close

खास खबरें सिर्फ आपके लिए...हम खासतौर से आपके लिए कुछ चुनिंदा खबरें लाए हैं. इन्हें सीधे अपने मेलबाक्स में प्राप्त करें.

अयोध्या केस 21वां दिन: राजीव धवन ने निर्मोही अखाड़े के 'सिविल सूट' पर उठाए सवाल

अयोध्या मामले (Ayodhya Case) में बुधवार को सुनवाई के 21वें दिन सुन्नी वक्फ बोर्ड (Sunni Waqf Board) ने निर्मोही अखाड़ा (Nirmohi Akhada) की याचिका के दावे का विरोध करते हुए कहा कि विवादित जमीन (disputed land) पर निर्मोही अखाड़े का दावा नहीं बनता 

अयोध्या केस 21वां दिन:  राजीव धवन ने निर्मोही अखाड़े के 'सिविल सूट' पर उठाए सवाल
(फाइल फोटो)

नई दिल्ली: अयोध्या मामले (Ayodhya Case) में बुधवार को सुनवाई के 21वें दिन सुन्नी वक्फ बोर्ड (Sunni Waqf Board) ने निर्मोही अखाड़ा (Nirmohi Akhada) की याचिका के दावे का विरोध करते हुए कहा कि विवादित जमीन (disputed land) पर निर्मोही अखाड़े का दावा नहीं बनता क्योंकि विवादित जमीन पर नियंत्रण को लेकर दायर उनका मुकदमा, सिविल सूट दायर करने की समय सीमा (लॉ ऑफ लिमिटेशन) के बाद दायर किया गया था. सुन्नी वक्फ बोर्ड की तरफ से वरिष्ठ वकील राजीव धवन ने दलील दी कि 22-23 दिसंबर 1949 को विवादित जमीन पर रामलला की मूर्ति रखे जाने के करीब दस साल बाद 1959 में निर्मोही अखाड़ा ने सिविल सूट (civil suit) दायर किया था जबकि सिविल सूट (civil suit) दायर करने की समय सीमा 6 साल थी.

गौरतलब है कि निर्मोही अखाड़ा (Nirmohi Akhada) ने दलील दी थी कि उनके सिविल सूट (civil suit) के मामले में लॉ ऑफ लिमिटेशन का उल्लंघन नहीं हुआ है क्योंकि 1949 में तत्कालीन मजिस्ट्रेट ने सीआरपीसी की धारा 145 के तहत विवादित जमीन को अटैच (प्रशासनिक कब्जे में) कर दिया था और उसके बाद मजिस्ट्रेट (Magistrate) ने उस विवादित जमीन को लेकर कोई आदेश पारित नहीं किया. निर्मोही अखाड़ा ने दलील दी थी कि जब तक मजिस्ट्रेट ने आखरी आदेश पारित नहीं किया लॉ ऑफ लिमिटेशन वाली 6 साल की सीमा लागू नहीं होती.

इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court) ने निर्मोही अखाड़ा और सुन्नी वक्फ बोर्ड (Sunni Waqf Board) दोनों की याचिका को इसी लॉ ऑफ लिमिटेशन के आधार पर खारिज कर दिया था. हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि 'कॉज ऑफ एक्शन' यानि मजिस्ट्रेट ने विवादित जमीन को अटैच करने का आदेश 1949 का था. इसलिए 6 साल बाद दायर दोनों सूट 'टाइम बार्ड' यानी समय सीमा के बाद दायर किये गए हैं. निर्मोही अखाड़ा ने 1959 में और सुन्नी वक्फ बोर्ड ने 1961 में सूट दायर किया था.

देखें लाइव टीवी

'लॉ ऑफ लिमिटेशन' के जिस नियम का हवाला देकर राजीव धवन निर्मोही अखाड़ा के दावे का विरोध कर रहे हैं वही नियम सुन्नी वक्फ बोर्ड (Sunni Waqf Board) पर भी लागू होता है. क्योंकि इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court) ने निर्मोही अखाड़े के साथ सुन्नी वक्फ बोर्ड की याचिका को भी 'टाइम बार्ड' मानते हुए खारिज कर दिया था. ऐसे में एक सवाल हिंदू पक्षकारों के मन मे जरूर उठ रहा होगा कि सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़े के साथ जिस डाल पर (लॉ ऑफ लिमिटेशन) पर बैठा है सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील राजीव धवन उसी डाल को क्यों काट रहे हैं. राजीव धवन (Rajiv Dhawan) की दलील शुक्रवार को भी जारी रहेगी.

गौरतलब है कि सुन्नी वक्फ बोर्ड ने अपने दलील की शुरुआत में निर्मोही अखाड़ा (Nirmohi Akhada) का समर्थन करते हुए कहा था कि अखाड़ा को विवादित जमीन के बाहरी हिस्से यानी राम चबूतरा (Ram Chabutara) पर पूजा करने का अधिकार है और इसे लेकर वक्फ बोर्ड को कोई ऐतराज नहीं है. अयोध्या मामले में बुधवार को सुनवाई के 21वें दिन मात्र डेढ़ घंटे की सुनवाई हुई क्योंकि सुनवाई करने वाली संविधान पीठ दोपहर 2 बजे के बाद बैठी थी.