कहानियों को चित्रों में समेट देने वाले एमएफ हुसैन कैसे बने रंगों के बेताज बादशाह
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कहानियों को चित्रों में समेट देने वाले एमएफ हुसैन कैसे बने रंगों के बेताज बादशाह

Death Anniversary Maqbool Fida Husain:  मकबूल फिदा हुसैन भारत के चर्चित चित्रकार थे. आज उनकी पुण्यतिथि है. मकबूल फिदा हुसैन ऐसे चित्रकार थे जिन्होंने पाब्लो पिकासो के साथ एक प्रोग्राम में शिरकत की थी. 

Makbool Fida Hussain

Death Anniversary Maqbool Fida Husain: परंपरा को आधुनिकता से जोड़ने वाले मकबूल फिदा हुसैन समकालीन भारतीय चित्रकला के वह नामदार हस्ती थे, जिनका नाम वैश्विक कला जगत में बड़े अदब से लिया जाता है. वह अपने कैनवास में सूक्ष्मता से लेकर व्यापकता, सभ्यता से लेकर संस्कृति और मानव से लेकर प्रकृति सब को समेटे हुए थे. कंधे तक लटकते बाल, सफेद दाढ़ी और हाथ में कूची लिए नंगे पैर चलने वाले भारत के पिकासो यानी मशहूर चित्रकार मकबूल फिदा हुसैन मुल्क के पहले ऐसे चित्रकार थे, जिनके नाम से हर आम भारतीय भी वाकिफ़ था. दुनिया के बड़े चित्रकारों में शुमार हुसैन ने अपनी शिल्प एवं कला से भारतीय कला जगत को वैश्विक स्तर पर एक नयी पहचान दिलायी. चित्रकला के पर्याय हुसैन रंगों के साथ भारतीय संस्कृति की भी गहरी समझ रखते थे. रामायण और महाभारत को लेकर उन्होंने उत्कृष्ट चित्रमालाएं बनायीं. चटख रंगों का इस्तेमाल कर अपने कैनवास को भरने वाले मकबूल फिदा हुसैन ने जीवन के तमाम रंग अपनी कूँची से उकेरे, मगर घोड़े की पेंटिंग उसका अहम हिस्सा होता था. हुसैन भारत ही दुनिया के मांगे चित्रकारों में शुमार किए जाते थे, क्रिस्टीज ऑक्शन में इनकी एक पेंटिंग 20 लाख अमेरिकी डॉलर में बिकी थी.

व्यक्तिगत जीवन

मकबूल फिदा हुसैन का जन्म 17 सितंबर 1915 को महाराष्ट्र के पंढरपुर में एक बोहरा मुस्लिम परिवार में हुआ था. बचपन में ही मां की ममता से महरूम हुसैन पिता की देखरेख में बडे़ हुए. 1941 में मकबूल फिदा हुसैन का विवाह फाजिला के साथ हुआ. इससे उनके पांच बच्चे हुए- मुस्तफा, शमशाद, ओवैस, राइसा और अकीला. 9 जून 2011 को लंदन में उनकी मृत्यु हुई को हुई.

कैरियर

सन 1935 में 20 साल की उम्र में मुंबई के प्रसिद्ध जे. जे स्कूल ऑफ आर्ट में दाखिला लिया. यहीं से उनके कला के जीवन का आगाज हुआ. हुसैन ने सिनेमा के पोस्टर बनाने से अपना अपना कैरियर शुरू किया था. 1947 में उनकी पहली प्रदर्शनी सुनहरा संसार का प्रदर्शन बॉम्बे आर्ट सोसायटी में हुआ. इसी वर्ष उन्होंने द प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट्स ग्रुप ऑफ बाम्बे की स्थापना की. पहली एकल प्रदर्शनी का आयोजन ज्यूरिख में हुआ. जमीन, बिटवीन स्पाइडर एंड द लैंप, मराठी वूमेन, मदर एंड चाइल्ड, श्वेतांबरी, थ्योरामा, द हार्स दैट रेड, सेकंड एक्ट जैसी सुंदर कलाकृति उनकी कूची से निकली, जिसने हुसैन को सफलता के शीर्ष पर पहुंचाया.

पुस्तक 

एम. एफ हुसैन की कहानी अपनी जुबानी इनकी आत्मकथा है. इसके अलावे अखिलेश द्वारा लिखित उनकी जीवनी मकबूल नाम से प्रकाशित हैं प्रसिद्ध फिल्म पत्रकार खालिद मोहम्मद और के. विक्रम सिंह ने भी हुसैन पर किताबें लिखी हैं.

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बतौर फिल्मकार

फिल्मों के प्रति मकबूल फिदा हुसैन की दीवानगी जगजाहिर थी. वर्ष 1967 में उन्होंने अपनी पहली फिल्म थ्रू द आइज ऑफ ए पेंटर बनायी, जिसे बर्लिन फिल्म समारोह में गोल्डन बेयर पुरस्कार मिला. फिल्म अभिनेत्री माधुरी दीक्षित के प्रशंसक हुसैन ने उनको लेकर 2000 में गजगामिनी जैसी चर्चित फिल्म बनाई. इसके बाद तब्बू को लेकर मीनाक्षी: ए टेल ऑफ थ्री सिटीज बनायी. निर्देशक शांति पी. चौधरी ने 1976 में हुसैन के जीवन पर एक वृत्तचित्र फिल्म ए पेंटर ऑफ आवर टाइम: हुसैन बनाई. इसके बाद 1980 में हुसैन पर उन्होंने एक और वृत्तचित्र फिल्म बनायी.

विवादों से सामना

मकबूल फिदा हुसैन अपने जीवन में जितने लोकप्रिय रहे, उतने विवादित भी. उन पर अश्लील पेंटिंग बनाकर धार्मिक भावना को ठेस पहुंचाने का आरोप लगा. 2006 में एक मैगजीन के कवर पर भारत माता की विवादित तस्वीर बनाने की वजह से हुसैन की काफी फजीहत हुई. उन पर हिंदू देवियों के भी विवादित तस्वीर बनाने का आरोप लगा. इसके विरोध में पूरे देश में प्रदर्शन हुए और उनके खिलाफ मुकदमा भी दर्ज कराया गया. उन पर ईशनिंदा का भी आरोप लगा. एक इस्लामी संगठन ऑल इंडिया उलेमा काउंसिल ने उनके फिल्म मीनाक्षी के एक गाने पर 'नूर-उन-अला-नूर' पर आपत्ति जाहिर की, इसके बाद इसके बाद हुसैन ने गाने को तो नहीं हटाया, बल्कि फिल्म को ही सिनेमाघरों से हटा लिया.

पुरस्कार और सम्मान

भारत सरकार ने उन्हें 1955 में पद्मश्री,1973 में पद्म भूषण और 1991 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया. सन 2008 में केरल सरकार ने उन्हें प्रतिष्ठित राजा रवि वर्मा पुरस्कार प्रदान किया. वर्ष 1986 में उन्हें राज्यसभा के मनोनीत सदस्य के तौर पर चुना  गया. बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, जामिया मिलिया इस्लामिया, कालीकट विश्वविद्यालय और मैसूर विश्वविद्यालय द्वारा मानद डॉक्टरेट की उपाधि दी गयी.

और अंत

सन 1971 में साओ पावलो समारोह में उन्हें महान चित्रकार पाब्लो पिकासो के साथ शिरकत की थी. 1998 में उन्होंने हैदराबाद में सिनेमाघर नामक संग्रहालय की स्थापना की. 2010 में हुसैन साहब को कतर ने अपने यहां की नागरिकता दी थी.

ए. निशांत
लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं.

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