ZEE जानकारी: जानें क्या है वंदे मातरम का इतिहास?

जन गण मन भारत का राष्ट्रगान है और वंदेमातरम भारत का राष्ट्रगीत है. ये दोनों ही गीत हमारे देश के DNA का हिस्सा हैं.

ZEE जानकारी: जानें क्या है वंदे मातरम का इतिहास?

अब हम केरल से लेकर कटिहार तक फैली एक ऐसी मानसिकता की बात करेंगे, जो देश को जोड़ने का नहीं, बल्कि तोड़ने का काम कर रही है. इस विश्लेषण के केंद्रबिन्दु में दो अलग-अलग ख़बरें हैं.

पहली ख़बर केरल की Cochin University Of Science And Technology से आई है. जहां पढ़ने वाले उत्तर भारतीय छात्रों ने University प्रशासन से लिखित में College Campus के भीतर सरस्वती पूजा का पर्व मनाने की इजाज़त मांगी थी. छात्रों की मांग थी, कि प्रशासन उन्हें 9 फरवरी से 11 फरवरी यानी तीन दिनों तक सरस्वती पूजा करने दे. लेकिन University प्रशासन ने छात्रों को इसकी इजाज़त नहीं दी. और इसके पीछे ये दलील दी गई, कि University का Campus एक Secular यानी धर्मनिरपेक्ष Campus है. इसलिए, किसी भी धर्म विशेष के छात्रों को धार्मिक आयोजन की इजाज़त नहीं दी जा सकती. छात्रों द्वारा लिखी गई चिट्ठी के जवाब में University के Registrar की तरफ से जो जवाब दिया गया, वो इस वक्त मेरे हाथ में है. जिसे मैं पढ़कर आपको सुनाना चाहता हूं.

इस चिट्ठी में साफ-साफ शब्दों में लिखा है, कि University का Campus धर्मनिरपेक्ष है. इसलिए, किसी धर्म विशेष के छात्रों को किसी भी प्रकार के धार्मिक आयोजन की इजाज़त नहीं मिलेगी. अब सवाल ये है, कि इस University में Secularism की कैसी शिक्षा दी जा रही है ? जिस देश की संस्कृति सर्व धर्म समभाव यानी सभी धर्मों को समान अधिकार देने के भाव पर आधारित है. वहां किसी को अपनी धार्मिक आस्था पर आधारित आयोजन करने से कैसे रोका जा सकता है ? हालांकि, जब इस मामले पर विवाद हुआ तो University प्रशासन को अपनी ग़लती का अहसास हुआ. और इस मामले में ताज़ा Update ये है, कि छात्रों को सरस्वती पूजा करने की इजाज़त दे दी गई है. 

ये तो केरल की बात हुई. अब आपको बिहार के कटिहार लेकर चलते हैं. 

बिहार के कटिहार ज़िले में वंदे मातरम नहीं गाने को लेकर विवाद हो गया. वैसे तो ये घटना 26 जनवरी की है. लेकिन ये पूरा मामला अब सामने आया है. घटना कटिहार ज़िले में स्थित एक प्राथमिक विद्यालय की है. जहां अफ़ज़ल हुसैन नाम के एक शिक्षक ने 26 जनवरी को वन्दे मातरम गाने से इनकार कर दिया था. जैसे ही स्थानीय लोगों को ये जानकारी मिली, उन्होंने उस शिक्षक के खिलाफ जमकर विरोध प्रदर्शन किया. वंदे मातरम ना गाने के पीछे इस शिक्षक की दलील ये थी, कि भारत का राष्ट्रीय गीत उसकी धार्मिक आस्था के खिलाफ है. वो अल्लाह की इबादत करता है. इसलिए वंदे मातरम नहीं बोल सकता. सबसे पहले आप इस शिक्षक के विचार और बिहार से आ रही प्रतिक्रियाओं को सुनिए. फिर हम इस विश्लेषण को आगे बढ़ाएंगे.

शिक्षक होने के नाते इस व्यक्ति का काम देश के भविष्य को उज्जवल बनाना है. लेकिन जब इसे ही वंदे मातरम गाने से परेशानी है. तो सोचिए ये स्कूल में पढ़ने वाले छात्रों को देशभक्ति की कौन सी परिभाषा बताएगा. आज भी हमारे देश में बहुत सारे लोगों को इस बात की जानकारी नहीं है कि वंदेमातरम को भी राष्ट्रीय गीत के तौर पर भारत सरकार द्वारा मान्यता मिली हुई है. और वंदेमातरम का सम्मान भी राष्ट्रगान से कम नहीं है. जन गण मन भारत का राष्ट्रगान है और वंदेमातरम भारत का राष्ट्रगीत है. ये दोनों ही गीत हमारे देश के DNA का हिस्सा हैं. इन्हें अलग नहीं किया जा सकता और ना ही इनकी तुलना की जा सकती है.

24 जनवरी 1950 को भारत के पहले राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने संविधान सभा में एक बयान दिया था . उन्होंने कहा था... "वंदे मातरम् गीत ने भारत की स्वतंत्रता के संघर्ष में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है . इसलिए वंदेमातरम को जन गण मन के साथ समान रूप से सम्मानित किया जाएगा और वंदेमातरम की स्थिति भी जन गण मन के बराबर होगी " 

इस ऐतिहासिक बयान से स्पष्ट है कि वंदेमातरम और जन गण मन का सम्मान एक बराबर है . 

सच्चाई ये है कि आज़ादी के वक्त वंदेमातरम का सम्मान बहुत ज़्यादा था . लेकिन आज़ादी के बाद इसके सम्मान में गिरावट आती चली गई . वंदेमातरम एक ऐसा गीत है जिसे गाकर भारत के लोग.. अंग्रेज़ों को हराने में कामयाब हुए... लेकिन ये गीत अपने ही देश की राजनीति से भी हार गया . और कुछ लोगों ने इसे धर्म के चश्मे से देखकर, इसके महत्व को भी भुला दिया. 

वंदेमातरम के आस्तित्व पर सवाल उठाना देश के हित में नहीं है . इस गीत के अस्तित्व पर वही लोग सवाल उठा सकते हैं जिन्हें भारत के इतिहास की कोई जानकारी ही नहीं है या फिर जिनके मन में भारत के प्रति प्रेम नहीं है. अगर आपको वंदेमातरम के इतिहास की जानकारी होगी, तो आपका मन खुद ब खुद वंदेमातरम के प्रति श्रद्धा भाव से भर जाएगा. 

हमारे देश में वर्ष 1857 की लड़ाई को भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम कहा जाता है लेकिन इस लड़ाई से भी 94 वर्ष पहले वर्ष 1763 में बंगाल में संन्यासी विद्रोह हुआ था. संन्यासी विद्रोह, अंग्रेज़ों के खिलाफ पहला युद्ध था . बंगाल और बिहार के कई हिस्सों में करीब 38 वर्षों तक संन्यासियों ने अंग्रेज़ों से लड़ाई की थी. विद्रोह की इसी कहानी पर बांग्ला भाषा के प्रसिद्ध साहित्यकार बंकिम चंद्र चटर्जी ने एक ऐतिहासिक उपन्यास लिखा... जिसका नाम था... आनंद मठ . इसी 'आनंद मठ' में वंदेमातरम गीत को शामिल किया गया था. 

वंदेमातरम, देशभक्ति का पहला गीत है . ये अंग्रेज़ों के खिलाफ उठाई गई पहली आवाज़ का प्रतीक है . इसके आस्तित्व को नकार देना, भारत से विद्रोह के समान है . 

Indian National Congress की स्थापना वर्ष 1885 में हुई थी . लेकिन इससे भी 3 वर्ष पहले 1882 में आनंद मठ उपन्यास प्रकाशित हुआ था . जिसमें वंदे मातरम नामक गीत शामिल था . कई विद्वानों ने ये भी लिखा है कि बंकिम चंद्र चटर्जी ने वंदेमातरम की रचना 7 नवम्बर 1876 को बंगाल के कांतल पाडा गांव में की थी . वर्ष 1896 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में वंदेमातरम गीत गाया गया था . तब कांग्रेस के अधिवेशन में ये गीत खुद रबिंद्र नाथ टैकोर ने गाया था . आप कह सकते हैं कि वंदेमातरम ही वो गीत और नारा है जिसने भारत का पुनर-जागरण किया और आधुनिक राष्ट्रवाद की नींव रखी . 

वर्ष 1905 में जब अंग्रेज़ों ने बंगाल में आज़ादी की भावनाओं को दबाने के लिए बंगाल को दो भागों में बांटने का फैसला किया . तब पूरा बंगाल अंग्रेज़ों के खिलाफ सड़कों पर उतर गया था . उस वक्त वंदेमातरम का गीत ही क्रांतिकारियों की भावना का प्रदर्शन करता था. 16 अक्टूबर 1905 को पूर्वी बंगाल के मुख्य सचिव अंग्रेज़ अधिकारी पी सी ल्योन ने एक नोटिस जारी सार्वजनिक जगहों पर वंदेमातरम गाने पर प्रतिबंध लगा दिया था . इसके बाद वंदेमातरम की लोकप्रियता पूरे देश में फैल गई .

वंदेमातरम पर विवाद वर्ष 1923 के बाद शुरू हुआ था . जब वर्ष 1923 में कांग्रेस अधिवेशन की अध्यक्षता कर रहे मौलाना मुहम्मद अली जौहर ने ये कहकर वंदेमातरम का विरोध किया कि "इस्लाम में संगीत मना है ." 

इस घटना के 13 वर्ष बाद एक जुलाई 1939 को महात्मा गांधी ने साप्ताहिक पत्रिका The Harijan में वंदेमातरम के बारे में लिखा था कि 'मैं आनंद मठ के बारे में कुछ भी नहीं जानता, लेकिन वंदेमातरम मुझे आकर्षित करता है. इस गीत के साथ मैं विशुद्ध राष्ट्रीय भावनाओं से भर जाता हूं . वंदेमातरम से मुझे कभी भी ये नहीं लगा कि ये हिंदू गीत है या इसका मतलब केवल हिंदुओं के लिए है . दुर्भाग्य से हम बहुत बुरे दौर से गुजर रहे हैं.. जहां सोने जैसी शुद्ध चीज़ को भी, साधारण बनाया जा रहा है. ' 

सोचने वाली बात ये है कि जिस बुरे दौर की बात महात्मा गांधी कर रहे थे.. वो आज भी मौजूद है.

हमारे देश के संविधान की मूल प्रस्तावना में धर्म-निरपेक्ष जैसा कोई शब्द नहीं था .
ये शब्द संविधान की मूल प्रस्तावना में बाद में जोड़ा गया है . 

देश में इमरजेंसी के बाद 1976 में संविधान में 42 वां संशोधन हुआ... और संविधान की प्रस्तावना में दो शब्द जोड़े गये... ‘Secular’ यानी पंथ-निरपेक्ष और ‘Socialist’ यानी समाजवादी... 

संविधान में तो Secular शब्द का अनुवाद पंथ-निरपेक्ष किया गया है... लेकिन इसे बाद में धर्मनिरपेक्ष कहा जाने लगा . इस धर्मनिरपेक्ष शब्द पर आज भी विवाद होता है . 

Oxford के हिंदी शब्दकोश में धर्म-निरपेक्ष की परिभाषा दी गई है . धर्म-निरपेक्ष एक विशेषण है जिसका मतलब है..धर्म के प्रति पक्षपात नहीं होना . 

हमारे देश में धर्म के नाम पर पक्षपात कभी नहीं हुआ . देश की सनातन संस्कृति के इसी गुण की वजह से आज हमारे देश में विश्व के सभी धर्मों के लोग शांतिपूर्वक रहते हैं . 

हमारे देश में ईसाई, पारसी, यहूदी और मुसलमान सभी को पूरी सुरक्षा आज से नहीं, कई सदियों से मिली हुई है . हमारे देश में अल्पसंख्यक सबसे ज्यादा सुखी और सुरक्षित हैं और इसकी वजह हिंदू धर्म के लोगों की बहुसंख्या है . हिंदू धर्म के मूल में ही धर्म-निरपेक्षता का गुण विद्यमान है . लेकिन धर्म-निरपेक्षता की संवैधानिकता का हवाला देकर भारत की मूल संस्कृति पर प्रहार करना, देश के सामाजिक संतुलन के लिए अच्छा नहीं है .