आनंद मरा नहीं...। आनंद मरते नहीं...।

अपनी कामयाब फिल्मों के बदौलत करीब डेढ़ दशक तक हिन्दी सिनेमा पर राज करने वाले बॉलीवुड के `काका` राजेश खन्ना अब हमारे बीच नहीं रहे। आज दोपहर मुंबई के घर में उन्होंने अंतिम सांस ली।

प्रवीण कुमार
'बाबू मोशाय, जिंदगी और मौत ऊपर वाले के हाथ है जहांपनाह, जिसे न आप बदल सकते हैं, न मैं। हम सब तो रंगमंच की कठपुतलियां हैं, जिनकी डोर उस ऊपर वाले के हाथों में है। कब, कौन, कैसे उठेगा, यह कोई नहीं जानता...।' हृषिकेश मुखर्जी द्वारा 1971 में निर्मित फिल्म 'आनंद' के इस मशहूर डायलॉग से सिने प्रेमियों पर कई दशकों तक राज करने वाला बॉलीवुड का पहला सुपरस्टार राजेश खन्ना उर्फ काका अब हमारे बीच नहीं रहे। आज दोपहर मुंबई स्थित निवास में उनका निधन हो गया। काका काफी दिनों से बीमार चल रहे थे। राजेश खन्ना के रूप में हिंदी सिनेमा को पहला ऐसा सुपरस्टार मिला था जिसका जादू सिर चढ़कर बोलता था। फिल्म आनंद इस संदेश के साथ खत्म होती है कि 'आनंद मरा नहीं...। आनंद मरते नहीं...।'
29 दिसंबर 1942 को अमृतसर में जन्मे जतिन खन्ना बाद में बॉलीवुड में राजेश खन्ना के नाम से मशहूर हुए। परिवार वालों की मर्जी के खिलाफ अभिनय को बतौर करियर चुनने वाले राजेश खन्ना ने वर्ष 1966 में 24 साल की उम्र में `आखिरी खत` फिल्म से बॉलीवुड में कदम रखा था। बाद में राज, बहारों के सपने और औरत के रूप में उनकी कई फिल्में आई। मगर उन्हें बॉक्स ऑफिस पर कामयाबी नहीं मिल सकी। वर्ष 1969 में फिल्म `आराधना` से राजेश खन्ना ने फिर करियर की उड़ान भरी और देखते ही देखते काका युवा दिलों की धड़कन ही नहीं, बॉलीवुड के सुपरस्टार बन गए। `आराधना` ने राजेश खन्ना की किस्मत के दरवाजे खोल दिए और उसके बाद एक दर्जन से अधिक सुपर-डुपर हिट फिल्में देकर समकालीन तथा अगली पीढ़ी के अभिनेताओं के लिए मील का पत्थर कायम किया। वर्ष 1970 में बनी फिल्म `सच्चा झूठा` के लिए उन्हें पहली बार सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फिल्मफेयर अवॉर्ड दिया गया।
वर्ष 1971 राजेश खन्ना के लिए सबसे यादगार साल रहा। उस वर्ष उन्होंने कटी पतंग, आनन्द, आन मिलो सजना, महबूब की मेंहदी, हाथी मेरे साथी और अंदाज जैसी कई सुपरहिट फिल्में दीं। दो रास्ते, दुश्मन, बावर्ची, मेरे जीवन साथी, जोरू का गुलाम, अनुराग, दाग, नमक हराम और हमशक्ल के रूप में हिट फिल्मों के जरिए उन्होंने बॉक्स ऑफिस को कई वर्षों तक गुलजार रखा। फिल्म `आनन्द` में उनके सशक्त अभिनय ने एक मिशाल कायम की। एक लाइलाज रोग से पीड़ित शख्स के किरदार को राजेश खन्ना ने एक जिंदादिल इंसान के रूप जीकर कालजयी बना दिया। राजेश को `आनन्द` में यादगार अभिनय के लिए वर्ष 1971 में लगातार दूसरी बार सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फिल्मफेयर अवॉर्ड दिया गया।
वैसे तो राजेश खन्ना ने कई अभिनेत्रियों के साथ काम किया, लेकिन शर्मिला टैगोर और मुमताज के साथ उनकी जोड़ी ज्यादा लोकप्रिय हुई। उन्होंने शर्मिला के साथ आराधना, सफर, बदनाम, फरिश्ते, छोटी बहू, अमर प्रेम, राजा रानी और आविष्कार में जोड़ी बनाई, जबकि दो रास्ते, बंधन, सच्चा झूठा, दुश्मन, अपना देश, आपकी कसम, रोटी तथा प्रेम कहानी में मुमताज के साथ उनकी जोड़ी बेहद पसंद की गई।
राजेश खन्ना ने वर्ष 1973 में खुद से काफी छोटी नवोदित अभिनेत्री डिम्पल कपाडिया से शादी के बंधन में बंधे और वे दो बेटियों ट्विंकल और रिंकी के माता-पिता बने। दुर्भाग्य से राजेश और डिम्पल का वैवाहिक जीवन अधिक दिनों तक नहीं चल सका और कुछ समय के बाद वे अलग हो गए। राजेश खन्ना के करियर में 80 के दशक के बाद उतार शुरू हो गया। बाद में उन्होंने राजनीति में भी कदम रखा और वर्ष 1991 से 1996 के बीच कांग्रेस से सांसद भी रहे। वर्ष 1994 में उन्होंने `खुदाई` से एक बार फिर अभिनय की नई पारी शुरू की। उसके बाद उनकी कई फिल्में मसलन आ अब लौट चलें (1999), क्या दिल ने कहा (2002), जाना (2006) और वफा आई। इधर लगभग दो महीने से राजेश खन्ना गंभीर रूप से बीमार चल रहे थे। हालांकि इस बुरे वक्त में डिंपल अस्पताल में लगातार उनके साथ थीं।