MP News: गुरु पूर्णिमा पर बागेश्वर धाम में होगा भव्य कार्यक्रम, हजारों श्रद्धालु प्राप्त करेंगे दीक्षा
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MP News: गुरु पूर्णिमा पर बागेश्वर धाम में होगा भव्य कार्यक्रम, हजारों श्रद्धालु प्राप्त करेंगे दीक्षा

गुरु पूर्णिमा महोत्सव 1 जुलाई से 5 जुलाई तक होगा. बागेश्वर बाला जी मंदिर परिसर के 500 मीटर आगे पहाड़ी के पास भव्य पंडाल का निर्माण किया गया है.  शनिवार से इस आस्था के महाकुंभ में लाखों की संख्या में श्रद्धालु प्रतिदिन आएंगे और गुरु दीक्षा प्राप्त करेंगे.

MP News: गुरु पूर्णिमा पर बागेश्वर धाम में होगा भव्य कार्यक्रम, हजारों श्रद्धालु प्राप्त करेंगे दीक्षा

MP News/हरीश गुप्ता: मध्य प्रदेश के छतरपुर में स्थित ख्याति प्राप्त प्रसिद्ध धार्मिक स्थल बागेश्वर धाम में गुरु पूर्णिमा महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है. इस आयोजन को लेकर समिति के द्वारा भव्य रूप से तैयारियां पूर्ण की कर ली गई है.  गुरु पूर्णिमा महोत्सव 1 जुलाई से 5 जुलाई तक होगा. बागेश्वर बाला जी मंदिर परिसर के 500 मीटर आगे पहाड़ी के पास भव्य पंडाल का निर्माण किया गया है.  शनिवार से इस आस्था के महाकुंभ में लाखों की संख्या में श्रद्धालु प्रतिदिन आएंगे और गुरु दीक्षा प्राप्त करेंगे.

शनिवार की सुबह 11 बजे से पंडित धीरेंद्र कृष्ण महाराज से गुरु दीक्षा लेने वाले दूर-दूर उनके शिष्य बनने की लिए आए और यहां आकर बहुत खुश हुए. गुरु पूर्णिमा महोत्सव में पांच दिन लगातार संगीतमय कार्यक्रम रात में आयोजित होगा.जिसके लिए लाखों लोग यहां पहुंचने लगे हैं. इसके लिए पुलिस ने भी व्यापक तैयारी कर रखी है.

गुरु पूर्णिमा पर यहां भी होगा भव्य कार्यक्रम
इधर, गुरु पूर्णिमा के मौके पर खंडवा के दादाजी धूनीवाले का मंदिर एक बार फिर लाखों भक्तों की आस्था के सैलाब में सराबोर होने जा रहा है. दादा जी के अनुयाई विदेशों में भी हैं. देश-विदेश से आने वाले भक्तों को ध्यान में रखते हुए मंदिर ट्रस्ट 3 दिन तक गुरु पूर्णिमा उत्सव मनाता है. प्रमुख उत्सव रविवार को मनाया जाएगा. दो दिन पहले से ही भक्तों का यहां आना शुरू हो गया है. लगभग 4 लाख लोग यहां दादाजी धूनीवाले की समाधि पर मत्था टेकने आते हैं. खास बात यह है कि इन श्रद्धालुओं के लिए पूरा शहर मेजबानी करता है.

क्या है महत्व?
अवधूत संत केशवानंद महाराज ने 1930 में यहां समाधि ली थी. वह नर्मदा के अनन्य भक्त थे और अपने साथ हमेशा एक धूनी जलाए रखते थे. यही कारण है कि उन्हें दादाजी धूनीवाले कहा जाता है. 1930 से यह धूनी लगातार उनकी समाधि के सामने प्रज्वलित होती आ रही है. उनके शिष्य और छोटे भाई ने भी यहां 1941 में समाधि ली थी.

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