakumbh 2021: ऐसा क्या हुआ कि मथना पड़ गया समुद्र

मृत संजीवनी विद्या सीखकर दैत्य गुरु देवताओं के साथ युद्ध में छल करने लगे थे. इस तरह देवता युद्ध हारने लगे और असुर जीतने लगे. संतुलन बिगड़ता देखकर श्रीहरि ने अमृत की खोज करने का सुझाव दिया.

Written by - Zee Hindustan Web Team | Last Updated : Jan 21, 2021, 01:12 PM IST
  • दैत्यगुरु शुक्राचार्य ने महादेव से हासिल की थी मृतसंजीवनी विद्या
  • युद्ध में मृत दानवों को जीवित कर देते थे शुक्राचार्य
Haridwar Mahakumbh 2021: ऐसा क्या हुआ कि मथना पड़ गया समुद्र

नई दिल्लीः Haridwar Mahakumbh 2021 के लिए तीर्थ और आध्यात्म की नगरी हरिद्वार पूरी तरह तैयार है. श्रद्धालुओं का आना शुरू हो गया है. घाटों पर रौनक है और स्नान आदि की परंपरा जारी है. अभी शाही स्नान की तिथियां दूर हैं. पहला शाही स्नान 11 मार्च 2021, शिवरात्रि के दिन पड़ेगा. दूसरा शाही स्नान 12 अप्रैल 2021, सोमवती अमावस्या को, तीसरा शाही स्नान 14 अप्रैल 2021, मेष संक्रांति पर और चौथा शाही स्नान 27 अप्रैल 2021, को बैसाख पूर्णिमा के दिन पड़ेगा. 

शाही स्नान वे तिथियां हैं जब सनातन परंपरा के अंदर आने वाले अखाड़े और संप्रदाय कुंभ में सामूहिक स्नान करते हैं. इस दौरान शोभायात्रा निकालते हैं. यह अद्भुत मनोरम दृश्य ऐसा होता है कि जैसे देवता विभिन्न रूप धरकर एक बार फिर धरती पर उतर आए हैं.

कुंभ (Kumbh) हम भारतीयों के लिए महज एक त्योहार या धार्मिक परंपरा नहीं है, बल्कि यह जीवन की सीख का जरिया भी है. वह सीख जो सदियों पहले देव-दानवों के युद्ध से मानवता को मिली थी. इस युद्ध की शुरुआत कैसे हुई, इसकी कथा पर डालते हैं नजर-

दिति-अदिति के पुत्रों को मिले स्वर्ग और पाताल

ब्रह्मदेव (Brahma Dev) के आदेश से ऋषि कश्यप ने प्रजापति दक्ष की दो पुत्रियों दिती और अदिति से विवाह किया. दिती के पुत्र दैत्य और अदिति के पुत्र आदित्य कहलाए. त्रिदेवों और सप्तऋषिय़ों की सहमति से इन्हीं दोनों के पुत्रों को संसार में जीवन की प्रक्रिया और संचालन की शुरुआत करनी थी. 

अदिति (Aditi) के पुत्रों के शांत और स्थिर स्वभाव ने उन्हें ग्रहों-नक्षत्रों और तारासमूहों का अधिपति बनाया. (इसीलिए ग्रह-तारे आदि अपनी स्थिति पर जस के तस हैं, विचलन नहीं करते हैं) इसलिए उन्हें स्वर्गलोक का राज्य मिला. वहीं दिति के पुत्र चंचल और चलायमान थे, उन्हें पृथ्वी के नीचे पाताल लोक की ऊर्जा का स्वामी बनाया गया, जो कि भूगर्भ की हलचल के लिए जरूरी था.

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बंटवारा बन गया देव-दानव युद्ध का कारण

यह बंटवारा बार-बार देव-दानवों के युद्ध का कारण बन गया. देवताओं के पास यज्ञ होम की शक्ति थी. इसिलए वह हर बार युद्ध में दैत्यों से विजयी हो जाते थे. लगातार हारते और मृत्यु को प्राप्त होने के कारण दैत्य कम होने लगे और विजय के लगातार चखते स्वाद ने देवताओं को अभिमानी बना दिया. दैत्यों के लगातार पतन से निराश शुक्राचार्य एक बार महादेव की शरण में पहुंचे. महादेव शिव (Shiv) सभी योगियों के गुरु हैं. उनके पास योग क्रियाओं से अर्जित कई शक्तियां हैं. 

शुक्राचार्य ने शिव स्तुति कर महादेव को प्रसन्न किया और कहा कि, हे भोलेनाथ, इस तरह से सारी दैत्य जाति का ही नाश हो जाएगा. ऐसा कहकर उन्होंने महादेव से मृत संजीवनी विद्या सीखने की इच्छा जताई. इस पर भोलेनाथ (Bholenath) ने कहा, यह विद्या मैं आपको अकेले नहीं दे सकता, क्योंकि इस तरह आपकी जो मंशा है वह छल करेगी. लेकिन अगले सोमवार को आप और इंद्र दोनों मेरे पास आएं तो जो पहले आएगा उसे यह विद्यादान दूंगा.

इंद्र और शुक्राचार्य गए महादेव की शरण में

यह सुनकर देवराज इंद्र (Devraj Indra) और शुक्राचार्य दोनों ही नियत तिथि पर कैलाश पहुंचे. महादेव ध्यान मग्न थे. कई युद्ध जीत चुके इंद्र अभिमान के कारण वहीं पास में एक पत्थर पर बैठ गए, जबकि शुक्राचार्य (Shuklacharya) महादेव को दंडवत हो गए. जब महादेव का ध्यान भंग हुआ तब उन्होंने शुक्राचार्य को दंडवत देखा, तबतक ही इंद्र ने भी उठकर प्रणाम किया. 

इस पर महादेव ने कहा कि आप दोनों ही साथ ही उपस्थित हैं, इसलिए यह विद्यादान फिर भी नहीं दिया जा सकेगा, वैसे भी इस विद्या को सीखने वाले का शरीर बहुत अधिक तपनिष्ठ होना चाहिए. जो तपनिष्ठा की परीक्षा देकर योग्यता सिद्ध करेगा संजीवनी विद्या उसे सिखा दी जाएगी. तब शुक्राचार्य तपनिष्ठा की परीक्षा में सफल हो गए और संजीवनी विद्या उन्होंने सीख ली.

ऐसे मिला समुद्र मंथन का सुझाव

इसके बाद जब भी युद्ध होता था अपने घायल और मृत दानवों को वे संजीवनी विद्या से फिर से जीवित कर देते थे. इससे देवता युद्ध हार गए. स्वर्ग पर दानवों का अधिकार हो गया. हार से निराश देवता भगवान विष्णु (Vishnu) की शरण में पहुंचे. सृष्टि का संतुलन बिगड़ता देखकर श्रीहरि ने कहा कि संजीवनी विद्या तो नहीं है मेरे पास, लेकिन इसकी एक काट बता सकता हूं. वह है अमृत. तब श्रीहरि ने सागर मंथन का तरीका सुझाया और बताया कि कैसे मंथन के जरिए अमृत पाया जा सकता है.

इसके बाद समुद्र मंथन (Samudra Manthan) हुआ, फिर नदियों में अमृत गिरने की घटनाएं हुईं और आज उन स्थानों पर महाकुंभ के आयोजन हो रहे हैं.

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