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आपके लाडले के लिए खतरनाक है मोबाइल यूज करना, WHO ने जारी की चेतावनी

अगर आप भी अपने रोते हुए बच्चे को चुप कराने के लिए उसके हाथ में मोबाइल थमा देते हैं तो आपकी यह आदत उसके लिख खतरनाक साबित हो सकती है. इसके अलावा माता-पिता बच्चे को व्यस्त रखने के लिए अकसर उनके हाथ में फोन थमा देते हैं या फिर उन्हें टीवी के सामने बैठा देते हैं.

आपके लाडले के लिए खतरनाक है मोबाइल यूज करना, WHO ने जारी की चेतावनी

नई दिल्ली : अगर आप भी अपने रोते हुए बच्चे को चुप कराने के लिए उसके हाथ में मोबाइल थमा देते हैं तो आपकी यह आदत उसके लिख खतरनाक साबित हो सकती है. इसके अलावा माता-पिता बच्चे को व्यस्त रखने के लिए अकसर उनके हाथ में फोन थमा देते हैं या फिर उन्हें टीवी के सामने बैठा देते हैं. ऐसे में वे यह ध्यान भी नहीं देते कि बच्चा क्या देख रहा है और कितनी देर से स्क्रीन के सामने है. शहरी जीवन शैली में बच्चों का खेल-कूद, भाग-दौड़ कम होती जा रही है. बच्चे ज्यादा से ज्यादा समय घर की चाहरदीवारी के अंदर इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स के साथ बिताते हैं. इसका असर लंबे समय के बाद देखने को मिलता है.

मेहमानों के आने पर बच्चों को फोन दे देते हैं पैरेंट्स
दो साल की राबिया को कार्टून देखना पसंद है, चाहे वह किसी भी भाषा में हो. राबिया की मां फौजिया बताती हैं कि राबिया हिन्दी, इंगलिश और स्पैनिश के कार्टून देखती है और उसी भाषा में बात करने की कोशिश करती है. वह दिन में 2 से 3 घंटे स्क्रीन के सामने रहती है. फौजिया बताती हैं कि जब घर में मेहमान आते हैं या जब वह काम में बहुत ज्यादा व्यस्त रहती हैं तब वे राबिया को फोन में कार्टून लगा कर दे देती हैं.

बच्चों को दूसरे खेलों में व्यस्त रखें अभिभावक
उन्होंने बताया कि शुरुआत में वह ज्यादा समय के लिए राबिया को फोन दे देती थीं, लेकिन जब उन्होंने देखा कि राबिया बिना फोन के खाना नहीं खा रही है. तो उन्होंने धीरे-धीरे उसके स्क्रीन टाइम को कम कर दिया. वह कोशिश करती हैं कि राबिया को स्क्रीन से ज्यादा समय प्लेग्राउंड में बिताए. उनका कहना है कि आज के समय में बच्चों को पूरी तरह से मोबाइल फोन से दूर नहीं रखा जा सकता. लेकिन अगर बच्चों को फोन से दूर करना है तो उसके लिए पेरेंट्स को बच्चों को दूसरे खेलों में व्यस्त रखना चाहिए.

WHO की चेतावनी
विश्व स्वास्थ संगठन यानी WHO ने हाल ही में जारी की गई रिपोर्ट में 5 साल से कम उम्र के बच्चों का स्क्रीन टाइम निर्धारित कर दिया है. अब तक लोगों का सिर्फ ये मानना था कि स्क्रीन के सामने ज्यादा समय बिताने से आंखें खराब होती हैं लेकन, डब्ल्यूएचओ की इस रिपोर्ट के मुताबिक, इसके परिणाम ज्यादा खतरनाक हैं. 5 साल से कम उम्र के बच्चों का निर्धारित समय से ज्यादा स्क्रीन टाइम उनके शारिरिक और मानसिक विकास पर सीधा असर डालता है. इस रिपोर्ट के जरिए WHO ने माता-पिता या अभिभावक को बच्चों को मोबाइल फोन, टीवी स्क्रीन, लैपटॉप और अन्य इलैक्ट्रोनिक उपकरणों से दूर रखने की हिदायत दी है.

क्या कहती है WHO की गाइडलाइन
1 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए :

एक साल से कम उम्र के बच्चों के लिए जीरो स्क्रीन टाइम निर्धारित किया गया है. यानी उन्हें बिलकुल भी स्क्रीन के सामने नहीं रखना है. इसके अलावा उन्हें दिन में आधा घण्टे पेट के बल लिटाना चाहिए. फर्श पर तरह-तरह के खेल खिलाना भी बच्चे के शारिरिक विकास के लिए बेहतर है.

1 से 2 साल के बच्चों के लिए :
इस उम्र के बच्चों के लिए दिनभर में स्क्रीन टाइम 1 घण्टे से ज्यादा नहीं होना चाहिए. इसके साथ ही 3 घण्टे फिजिकल एक्टिविटी करने की सलाह दी गई है. इस उम्र में बच्चों को कहानी सुनाना उनके मानसिक विकास के लिए फाएदेमंद साबित होगा.

3 से 4 साल तक के बच्चों के लिए :
3 से 4 साल की उम्र के बच्चों के लिए भी दिनभर में ज्यादा से ज्यादा समय 1 घंटा निर्धारित किया गया है. लेकिन इनको 2 से 3 साल के बच्चों के मुकाबले ज्यादा फिजिकल एक्टिविटीज करने की सलाह दी गई है.

डॉक्टर भी सही मानते हैं WHO की गाइडलाइंस
मैक्स अस्पताल के मेन्टल हेल्थ एंड बिहेविरल सांइस डिपार्टमेंट के डायरेक्टर डॉ समीर मल्होत्रा बताते हैं कि बच्चों के मानसिक और शारिरिक विकास के लिए बातचीत बहुत जरुरी है. 5 साल से कम उम्र के बच्चों कॉगनिटिव स्किल विकसित नहीं हो पाती है. इसका मतलब ये है कि बच्चे सही और गलत में फर्क नहीं कर सकते. वे जो देखते हैं वही सीखते हैं. कई बार देखा गया है कि बच्चे कार्टून की तरह ही बोलने की कोशिश करते हैं. कई पेरेंट्स ये शिकायत लेकर भी आते हैं कि बच्चे बहुत ज्यादा एग्रेसिव हो रहे हैं. अकसर पेरेंट्स बच्चों को खाना खिलाने के लिए भी टीवी के सामने बैठा देते हैं या फिर फोन में कुछ न कुछ लगा कर दे देते हैं. ये बहुत ही गलत प्रेक्टिस है. ऐसे में बच्चों का ध्यान बट जाता है और वे भूख से ज्यादा खाना खा लेते हैं. इस उम्र में बच्चों की इमेजिनेशन तेज होती है. इसलिए पहले लोग बच्चों को कहानियां सुनाया करते थे. लेकिन अब पेरेंट्स कहानियां सुनाने की बजाय बच्चों को फोन पकड़ा देते हैं.

(पीयूष शर्मा की रिपोर्ट)