DNA ANALYSIS: Mirabai Chanu के सिल्वर मेडल पर सियासत, जानिए Cartoon के पीछे का नजरिया

हमारे देश की विपक्षी पार्टियों ने पहले भारतीय सेना (Indian Army) को बीजेपी की सेना बना दिया. फिर कोविड की वैक्सीन (Covid Vaccine) को भी बीजेपी की वैक्सीन बना दिया और अब उन्होंने ओलंपिक खेलों में हमारे खिलाड़ियों को भी राजनीति से जोड़ दिया है.

DNA ANALYSIS: Mirabai Chanu के सिल्वर मेडल पर सियासत, जानिए Cartoon के पीछे का नजरिया

नई दिल्ली: टोक्यों में खेलों का महाकुंभ यानी ओलंपिक खेलों का आयोजन चल रहा है. इसी विषय को लेकर आपसे एक सवाल है कि वेट लिफ्टर मीराबाई चानू (Mirabai Chanu) के ओलंपिक मेडल से आप खुश हुए या दुखी हुए? क्या आपका सीना गर्व से चौड़ा नहीं हुआ? पहले ही दिन भारत ने सिल्वर मेडल जीत कर इतिहास रचा और ये देश के लिए गौरांवित करने वाला क्षण था. सोचिए इस उपलब्धि से किसी को क्या दुख हो सकता है? लेकिन इसे देश का दुर्भाग्य ही कहेंगे कि अपने देश में हर चीज में कोई ना कोई नकारात्मकता ढूंढ लेता है जिस पर राजनीति शुरू हो जाती है.

'सम्मान का मजाक बना'

दरअसल मीराबाई चानू ने टोक्यो ओलंपिक (Tokyo Olympic) में देश के लिए जो सिल्वर मेडल जीता, उस पर देश में दो कॉर्टून छपे और ये दो कॉर्टून दो नजरियों के बीच फर्क को दिखाते हैं. इनमें पहला आपत्तिजनक कॉर्टून देश के एक बड़े अखबार ने छापा, जिसमें ये दर्शाने की कोशिश की गई कि मीराबाई इसलिए गोल्ड नहीं जीत पाई क्योंकि महंगाई की वजह से उनके पास साधन नहीं थे. बड़ी बात ये है कि देश के विपक्षी नेताओं ने इस कॉर्टून को Retweet भी किया और इस उपलब्धि का मजाक बनाया.

देश के आम लोग भले ही इस उपलब्धि पर जश्न मना रहे हैं लेकिन कुछ विपक्षी पार्टियां ये भूल गई हैं कि ओलंपिक खेलों में जीता हुआ पदक कांग्रेस या बीजेपी का नही होता. ये पदक देश का होता है.

वहीं दूसरे कॉर्टून में मीराबाई चानू को भगवान कृष्ण की सबसे बड़ी भक्त और कवयित्री मीराबाई के रूप में दिखाया गया और ये कॉर्टून बताता है कि एक वो मीराबाई थीं, जो भजन गाती थीं और एक ये मीराबाई है, जो देश के लिए मेडल लाई हैं. ये दोनों कॉर्टून बताने के लिए काफी हैं कि हमारे देश में कैसे एक चीज को अलग अलग नजरिए से देखा जाता है और सोचिए ये कितना बड़ा दुर्भाग्य है.
 

'नजर और नजरिया'

बड़ी बात ये भी है कि अगर भारत ओलंपिक खेलों में कोई मेडल नहीं जीतता तो यही लोग हमारे देश का मजाक बनाते और हमारे ही खिलाड़ियों की आलोचना करते. लेकिन जब वो देश के लिए मेडल जीतते हैं, तब भी ये उसमें कोई ना कोई राजनीतिक ऐंगल ढूंढ ही लेते हैं. ऐसे में यही कहा जा सकता है कि नजर का ऑपरेशन तो संभव है, लेकिन नजरिए का नहीं और इसे आप एक और खबर से समझ सकते हैं.

ओलंपिक में भारत की तरफ से क्वालिफाई करने वाली पहली फेंसर (Fencer) भवानी देवी ने दूसरे मुकाबले में अपनी हार के बाद देश से माफी मांगी है. उन्होंने ट्वीट करते हुए लिखा है कि अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने के बावजूद वो जीत नहीं सकीं, इसलिए वो देश से माफी चाहती हैं. सोचिए एक खिलाड़ी तो अपनी हार को सहर्ष स्वीकार करते हुए माफी मांग लेती हैं लेकिन हमारे देश के नेता कभी ऐसा नहीं करते. ऐसा लगता है कि कहीं ये विपक्षी नेता कल को ये ना कहने लगें कि भवानी देवी इसलिए हार गईं क्योंकि देश में महंगाई बहुत ज्यादा है. इसलिए कहा जा सकता है कि नजर का ऑपरेशन तो संभव है, लेकिन नजरिए का नहीं. 

'ओलंपिक आयोजन गर्व का विषय'

आज जब ओलंपिक खेलों की बात हो ही रही है तो आपको ये भी समझना चाहिए कि ओलंपिक खेलों का आयोजन कराने वाले देशों को इससे क्या मिलता है? आंकड़े तो कहते हैं कि ओलंपिक खेलों से प्रॉफिट ही नहीं बल्कि उस देश का प्राइड (Pride) यानी गौरव बढ़ता है. ओलंपिक खेलों के आयोजन से अगर किसी देश को कुछ हासिल होता है तो वो है सम्मान. इसलिए आप कह सकते हैं कि ओलंपिक खेलों का आयोजन कराना भी एक देश के लिए मेडल जीतने जैसे होता है. कैसे आइए समझते हैं.

इस समय Tokyo में 29वें ओलंपिक खेलों का आयोजन चल रहा है. और जापान ने इन खेलों को अपने देश में कराने के लिए 7.3 Billion US Dollars यानी 54 हजार750 करोड़ रुपये का बजट तय किया था. लेकिन उसने Tokyo Olympics पर लगभग 28 Billion US Dollars यानी 2 लाख 10 हजार करोड़ रुपये खर्च कर दिए जिससे जापान की अर्थव्यवस्था (Economy) पर बोझ बढ़ गया है.

'अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा असर'

एक अनुमान है कि टोक्यो ओलंपिक (Tokyo Olympics) की वजह से जापान की अर्थव्यवस्था प्रभावित हो सकती है. जो 800 मिलियन डॉलर यानी करीब 6 हजार करोड़ रुपये टिकटों की ब्रिकी से मिल सकते थे. वो भी अब जापान को नहीं मिलेंगे क्योंकि कोरोना वायरस (Coronavirus) की वजह से इस बार लोगों को स्टेडियम में जाकर खेलों को देखने की इजाजत नहीं है.

कोरोना नहीं होता तो विदेशों से लाखों लोग टोक्यो पहुंचे होते तो इससे जापान को 2 बिलियन डॉलर (Billion Dollars) यानी 15 हजार करोड़ का फायदा होता. कुल मिला कर कहें तो Tokyo Olympics जापान का प्रॉफिट नहीं बल्कि प्राइड यानी गौरव बढ़ाएगा और ऐसा नहीं है कि ये पहली बार हो रहा है, ओलंपिक आयोजन कराना हमेशा से गर्व का विषय रहा है.

'फायदे का सौदा नहीं है ओलंपिक आयोजन'

सन 2016 में जब Rio Olympics हुए थे तब ब्राजील की सरकार ने इन खेलों के लिए शुरुआती बजट 14 अरब डॉलर यानी 1 लाख 5 हजार करोड़ रुपये तय किया था. लेकिन बाद में इस बजट को बढाना पड़ा और ब्राजील की सरकार को रियो ओलंपिक (Rio Olympics) 20 अरब डॉलर यानी 1.5 करोड़ रुपये का पड़ा. बड़ी बात ये है कि ओलंपिक खेलों पर बेतहाशा खर्च की वजह से ब्राजील सरकार को तब देश के स्वास्थय बजट और पुलिस पर होने वाले खर्च में कटौती करनी पड़ी थी.

उद्योगपति बने थे मददगार

ठीक ऐसा ही 2014 के विंटर ओलंपिक (Winter Olympics) में भी हुआ था. उस समय ओलंपिक खेलों का आयोजन रूस में हुआ था. और इस ओलंपिक को अब तक का सबसे महंगा ओलंपिक भी माना जाता है. तब रूस की सरकार ने इस पर 51 Billion Dollars यानी 3 लाख 82 हजार500 करोड़ रुपये खर्च किए थे. ये खर्च इतना ज़्यादा था कि वहां के कई उद्योगपतियों ने आगे आकर अपने देश की सरकार की मदद की थी.

2006 के Turin Olympics से तो इटली को 3.2 Million Dollars यानी 24 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ था. और आज वहां Olympic Village का इस्तेमाल दूसरे देशों के आए शरणार्थियों के लिए किया जा रहा है. अगर बाकी ओलंपिक खेलों के आयोजन का खर्च भी देखेंगे तो आपको पता चलेगा कि ओलंपिक खेलों का आयोजन किसी भी देश के लिए फायदे का सौदा नहीं रहा.

हालांकि चीन अकेला एक ऐसा देश है जो ये दावा करता है कि 2008 के ओलंपिक खेलों से उसे 146 Million Dollars यानी 1100 करोड़ रुपये का फायदा हुआ था. हालांकी चीन के दावों पर यकीन करना थोड़ा मुश्किल है. क्योंकि चीन कभी ये नहीं मानेगा कि उसे Olympics कराने से नुकसान हुआ था.

ओलंपिक खेलों का इतिहास

Summer और Winter मिला कर अब तक कुल 28 Olympics हो चुके हैं और Tokyo में अभी 29वें ओलंपिक खेल चल रहे हैं. बड़ी बात ये है कि अब तक के ये सभी खेल दुनिया के मात्र 23 देशों में ही हुए हैं और 172 देश ऐसे हैं, जहां कभी भी ओलंपिक खेलों का आयोजन नहीं हुआ. इनमें भारत भी है यहां पर एक प्वाइंट ये भी है कि जब 2010 में भारत में पहली बार Commonwealth Games का आयोजन हुआ था, तब हमने इन खेलों में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार देखा.

कहने का मतलब सिर्फ़ यही है कि ओलंपिक खेलों का आयोजन कराने के लिए देशों को बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है. और ये भी एक तरह की Weight Lifting है जिसमें इन खेलों का आयोजन कराने वाले देश आर्थिक नुकसान का भार उठा कर अपने देश को अंतर्राष्ट्रीय मंच पर एक बड़ी शक्ति के रूप में पेश करते हैं. ओलंपिक खेलों का पहली बार Television पर प्रसारण वर्ष 1948 में हुआ था. 

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