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ZEE जानकारी: अगली सरकार की क्या प्राथमिकताएं होनी चाहिए?

कुछ बुद्धिजीवी ऐसे भी हैं, जिन्होंने नतीजों से पहले अगली सरकार की प्राथमिकताएं तय कर दी है. 

ZEE जानकारी: अगली सरकार की क्या प्राथमिकताएं होनी चाहिए?

कांग्रेस ने आज अपने एजेंडे के तहत EVM को Electronic Victory Machine बताया है.
यानी EVM के नाम पर राजनीतिक दुकानदारी पूरे ज़ोर शोर से चल रही है. हालांकि, इसका एक तथ्य ये भी है, कि जो लोग आज सवाल उठा रहे हैं, उनकी किस्मत इसी EVM में Lock हो चुकी है. और कल सुबह EVM से जनता के मन की बात निकलेगी. 

EVM की वजह से बहुत से बुद्धिजीवी बेचैन हैं क्योंकि उनकी दुकानें अगले पांच वर्षों के लिए बंद होने के आसार हैं. हालांकि, दूसरी तरफ कुछ बुद्धिजीवी ऐसे भी हैं, जिन्होंने नतीजों से पहले अगली सरकार की प्राथमिकताएं तय कर दी है. और वो दूषित विचारों वाले इस मौसम में देश के भविष्य के बारे में सोच रहे हैं.जाने माने अर्थशास्त्री और नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया ने कुछ ऐसे बिंदु सामने रखे हैं जो अगली सरकार की प्राथमिकताओं में हो सकते हैं.

उन्होंने कहा है, कि भारत की नई सरकार को Fiscal Consolidation यानी राजकोषीय मज़बूती के लिए नये सिरे से प्रयास करने होंगे 

केंद्रीय मंत्रालयों की संख्या कम करनी होगी. फिलहाल भारत में 50 से ज़्यादा मंत्रालय हैं लेकिन अब इन मंत्रालयों की संख्या 30 तक सीमित करनी होगी.

इसके अलावा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों का आक्रामक तरीके से निजीकरण करना होगा. उनकी सलाह ये है, कि नई सरकार को एयर इंडिया का निजीकरण करना चाहिए. 

नई सरकार को देश के आर्थिक विकास की गति को तेज़ करने के लिये, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर व्यापारिक समझौतों पर वार्ता करने वाली एक नयी इकाई बनानी होगी.

अध्यादेश के जरिये Banking Regulation Act में संशोधन किया जाना चाहिये. ताकि रिजर्व बैंक के 12 फरवरी 2018 के सुर्कलर को फिर से लागू किया जा सके.

ये सर्कुलर बैंकों में भविष्य में NPA यानी Non Performing Assets पैदा करने से रोक लगाता है. अरविंद पनगढ़िया ने ये सलाह भी दी है, कि बैंकों में NPA समाप्त होना चाहिये.

8 मई को जब मैंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का इंटरव्यू किया था, तो उस वक्त मैंने भी उनसे ये पूछा था कि नतीजों से पहले नई सरकार के 100 दिन का एजेंडा क्यों सेट हो रहा है. और तब उन्होंने बहुत साफ शब्दों में कह दिया था, कि चुनाव तो आते-जाते रहते हैं. लेकिन सरकार की काम करने की प्रक्रिया कभी नहीं रुकनी चाहिए. क्योंकि स्थिर होने से देश का विकास रुक जाता है. और मौजूदा परिस्थिति में ये देश के लिए शुभ नहीं है.

राजनेताओं की सहनशीलता आजकल न्यूनतम स्तर पर पहुंच गई है . चुनाव खत्म होने के बाद मीडिया ने जब Exit Polls के आंकड़ों को जनता के सामने रखा . तब लगभग हर Exit Poll में NDA का बहुमत देखकर विपक्ष के नेताओं ने राजनीतिक रुदन शुरू कर दिया . विपक्ष ने तुरंत मीडिया पर सवाल खड़े कर दिए. जबकि ये Exit Polls अलग अलग एजेंसियों द्वारा किए जाते हैं . 

News Channels या अखबारों की भूमिका इन Exit Polls को दिखाने की होती है . लेकिन इसके बावजूद विपक्ष ने Exit Polls को ही आखिरी नतीजा मान लिया और हार के डर से विलाप करना शुरू कर दिया . ऐसा नहीं कि Exit Poll पहली बार हुए हैं . 

चुनाव खत्म होने के बाद Exit Poll करना एक परंपरा बन चुका है . कई बार Exit Polls के अनुमान सही साबित होते हैं और कई बार गलत भी साबित होते हैं . लेकिन जनता इन Exit Polls को देखना पसंद करती है क्योंकि चुनाव परिणामों को लेकर हर किसी के अंदर एक उत्सुकता होती है . लेकिन विपक्ष के नेता इस तरह विलाप कर रहे हैं जैसे पहली बार कोई Exit Poll हुआ है और पहली बार किसी Exit Poll में बीजेपी को जीतने वाली पार्टी के तौर पर दिखाया गया है . ये कोई आश्चर्यजनक घटना भी नहीं है क्योंकि बीजेपी कोई दो चार सांसदों वाली छोटी मोटी पार्टी नहीं है . इस पार्टी ने पूरे देश को एक नया राजनीतिक विकल्प दिया है . ऐसे में ये समझना मुश्किल है कि Exit Poll पर सवाल खड़े करके, विपक्ष कौन सा Propaganda चलाना चाहता है. 

आज हमारे पास CSDS और लोकनीति का एक सर्वे है . जिसे देखने के बाद Exit Poll के अनुमानों पर आंसू बहाने वालों की आंखें खुल जाएंगी . Exit Poll में कोई नई बात नहीं कही गई है . कई अंतर्राष्ट्रीय और राष्ट्रीय एजेंसियों ने पहले भी अपने Survey में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को देश के सबसे लोकप्रिय नेता के तौर पर दिखाया है . 

CSDS और लोकनीति का ये सर्वे चुनाव से पहले किया गया था . इस सर्वे से पता चलता है कि नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता सिर्फ बीजेपी ही नहीं बल्कि दूसरी पार्टिय़ों के पारंपरिक वोटरों के बीच भी बढ़ी है . 

इस सर्वे के मुताबिक अप्रैल और मई 2014 में बीजेपी के 80 प्रतिशत वोटर नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री के तौर पर पसंद करते थे. 
और अप्रैल-मई 2019 में ये आंकड़ा बढ़कर 87 प्रतिशत हो गया . 

बीजेपी के सहयोगी दलों यानी NDA के 60 प्रतिशत वोटर 2014 में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री के तौर पर पसंद करते थे . और 2019 में ये आंकड़ा बढ़कर 73 प्रतिशत हो गया . यानी बीते 5 वर्षों में बीजेपी के सहयोगी दलों के वोटरों के बीच, नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता में 13 प्रतिशत का इज़ाफा हुआ है . 

2014 में कांग्रेस के 4 प्रतिशत वोटर नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री के तौर पर पसंद करते थे . लेकिन 2019 में कांग्रेस के 7 प्रतिशत वोटर, नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री के तौर पर पसंद करते हैं .

2014 में कांग्रेस के सहयोगी दलों के 12 प्रतिशत वोटर नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री के तौर पर पसंद करते थे . लेकिन 2019 में कांग्रेस के सहयोगी दलों के 8 प्रतिशत वोटर नरेंद्र मोदी को पसंद करते हैं . यानी 5 वर्षों में कांग्रेस के सहयोगी दलों के वोटरों में नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता 4 प्रतिशत कम हुई है . 

2014 में बीएसपी और एसपी के 8 प्रतिशत वोटर नरेंद्र मोदी को पसंद करते थे लेकिन 2019 में गठबंधन के 11 प्रतिशत वोटर नरेंद्र मोदी को पसंद करते हैं .

2014 में वामपंथी राजनीतिक दलों के 21 प्रतिशत वोटर नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री के तौर पर पसंद करते थे . लेकिन 2019 में इन दलों के 29 प्रतिशत वोटर नरेंद्र मोदी को पसंद करते हैं . 

2014 में अन्य दलों के 16 प्रतिशत वोटर नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री के तौर पर पसंद करते थे और 2019 में अन्य दलों के 26 प्रतिशत वोटर नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री के तौर पर पसंद करते हैं . 

यानी अगर देखा जाए तो बीते 5 वर्षों में करीब-करीब हर पार्टी के वोटरों के बीच नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता में इज़ाफा हुआ है . इसीलिए हम ये कह रहे हैं कि Exit Polls के अनुमान अप्रत्याशित नहीं है. Exit Polls पर विपक्षी दलों का विलाप करना सिर्फ एक Propaganda है . 

लोकसभा चुनाव का अध्ययन करने वाले लोग भी ये बात स्वीकार कर रहे हैं कि इन चुनावों में बीजेपी के वोटरों ने बीजेपी के उम्मीदवार से ज्यादा नरेंद्र मोदी के नाम पर वोट डाला है . यानी एक तरह से हर सीट पर नरेंद्र मोदी ही चुनाव लड़ रहे थे.

CSDS के सर्वे में भी यही बात समझ में आती है . बीजेपी के हर तीसरे वोटर ने नरेंद्र मोदी के नाम पर वोट दिया है . इसी तरह बीजेपी के सहयोगी दलों के हर चौथे वोटर ने नरेंद्र मोदी के नाम पर वोट दिया है . कुछ लोकसभा क्षेत्रों में तो बीजेपी के 43 प्रतिशत वोटरों ने पार्टी और उम्मीदवार की बजाय नरेंद्र मोदी के नाम पर वोट दिया . 

चुनाव में मोदी Effect नज़र आ रहा है . और ये परिस्थितियां भी विपक्ष ने ही पैदा की हैं क्योंकि उन्होंने नरेंद्र मोदी को देश के लिए खतरा बताकर मोदी हटाओ अभियान चलाया . चुनाव के केंद्र में नरेंद्र मोदी को विपक्ष लेकर आया, जिसका परिणाम तमाम Surveys और Exit Polls में भी नज़र आ रहा है . 

CSDS और लोकनीति के Survey के मुताबिक बीते 5 वर्षों में कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी की लोकप्रियता में भी इजाफा हुआ है . और ये बात Exit Polls में नज़र भी आती है . ज़्यादातर Exit Polls ने भी कांग्रेस पार्टी के प्रदर्शन को 2014 के प्रदर्शन से बेहतर दिखाया है . पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी को 44 सीटें मिली थीं . लेकिन इस बार के Exit Polls का अनुमान है कि कांग्रेस पार्टी को 70 से 80 सीटें मिल सकती हैं . यानी पहले के मुकाबले कांग्रेस को दोगुनी कामयाबी मिल सकती है.