Jitiya Vrat 2021: कौन हैं भगवान जीमूतवाहन, जानिए जिऊतिया व्रत का पूरा इतिहास

Jitiya Vrat 2021:  जिऊतिया व्रत में भगवान जीमूतवाहन (Bhagvan Jimootvahan) का नाम लिया जाता है. सवाल उठता है कि भगवान विष्णु, शिव जी, श्रीराम, कृष्ण, हनुमान के अलावा ये कौन से भगवान हैं? इनकी पूजा जिऊतिया व्रत में ही क्यों की जाती है?  

Jitiya Vrat 2021: कौन हैं भगवान जीमूतवाहन, जानिए जिऊतिया व्रत का पूरा इतिहास
कौन हैं भगवान जीमूतवाहन (फाइल फोटो)

Patna: Jitiya Vrat 2021:  देश के पूर्वी राज्य में जिऊतिया व्रत (Jitiya Vrat Jivitputrika vrat) की परंपरा निभाई जा रही है. माताएं अपनी संतान के लिए 36 घंटे का निर्जला व्रत रखे हुए हैं. वह उनकी सुरक्षा की कामना कर रही यह व्रत भगवान कृष्ण से जुड़ा है. इसमें चील और सियारिन की पूजा की बात है, लेकिन एक तथ्य और है, जिस पर किसी का ध्यान नहीं जाता है.

कौन हैं भगवान जीमूत वाहन
व्रत में बार-बार भगवान जीमूतवाहन (Bhagvan Jimootvahan) का नाम लिया जाता है. सवाल उठता है कि भगवान विष्णु, शिव जी, श्रीराम, कृष्ण, हनुमान के अलावा ये कौन से भगवान हैं? इनकी पूजा जिऊतिया व्रत में ही क्यों की जाती है? चील-सियारिन वाली जो कहानी सबसे अधिक प्रचलित है उसमें भी जीमूतवाहन भगवान का पहले से जिक्र है. इस बात को खंगालने के लिए हमें परंपरा के सहारे इतिहास का सिरा खोजना होगा.  

धर्मात्मा व्यक्ति थे गंधर्वराज जीमूतवाहन
जिऊतिया की परंपरा में एक कथा गन्धर्वराज जीमूतवाहन (Bhagvan Jimootvahan) की भी है. कहते हैं कि वे बड़े ही धर्मात्मा व्यक्ति थे. युवावस्था में ही उन्होंने राजपाट छोड़ दिया और वन में पिता की सेवा करने लगे. एक दिन वह जंगल से गुजर रहे थे तो देखा कि एक सुनसान स्थान पर नागमाता विलाप कर रही हैं. जब जीमूतवाहन ने उनके विलाप करने का कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि नागवंश गरुड़ से काफी परेशान है, वंश की रक्षा करने के लिए सभी ने गरुड़ से समझौता किया है कि वे प्रतिदिन उसे एक नाग खाने के लिए देंगे और इसके बदले वो हमारा सामूहिक शिकार नहीं करेगा. इस प्रक्रिया में आज उसके पुत्र को गरुड़ के सामने जाना है. नागमाता की पूरी बात सुनकर जीमूतवाहन ने उन्हें वचन दिया कि वे उनके पुत्र को कुछ नहीं होने देंगे और उसकी जगह कपड़े में लिपटकर खुद गरुड़ के सामने उस जगह लेट जाएंगे, जहां से गरुड़ अपना आहार उठाने आता है.

नागवंश से थी गरुण की शत्रुता
गरुड़ आया तो जीमूतवाहन को अपने पंजों में दबाकर पहाड़ की तरफ उड़ चला. कुछ देर बाद गरुड़ को लगा कि आज जो उसके पंजों में है वह न तो चिल्ला रहा है और न ही रो रहा है. गरुण ने कपड़ा हटाया तो गंधर्वराज जीमूतवाहन (Bhagvan Jimootvahan) को पाया. जीमूतवाहन ने सारी कहानी गरुड़ को बताई. इस पर गरुण ने उन्हें छोड़ दिया और नागों को न खाने का भी वचन दिया. इस दौरान ब्रह्म वाणी हुई, जिसमें कहा गया कि किसी की जान बचाने के लिए अपनी जान दांव पर लगा देने का काम तो कोई पुण्यात्मा ही कर सकता है. तबसे गंधर्व जीमूतवाहन भगवान के रूप में पूजे जाने लगे. जिऊतिया व्रत में महिलाएं इन्हीं की पूजा करती हैं.

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चीनी यात्री ह्ववेनसांग ने भी किया है वर्णन
इतिहास खंगालें तो इस व्रत का महाभारत से जुड़ाव तो मिलता ही है. सभ्यता के 5000 सालों से इस पूजा की परंपरा चली आ रही है. पहले प्रधानमंत्री पं. नेहरू ने अपनी किताब डिस्कवरी ऑफ इंडिया (भारत एक खोज) में भी भगवान जीमूतवाहन की कथा के बारे में लिखा है. हर्षवर्धन के काल में भास्कर वर्मन एक राजा था. इसी दौरान चीनी बौद्ध आचार्य ह्वेनसांग भारत आया था. भास्कर वर्मन योद्धा होने के साथ साहित्य और कला प्रेमी भी था. उसने जीमूतवाहन की कथा पर आधारित एक नाटक की रचना की थी, जिसे नागानंद के नाम से जाना जाता है. ह्वेनसांग ने अपनी रचना 'ट्रैवल्स एण्ड लाइफ' में इसका जिक्र किया है. बौद्ध धर्म में त्याग का उदाहरण देने के लिए भगवान जीमूतवाहन की कथा सुनाई जाती है.

अहिंसा को स्थापित किए जाने का है उदाहरण
Fact ये है कि जिऊतिया व्रत सिर्फ एक समाज या संस्कृति का व्रत नहीं है, बल्कि यह सभी धर्मों में अहिंसा को स्थापित किए जाने का उदाहरण है. आज जिऊतिया व्रत बिहार से निकलकर देश के अन्य राज्यों में भी अलग-अलग रूपों में मनाया जा रहा है. संस्कृति के इसी फैलाव को अनेकता में एकता कहते हैं.