Mahant Narendra Giri की मौत के पीछे किसकी साजिश? वसीयत से खुलेगा बड़ा राज

महंत नरेंद्र गिरी (Mahant Narendra Giri) की मौत की अनसुलझी गुत्थी कई सवाल खड़े कर रही है. इस सबके बीच महंत की वसीयत से बड़ा राज खुलने की उम्मीद है. कभी महंत नरेंद्र गिरि के उत्तराधिकारी रहे आनंद गिरि अब गुरु की मौत के मामले में मुख्य आरोपी बन चुके हैं.  

Mahant Narendra Giri की मौत के पीछे किसकी साजिश? वसीयत से खुलेगा बड़ा राज

नई दिल्ली/प्रयागराज: आस्था का संगम स्थल, संतों का सनातन धाम प्रयागराज इन दिनों एक महंत की मौत की वजह से चर्चा में है. प्रयागराज में 10 एकड़ जमीन पर फैली बाघम्बरी मठ गद्दी के मंहत नरेंद्र गिरि को भू-समाधि लिये 100 घंटे से अधिक हो गए हैं, अब तक 3 आरोपी गिरफ्तार हो चुके हैं. CBI असली अपराधी को ढूंढने में जुटी है तो तमाम अनसुलझे सवाल अभी भी बने हुए हैं. इस सबके बीच महंत नरेंद्र गिरि की वसीयत बेहद अहम मानी जा रही है. मंहत ने एक नहीं तीन-तीन वसीयत कीं. इन वसीयत का हर पन्ना कई राज खोल सकता है और शायद असली गुनहगार का चेहरा भी सबके सामने आ सकता है.

10 साल में महंत की 3 वसीयत 

ज़ी मीडिया की टीम के पास महंत नरेंद्र गिरि की वसीयत के असली कागजात हैं, जो किसी और के पास नहीं हैं. 10 साल में महंत ने 3 वसीयत कीं और अलग-अलग वसीयत में दो उत्तराधिकारियों के नाम दर्ज कराए. महंत नरेंद्र गिरि की 10 साल में 3 बार बनी वसीयत में उनके दो शिष्य उत्तराधिकारी बने. सवाल उठता है कि आखिर 3 बार उन्हें वसीयत क्यों लिखनी पड़ी और दो बार उन्हें उत्तराधिकारी क्यों बदलने पड़े?

1. पहली वसीयत

07/01/2010
उत्तराधिकारी- बलवीर गिरि

2. दूसरी वसीयत  
29/08/2011
उत्तराधिकारी- आनंद गिरि

3. तीसरी वसीयत
02/06/2020
उत्तराधिकारी- बलवीर गिरि

क्या है महंत की वसीयत में?

महंत नरेंद्र गिरि की वसीयत में बाघम्बरी मठ के असली उत्तराधिकारी के नाम अंकित हैं. 10 पेज की वसीयत के पेज नं. 2 पर लिखा है, 'मैं महन्त श्री नरेंद्र गिरि साधक शिष्य ब्रह्मलीन गुरु महंत भगवान गिरि निवासी-मकान नं. 777/1, मठ बाघम्बरी गद्दी, मुहल्ला अल्लापुर, नगर प्रयागराज का हूं. मेरी आयु 61 वर्ष की हो गई है और मैं इस समय अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद का अध्यक्ष हूं. अत्यधिक व्यस्तता रहती है तथा आकस्मिक यात्राएं भी करनी पड़ती हैं. मैं वर्ष 2004 से मठ बाघम्बरी गद्दी, प्रयागराज का महंत भी हूं और कुशलता से प्रबंधन एवं सामाजिक धार्मिक कार्य संपादित कर संपन्न करा रहा हूं. मठ एवं मंदिरों का प्रबंधन तथा उससे संपत्तियों का विकास करके पुरानी स्थापित परंपरा का पालन कर रहा हूं. वर्तमान युग की द्युतगामी जीवनशैली तथा निरंतर यात्राओं आदि में सम्मिलित होते रहने के कारण जीवन की अनिश्चितता है. अत: विचारकर दिनांक 07/01/2010 को पंजीकृत वसीयतनामा जिसकी रजिस्ट्री बही नं.-3, जिल्द संख्या 212 के पृष्ठ संख्या 137 से 140 पर क्रमांक 9 पर दर्ज है, अपने योग्य शिष्य स्वामी बलवीर गिरि को नामित किया था. वह धार्मिक यात्राओं, सम्मेलनों में सम्मिलित होने हरिद्वार, नासिक, पुरी आदि देश के विभिन्न धार्मिक नगरों में रहने लगे थे तथा हिमालय में तपस्या करने चले गये थे, जिससे मठ के प्रबंधन आदि में सहयोग हेतु उपस्थित नहीं कर पाते थे, जिससे मठ के प्रशासन एवं प्रबंधन में असुविधा थी, सहयोग नहीं होता था. इसलिए मैंने विचार करके पुन: दिनांक 29/08/2011 को अपने अन्य उपलब्ध योग्य शिष्य स्वामी आनंद गिरि के पक्ष में वसीयतनामा निष्पादित किया था तथा दिनांक 07/01/2010 को किया गया वसीयतनामा निरस्त किया था.'

महंत का उत्तराधिकारी कौन?

यानी महंत नरेंद्र गिरि ने पहली वसीयत 7 जनवरी 2010 को लिखी थी और अपने शिष्य बलवीर गिरि को अपना उत्तराधिकारी चुना था लेकिन उनके हिमालय में तपस्या के लिए जाने के बाद उनकी जगह पर आनंद गिरि को उत्तराधिकारी घोषित किया और इसके लिए महंत नरेंद्र गिरि ने 29 अगस्त 2011 को दूसरी वसीयत लिखी थी. महंत नरेंद्र गिरि के पास से जब सुसाइड नोट मिला था, उसमें उन्होंने बलवीर गिरि को अपना उत्तराधिकारी बताया था. हालांकि इस सुसाइड नोट पर ये कहकर सवाल उठाया गया कि ये नोट महंत नरेंद्र गिरि ने नहीं लिखा है. लेकिन ज़ी मीडिया के पास महंत नरेंद्र गिरि की वसीयत है और उस वसीयत में साफ लिखा हुआ है कि बलवीर गिरि ही उनके उत्तराधिकारी होंगे. इसका प्रमाण है 2 जून 2020 को लिखी गई महंत नरेंद्र गिरि की वसीयत. जिसमें लिखा गया है कि क्यों आनंद गिरि को हटाकर बलवीर गिरि को फिर से बाघम्बरी मठ का उत्तराधिकारी बनाया गया.  

तीसरी वसीयत में क्या?

तीसरी वीयत में महंत ने लिखा, 'अब स्वामी बलवीर गिरि वर्ष 2015 से मठ में आकर पुन: सेवा व प्रबंधन आदि में सहयोग कर रहे हैं. जबकि स्वामी आनंद गिरि विदेश यात्राएं करके विभिन्न कार्यक्रमों में सम्मिलित होने जाते हैं. स्वयं की संस्था गंगा सेना के नाम से बनाकर मठ के उद्देश्य से भिन्न कार्य कर रहे हैं. और उन पर विदेश में धर्म विरुद्ध कार्यों में संलिप्त होने के आरोप भी लगते हैं. जिससे अंतरराष्ट्रीय ख्याति के मठ बाघम्बरी गद्दी, मेरी तथा बड़े हनुमान जी व अन्य की ख्याति नष्ट हो रही है. मुझसे जुड़ाव होने से मेरी भी प्रसिद्धि ख्याति व धार्मिक सेवा की बदनामी हो रही है इसलिए उनसे मठ का हित सुरक्षित नहीं है. अत: मैं खूब सोच समझकर बिना किसी भय व दबाव व प्रलोभन के, अपने स्वस्थ मस्तिष्क से नामित कार्यकारी मंडल के सदस्यों से विचार विमर्श करके निश्चय किया कि वसीयतनामा दिनांकित 29/08/2011 जिसकी रजिस्ट्री बही नं. 3 और जिल्द संख्या 241 के पृष्ठ 163 से 168 पर क्रमांक 537 पर उपनिबंधक सदर प्रथम इलाहाबाद (प्रयागराज) में दर्ज है, को निरस्त व मंसूख कर दूं, जिससे स्वामी आनंद गिरि के कृत्य व आचरण से मठ तथा मंदिर व मैं मुक्त रह सकूं. अत: उक्त वसीयतनामा दिनांक 29/08/2011 को निरस्त व मंसूख करता हूं.'

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ये है महंत का आखिरी निर्णय?

मंहत ने आगे लिखा, 'सुयोग्य उत्तराधिकारी नियुक्त करने का निश्चय करके तथा स्वामी बलवीर गिरि के सेवा भाव, लगन व मेरे व मठ के प्रति भक्ति व तत्परता का विचार करके मैं आज दिनांक 2 जून 2020 को अपने स्वस्थ मस्तिष्क से बिना किसी भय व दबाव व प्रलोभन के, धर्म एवं मठ की रक्षा का विचार करके यह अंतिम वसीयत करता हूं जिसके अनुसार जब तक मैं जीवित रहूंगा या उसके पूर्व स्वेच्छा से पद त्याग नहीं देता हूं मठ बाघम्बरी गद्दी, प्रयागराज का महंत श्री रहूंगा तथा महंत श्री के सभी अधिकारों व कर्तव्यों का पालन करता रहूंगा. यह कि मेरे ब्रह्मलीन होने पर या स्वेच्छा से पद त्यागने की दशा में मठ बाघम्बरी गद्दी प्रयागराज के महंत श्री स्वामी बलवीर गिरि साधक शिष्य श्री नरेंद्र गिरि निवासी-771/1, मठ बाघम्बरी गद्दी, प्रयागराज होंगे तथा उत्तराधिकार प्राप्त करके समस्त स्वामित्व व अधिकार प्राप्त करेंगे तथा धार्मिक कर्तव्यों का पालन करेंगे. मठ के सभी कार्यों के प्रति उत्तरदायी होंगे. मेरी समस्त चल व अचल संपत्ति के उत्तराधिकारी होंगे.'

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