ZEE जानकारी: पूर्व रक्षा मंत्री जार्ज फर्नांडिस का निधन

जॉर्ज फर्नांडिस का 88 वर्ष की उम्र में मंगलवार को देहांत हो गया. 

ZEE जानकारी: पूर्व रक्षा मंत्री जार्ज फर्नांडिस  का निधन

अब विश्लेषण की दिशा एक ऐसे व्यक्ति की तरफ मोड़ते हैं, जिन्हें किसी ज़माने में 'The Giant Killer' कहकर संबोधित किया जाता था. इस हस्ती का नाम है, जॉर्ज फर्नांडिस. जो अब हमारे बीच नहीं हैं. 88 वर्ष की उम्र में आज उनका देहांत हो गया. वैसे तो भारत की युवा पीढ़ी को देश के वर्तमान नेताओं के नाम मुंह-ज़बानी याद होंगे. लेकिन, आज भारत के युवाओं को ये बताना भी ज़रुरी है, कि भारत की राजनीति में जॉर्ज फर्नांडिस का कद और प्रभाव क्या था ? इसे समझने के लिए सबसे पहले हम तीन अलग-अलग तस्वीरों की मदद लेंगे.

पहली तस्वीर उस वक्त की है, जब देश में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगाया था. उस वक्त जॉर्ज फर्नांडिस, एक क्रूर सत्ता के विरोध में.. बड़े योद्धा बनकर उभरे थे. और उन्होंने इंदिरा गांधी को चुनौती दी थी. बाद में सरकारी कार्रवाई से बचने के लिए वो Underground हो गए. लेकिन 1976 में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. जंज़ीरों में जकड़े जॉर्ज फर्नांडीस की ये तस्वीर उसी दौर की है. 

दूसरी तस्वीर मई 1998 की है. जब दिवंगत जॉर्ज फर्नांडिस देश के तत्कालीन रक्षा मंत्री थे. और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में पोखरण में सफल परमाणु परीक्षण किया गया था. 21 वर्ष पहले पोखरण में अटल बिहारी वाजपेयी, जॉर्ज फर्नांडीस और पूर्व राष्ट्रपति डॉ एपीजे अब्दुल कलाम की ये तस्वीर, उस दौर में भारत के जोश की गवाही देती है.

तीसरी तस्वीर जुलाई 1999 की है. जब भारत और पाकिस्तान के बीच कारगिल युद्ध हो रहा था. और जॉर्ज फर्नांडीस देश के सैनिकों का हौसला बढ़ाने के लिए कारगिल के दौरे पर थे. देश के रक्षा मंत्री को अपने बीच देखकर सैनिकों का जोश उस वक्त अपने चरम पर पहुंच गया था. और उत्साहित सैनिक उनसे एक बार हाथ मिलाने के लिए दौड़ते हुए चले आए थे.

और जॉर्ज फर्नांडिस से संबंधित एक वेबसाइट George Fernandes Dot Org के पहले पेज पर उनकी जो आखिरी तस्वीर दिखाई गई है, उसमें वो काफी बीमार और कमज़ोर लग रहे हैं. वो अल्जाइमर्स यानी भूलने की बीमारी से पीड़ित थे. और कुछ दिन पहले उन्हें स्वाइन फ्लू भी हो गया था.

जॉर्ज फ़र्नांडिस के व्यक्तित्व को समझने के लिए आपको ये तस्वीरें दिखानी ज़रुरी थीं. क्योंकि इन तस्वीरों में एक मज़ूबत राजनेता की छवि दिखाई देती है. जो परंपराओं को मानने में यकीन नहीं करता था. बल्कि परंपराओं से हटकर काम करता था. और देश के हितों की रक्षा के लिए किसी भी हद तक जा सकता था.

इसे एक छोटे से उदाहरण की मदद से समझना हो, तो बस इतना जान लीजिए, कि रक्षा मंत्री रहते हुए जॉर्ज फ़र्नांडिस ने 32 बार सियाचिन का दौरा किया. कारगिल युद्ध के दौरान उनकी बातों और उनके भाषणों ने सीमा पर तैनात जवानों का मनोबल बढ़ाने का काम किया. आज हमने Zee News की लाइब्रेरी से 20 साल पुरानी उन जोशीली तस्वीरों का एक खूबसूरत Album भी तैयार किया है. लेकिन उससे पहले आपको ये पता होना चाहिए, कि जॉर्ज फ़र्नांडिस की राजनीतिक शख्सियत क्या थी?

राष्ट्रीय राजनीति में सबसे पहले जॉर्ज फ़र्नांडिस की पहचान बनी थी.. वर्ष 1967 में. जब उन्होंने बंबई दक्षिण लोकसभा सीट से कांग्रेस के बड़े नेता SK पाटिल को हराया था.

और तभी से उनका नाम 'George The Giant Killer' पड़ गया. उस ज़माने में जॉर्ज फ़र्नांडिस बंबई म्युनिसिपिल काउंसिल में काउंसलर हुआ करते थे.

उस वक्त किसी ने SK पाटिल से पूछा था, सुना है कोई म्युनिसिपिल काउंसलर जॉर्ज फ़र्नांडिस.. आप के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ रहा है?

इसके जवाब में SK पाटिल ने पूछा, कि ये जॉर्ज फ़र्नांडिस कौन है ? और कहा, कि अगर भगवान भी आ जाएं तो भी मुझे हरा नहीं सकते.

अगले दिन मुंबई के सारे अख़बारों की Headline थी, 'Even God Can Not Defeat Me, Says Patil

उसी एक टिप्पणी पर जॉर्ज फ़र्नांडिस ने पोस्टर छपवाए, जिसमें लिखा था, 'पाटिल कहते हैं, कि उन्हें भगवान भी नहीं हरा सकते, लेकिन आप हरा सकते हैं इस शख़्स को.

ये शुरुआत थी SK पाटिल के पतन की और जॉर्ज फ़र्नांडिस के उदय की. SK पाटिल, जॉर्ज फ़र्नांडिस से 42 हज़ार वोटों से चुनाव हार गए थे.

जॉर्ज फ़र्नांडिस ने अपने राजनीतिक जीवन में 9 लोकसभा चुनावों में जीत हासिल की. अगर वो न होते तो NDA न होता, अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार न बनती. इसीलिए उन्हें भारत में गठबंधन सरकारों का जनक भी कहा जाता है. जनता दल के टूट जाने के बाद उन्होंने वर्ष 1994 में समता पार्टी का गठन किया था. और बाद में NDA की सरकार में शामिल हो गए थे. जॉर्ड फर्नांडिस एक ऐसे नेता थे, जिनकी सूझबूझ की वजह से अलग-अलग पार्टियां बीजेपी के साथ जुड़ती चली गईं.. और NDA का उदय हुआ. जॉर्ज फ़र्नांडिस ना सिर्फ अटल बिहारी वाजपेयी के क़रीबी थे. बल्कि वो NDA के संयोजक भी थे. 

हालांकि ये भी एक दुखद विडंबना ही है, कि जॉर्ज फ़र्नांडिस के जीवन का अंत बहुत दुखद परिस्थितियों में हुआ. पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की तरह जीवन के अंतिम क्षणों में जॉर्ज फर्नांडिस काफी बीमार थे. और सक्रिय राजनीति से दूर हो गये थे. लम्बी बीमारी के बाद आज उन्होंने आखिरी सांस ली.

आज जॉर्ज साहब को याद करते हुए हमें एक दिलचस्प किस्सा भी याद आ रहा है. और किस्सा है, उनके घर के दरवाज़े का.

सांसद बनने के बाद जॉर्ज फर्नांडिस, जब तक, दिल्ली में 3 कृष्ण मेनन मार्ग पर रहे, कभी भी उनके घर का दरवाज़ा बंद नहीं हुआ.

इसके पीछे दो कहानियां है. पहली ये कि समाजवादी नेता होने के नाते, वो अपने घर का दरवाज़ा हमेशा जनता के लिए खुला रखना चाहते थे. क्योंकि तमाम समाजवादी नेता, चाहे वो राम मनोहर लोहिया हों या मधु लिमये... सभी अपने घर का दरवाज़ा हमेशा खुला रखते थे.

इसके पीछे की दूसरी कहानी बहुत दिलचस्प है. 1991 के दौर में जॉर्ज फर्नांडिस के घर के सामने देश के तत्कालीन गृह मंत्री SB चव्हाण का घर हुआ करता था. और जब भी SB चव्हाण अपने घर आते थे, तो उनके सामने मौजूद सभी घरों के दरवाजे सुरक्षा के लिहाज़ से बंद करवा दिए जाते थे. 

एक दिन जॉर्ज फर्नांडिस को संसद जाना था और इसी बीच SB चव्हाण अपने घर आ रहे थे. सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए पुलिस ने उनके घर का दरवाजा बंद किया हुआ था. जैसे ही जॉर्ज फर्नांडिस बाहर निकले, उन्होंने अपने घर का दरवाज़ा बंद देखा. और इस विषय पर उन्होंने अपने निजी सचिव और सुरक्षा कर्मियों से पूछा.. कि दरवाज़ा क्यों बंद है. सुरक्षाकर्मियों ने जब उन्हें कारण बताया तो वो काफी नाराज़ हो गए. और अपने निजी सचिव को... हमेशा के लिए अपने घर के दरवाजे को उखाड़ फेंकने का आदेश दे दिया. और तब से लेकर जब तक वो अपने सरकारी आवास में रहे, बिना दरवाज़े के ही रहे.