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सुप्रीम कोर्ट ने कहा-90 दिन के भीतर तय करो "अल्पसंख्यक" की परिभाषा

राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के अध्य्क्ष गय्यरुल हसन रिज़वी ने कहा, कि हम सुप्रीम कोर्ट का आदेश पढ़ेंगे, और अपना जवाब भी कोर्ट में दाखिल करेंगे.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा-90 दिन के भीतर तय करो "अल्पसंख्यक" की परिभाषा

नई दिल्‍ली: अल्पसंख्यक की परिभाषा और अल्पसंख्यकों की पहचान के दिशा-निर्देश तय करने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने अल्पसंख्यक आयोग को निर्देश दिया है कि 90 दिन के भीतर वो अल्पसंख्यक की परिभाषा तय करे. सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग ने कहा है,कि अल्पसंख्यक की परिभाषा राष्ट्रीय स्तर पर ही रहे, तो बेहतर है, क्योंकि कुछ लोग आज राज्य स्तर पर अल्पसंख्यक की परिभाषा तय करने की मांग कर रहे है, हो सकता है कि कल ज़िला स्तर पर भी ये उठाई जाने लगे, जिसको पूरा करना मुमकिन नहीं.

 

राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के अध्य्क्ष गय्यरुल हसन रिज़वी ने कहा, कि हम सुप्रीम कोर्ट का आदेश पढ़ेंगे, और अपना जवाब भी कोर्ट में दाखिल करेंगे. गययुरुल हसन रिज़वी ने इस बात को भी कहा, कि ये मामला पहले आयोग में भी आ चुका है और इसको लेकर एक कमेटी भी बनाई गई थी.

बीजेपी नेता अश्वनी कुमार उपाध्याय ने जनहित याचिका दाखिल कर सिर्फ वास्तव में अल्पसंख्यकों को 'अल्पसंख्यक संरक्षण' दिये जाने की मांग की है. याचिका में मांग की गई है कि राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम की धारा 2(सी) को रद्द किया जाए, क्योंकि यह धारा मनमानी, अतार्किक और अनुच्छेद 14, 15 और 21 का उल्लंघन करती है. इस धारा में केंद्र सरकार को किसी भी समुदाय को अल्पसंख्यक घोषित करने के असीमित और मनमाने अधिकार दिये गये हैं. याचिका में यह भी कहा गया है कि हिंदू जो राष्ट्रव्यापी आकंड़ों के अनुसार एक बहुसंख्यक समुदाय है, वह पूर्वोत्तर के कई राज्यों और जम्मू-कश्मीर में अल्पसंख्यक है. याचिका में कहा गया कि हिंदू समुदाय उन लाभों से वंचित है जो कि इन राज्यों में अल्पसंख्यक समुदायों के लिए मौजूद हैं. अल्पसंख्यक पैनल को इस संदर्भ में ‘अल्पसंख्यक' शब्द की परिभाषा पर पुन: विचार करना चाहिए.

भारत में आबादी के लिहाज़ से  मुसलमान, ईसाई, सिख, जैन, बौद्ध और पारसी धर्म के मानने वाले लोग अल्पसंख्यक है. सरकारी योजनाओं का लाभ भी अल्पसंख्यक होने के नाते इन्ही को मिलता है। हालांकि एक पक्ष लगातार ये कहता रहा है कि कई राज्यों में हिन्दू कम है और दूसरे धर्म को मानने वाले ज्यादा इसलिए उन्हें अल्पसंख्यक माना जाए और उन्हें इसका लाभ मिले, लेकिन अभी कोई नतीजा नहीं निकला है.