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ZEE जानकारी: 'एक देश - एक चुनाव' के विचार पर गंभीरता से करना होगा विचार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चाहते हैं कि भारत अब 'एक देश-एक चुनाव' वाले उनके प्रस्ताव पर गंभीरता से विचार करे.

ZEE जानकारी: 'एक देश - एक चुनाव' के विचार पर गंभीरता से करना होगा विचार

आज से 17वीं लोकसभा की शुरुआत हुई है. इस लोकसभा के गठन के लिए ही पिछले महीने तक देश में सात चरणों में लोकसभा चुनाव हो रहा था. क़रीब डेढ़ महीने तक देश के अलग-अलग राज्यों में लोगों ने मतदान किया. क़रीब ढाई महीने तक देश में आचार संहिता लगी रही. 135 करोड़ की आबादी और 90 करोड़ से ज़्यादा वोटर वाले देश में चुनाव की ये प्रक्रिया आसान नहीं है. पूरी दुनिया भारत की चुनाव व्यवस्था की तारीफ़ करती है. लेकिन इसे और आसान बनाया जा सकता है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चाहते हैं कि भारत अब 'एक देश-एक चुनाव' वाले उनके प्रस्ताव पर गंभीरता से विचार करे. इसीलिये उन्होंने 19 जून को सभी पार्टियों के राष्ट्रीय अध्यक्षों की बैठक बुलाई है. मोदी सरकार देश में एक साथ चुनाव कराने वाला सुझाव पहले भी देती रही है. लेकिन विपक्ष इस पर सहमत नहीं है. 

विपक्षी दलों को लगता है कि जिस तरह बीजेपी का जनाधार तेज़ी से बढ़ रहा है, ऐसे में वो केंद्र के साथ राज्यों में भी विपक्षी दलों का अस्तित्व ख़त्म कर देगी. इस प्रस्ताव से छोटे क्षेत्रीय दल सबसे ज़्यादा घबराये हुए हैं.

भारत जैसे विशाल देश में हमेशा कोई ना कोई चुनाव होता ही रहता है. लोकसभा चुनाव, विधानसभा चुनाव, पंचायत चुनाव, निगम चुनाव और उप चुनाव. ऐसा लगता है कि जैसे देश हर वक़्त चुनावी Mode में है. पिछले 32 वर्षों में एक भी साल ऐसा नहीं रहा है, जिसमें कोई चुनाव ना हुआ हो. इससे देश को ना सिर्फ़ आर्थिक नुक़सान होता है...बल्कि बहुत सा वक़्त, जो देश के विकास में लग सकता है...वो भी आचार संहिता लगने की वजह से ख़राब हो जाता है. ऐसे में सवाल है कि क्या अब समय आ गया है कि देश में लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ कराए जाएं?

अगस्त 2018 में विधि आयोग ने एक साथ चुनाव कराये जाने को लेकर एक रिपोर्ट तैयार की थी.
Justice B.S. चौहान की अध्यक्षता में बनी इस रिपोर्ट में बताया गया था कि

संविधान में संशोधन कर के केंद्र और राज्य में एक साथ चुनाव कराये जा सकते हैं. इसके लिये देश के आधे राज्यों की विधानसभाओं से भी इस संशोधन को पास कराना होगा. विधि आयोग ने 3 सुझाव दिये थे.

पहला ये कि एक साथ चुनाव कराने के लिये कुछ राज्यों में चुनाव टाले जाएं. या फिर कुछ राज्यों में पहले Election करा लिया जाये. ताकि लोकसभा के साथ सभी राज्यों में एक साथ चुनाव हो पायें.

दूसरे सुझाव में राज्यों को दो ग्रुप में बांटने की बात थी, ताकि पांच सालों में दो बार चुनाव हों.
तीसरा रास्ता ये है कि एक साल में अलग-अलग महीनों में होने वाले चुनावों को एक साथ करा लिया जाए.

अगर किसी राज्य में किसी पार्टी को बहुमत नहीं मिलता है, तो ऐसी स्थिति में मध्यावधि चुनाव कराये जा सकते हैं. << GFX भारत में हर साल 5 से 7 राज्यों में विधानसभा चुनाव होते हैं. अलग-अलग चुनाव होने से बार-बार Model Code of Conduct यानी आचार संहिता लागू होती है. आचार संहिता लगने से विकास के काम रुक जाते हैं. सरकार कोई नई योजना शुरू नहीं कर सकती...और ना ही कोई नये ऐलान किए जा सकते हैं. इसलिये देश में लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ कराने से बहुत से फ़ायदे हैं.

इससे चुनाव पर कम ख़र्च होगा. 
सुरक्षाबलों की तैनाती कम होगी.

चुनाव में सरकारी कर्मचारियों की ड्यूटी लगती है. इनमें सरकारी Teachers भी होते हैं. अगर एक साथ चुनाव होते हैं तो उन्हें बच्चों की पढ़ाई पर ध्यान देने का मौक़ा ज़्यादा मिलेगा. चुनाव आयोग की आचार संहिता का असर भी सरकारी योजनाओं पर नहीं पड़ेगा. केंद्र और राज्य सरकारों का कार्यकाल एक साथ शुरू होने से दोनों के बीच तालमेल बेहतर रहेगा. दोनों की योजनाएं एक रफ़्तार से आगे बढ़ पाएंगी.

विपक्ष का कहना है कि एक साथ चुनाव हुए तो क्षेत्रीय पार्टियों के लिए मुश्किल पैदा होगी, और नेताओं की जवाबदेही घट जाएगी. क्योंकि क्षेत्रीय मुद्दों पर राष्ट्रीय मुद्दे हावी हो जाएंगे. विपक्ष इसे देश के Federal Structure यानी संघीय ढांचे को भी ख़तरा बता रहा है. इसकी वजह से कई विधानसभाओं का कार्यकाल बढ़ाया जाएगा...जबकि कई राज्यों में सरकारें अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाएंगी.

वैसे एक बहुत ही व्यावहारिक वजह देश का वोटर भी है. अक्सर ग्रामीण और आदिवासी इलाक़ों में रहने वाला वोटर, बहुत जागरूक नहीं होता. लोकसभा और विधानसभा चुनाव के फ़र्क़ को समझना.... उसके लिये एक बहुत बड़ी चुनौती होगी.

भारत में चुनाव, भ्रष्टाचार और विचारधाराओं का प्रदूषण फैलाने का एक बड़ा माध्यम माने जाते हैं. चुनावों में जातिवाद, सांप्रदायकिता और कालेधन जैसी बुराइयों को आगे बढ़ाया जाता है. इसलिये अगर देश हर वक़्त चुनाव के Mode में रहेगा तो इन चीज़ों से छुटकारा पाना मुश्किल है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हमेशा इस बात पर ज़ोर देते रहे हैं कि लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ कराये जाने चाहिये. जनवरी 2018 में मैंने प्रधानमंत्री मोदी का इंटरव्यू किया था. तब मैंने उनके साथ One Nation-One Election के मुद्दे पर भी बात की थी.

वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव कराने में 3 हज़ार 870 करोड़ रुपये ख़र्च हुए थे.
जबकि इसके अगले वर्ष 2015 में हुए बिहार विधानसभा चुनाव में 300 करोड़ रुपये ख़र्च हुए.
यानी अगर बिहार में एक साल पहले चुनाव करा लिये जाते...तो ये 300 करोड़ बचाये जा सकते थे.
इसी तरह वर्ष 2018 में कर्नाटक में हुए चुनाव में क़रीब 500 करोड़ रुपये ख़र्च हुए. हाल में हुए लोकसभा चुनाव में क़रीब 6 हज़ार 500 करोड़ रुपये ख़र्च हुए हैं. अगर कर्नाटक में भी चुनाव टाल कर 2019 में कराये जाते, तो वहां ख़र्च हुए 500 करोड़ रुपये भी बचाये जा सकते थे.

एक साथ चुनाव कराने का बड़ा फ़ायदा राजनीतिक पार्टियों को भी होगा...क्योंकि उन्हें प्रचार में अलग-अलग ख़र्च नहीं करना पड़ेगा. वो रैलियों से लेकर पोस्टर तक, अपना ख़र्च बचा सकते हैं.

अभी लोकसभा चुनाव में एक उम्मीदवार को प्रचार पर 70 लाख रुपये तक ख़र्च करने की अनुमति है. विधानसभा चुनाव में उम्मीदवार 28 लाख रुपये से ज़्यादा खर्च नहीं कर सकता है.

सच तो ये है कि हमारे देश के नेता... इस पाबंदी का सम्मान नहीं करते. वो इससे कई गुना ज़्यादा ख़र्च करते हैं. चुनाव में होने वाले ख़र्च के मामले में भारत अब अमेरिका से भी आगे निकल चुका है. 

2016 में अमेरिका में हुए राष्ट्रपति पद के चुनाव में 45 हज़ार करोड़ रुपये ख़र्च हुए थे. एक स्टडी के मुताबिक़ देश में एक महीने पहले ख़त्म हुए लोकसभा चुनाव में 50 हज़ार करोड़ रुपये से ज़्यादा ख़र्च हुए हैं. 

एक साथ चुनाव होने के और भी कई फायदे हैं. चुनावों में हर रोज़ नेताओं की रैली होती हैं, रोड-शो होते हैं. इससे सड़कों पर जाम लगता है. ध्वनि प्रदूषण होता है. अगर चुनाव एक साथ होंगे तो ये समस्याएं 5 साल में सिर्फ़ एक बार आएंगी. 

भारत के लिये Sweden, Belgium और दक्षिण अफ्रीका जैसे देश मिसाल बन सकते हैं.
Sweden में हर चार साल बाद आम चुनाव के साथ निकाय स्तर के चुनाव भी होते हैं.
Belgium में आम चुनाव पांच वर्ष में एक बार होते हैं...इस दौरान यहां के लोग European Parliament के लिये भी सांसद चुनते हैं.
दक्षिण अफ्रीका में आम चुनाव और राज्यों के चुनाव हर पांच साल में एक साथ कराये जाते हैं.

भारत के लिये Sweden, Belgium और दक्षिण अफ्रीका जैसे देश मिसाल बन सकते हैं.
Sweden में हर चार साल बाद आम चुनाव के साथ निकाय स्तर के चुनाव भी होते हैं.
Belgium में आम चुनाव पांच वर्ष में एक बार होते हैं...इस दौरान यहां के लोग European Parliament के लिये भी सांसद चुनते हैं. दक्षिण अफ्रीका में आम चुनाव और राज्यों के चुनाव हर पांच साल में एक साथ कराये जाते हैं.

लोकसभा और विधानसभा चुनावों को एक साथ कराने का ये विचार नया नहीं है. 1951-1952 में जब पहले लोकसभा चुनाव हुए थे, तब सभी राज्यों की विधानसभा के चुनाव भी साथ ही करवाए गए थे. 

इसके बाद 1957, 1962 और 1967 में भी लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ हुए. 
हालांकि 1968 और 1969 में कुछ राज्यों की विधानसभा को भंग कर दिया गया था. और तब इस प्रक्रिया पर पहली बार असर पड़ा. वर्ष 1970 में चौथी लोकसभा, अपना कार्यकाल खत्म होने से पहले ही भंग हो गई. और 1971 में फिर से चुनाव हुए. वर्ष 1975 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी लगाई थी...और अपना कार्यकाल बढ़ा लिया था. 

इसी वजह से बहुत से राज्यों की विधानसभाएं भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई थीं.